बिजनेस स्टैंडर्ड - केंद्रीय बजट पर दार्शनिक नजर
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केंद्रीय बजट पर दार्शनिक नजर
पार्थसारथि शोम /  February 16, 2017

क्या अमेरिका और ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों की तरह हमारे देश में भी उत्तर सत्य और वैकल्पिक तथ्यों का जमाना आ चुका है? इस प्रश्न का समुचित विश्लेषण कर रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
आम बजट के तकनीकी पहलुओं पर मुझ समेत तमाम लोग कई तरह की बातें लिख चुके हैं। यहां मैं कुछ अवधारणात्मक और दार्शनिक पहलुओं पर बात करूंगा। इस बीच उत्तर सत्य और वैकल्पिक तथ्यों को लेकर एक नया साहित्य सामने आ रहा है जिसे उत्तरआधुनिकता का चरम कहा जा सकता है। क्या भारत उसमें सटीक बैठता है? बजट को लेकर ही बात करें तो उसे प्रस्तुत करने की तिथि को 28 फरवरी के बजाय इस बार 1 फरवरी कर दिया गया। अगर इसे अगले वर्ष और पहले यानी 1 जनवरी को कर दिया जाए तो हम वित्त वर्ष से कैलेंडर वर्ष तक पहुंच जाएंगे। यह अंकेक्षण के लिहाज से सरल होगा। जाहिर है सरकार को अपने इरादे स्पष्ट करने चाहिए।
 
बजट भाषण छोटा था और उसमें कोई अनावश्यक बात नहीं थी। परंतु बजट उस आर्थिक परिदृश्य को सामने लाने में नाकाम रहा जो आर्थिक समीक्षा में उदघाटित हुआ। इस प्रक्रिया में वर्ष 2017-18 के लिए सरकार के प्रस्ताव पिछले वर्ष के उसके अनुभवों और निष्कर्षों पर आधारित थे। इसके अतिरिक्त सभी सरकारी नीतियों को सालाना एकबारगी कदम के रूप में पेश किया जाना तमाम लक्ष्यों की प्राप्ति न हो पाने की वजह बनता है। जबकि उन पर संसद के विभिन्न सत्रों में मुद्दा दर मुद्दा चर्चा होनी चाहिए। इससे उन पर मतदानपूर्व गहराई से विचार करने का अवसर रहता है।
 
एक बात जिस पर हमें गहराई से ध्यान देना होगा वह यह है कि नीतियों की उपयोगिता को लेकर बजट में बहुत भरोसा नहीं नजर आता। इसकी वजह से बजट आवंटन के नतीजों को लेकर ढांचा विकसित नहीं हो सका है। यह घटना पिछले प्रशासनों के कदम से स्पष्ट विचलन है। यह ठीक नहीं है क्योंकि बिना निष्कर्ष के आकलन के केवल व्यय वितरण करने से लक्ष्य प्राप्ति नहीं होगी।
 
ऐसा इसलिए है क्योंकि यह उक्त व्यय की सफलता अथवा विफलता को निष्कर्ष अथवा सकल घरेलू उत्पाद पर उसके प्रभाव से जोड़कर देखता है जबकि इसकी तुलना में निष्कर्ष आधारित आकलन कहीं अधिक व्यापक होता है। निष्कर्ष आधारित बजट की तत्काल आवश्यकता है। बजट संकेतकों से जुड़ी एक अन्य अवधारणा है जीडीपी के लिए अनुमानों को रेखांकित किया जाना। इस समाचार पत्र में बजट के बाद प्रकाशित कई आलेखों में कहा गया है कि जीडीपी के अनुमान कई दफा अतिरंजित दिखे। सरकार को जीडीपी शृंखला को लेकर और खुलापन दिखाना होगा। जब तक जीडीपी अतिरंजित रहेगा तब तक राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) के लक्ष्य हासिल करना आसान बना रहता है। 
 
जीडीपी के संदर्भ में व्यय भी सहज नजर आता है जबकि कर-जीडीपी अनुपात को मुख्यतौर पर करदाताओं का दायरा बढ़ाकर हासिल किया जाता है। इस लिहाज से देखा जाए तो कर राजस्व के विवेकाधीन प्रयासों से अधिक संबद्घ रहने की संभावना है ताकि अधिकाधिक करदाताओं को इसमें शामिल किया जा सके। इस स्थिति में मोटेतौर पर राजस्व का निर्धारण जीडीपी के आधार पर नहीं होता। इस आधार पर कहा जा सकता है कि वर्ष 2017-18 के बजट में सरकार की प्रस्तुति अधिक आशावादी है। ठीक यही बात पिछले साल के बजट के बारे में भी कही जा सकती है। 
 
एक बार फिर यह सवाल उठता है कि आखिर सरकार ने उत्पादन के कमतर सूचकांकों को स्वीकार क्यों नहीं किया जबकि वह खुद को इससे निजात दिलाने में सफल नहीं हो सकती है। यह आश्चर्यजनक भी नहीं है क्योंकि हम विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता सूची में 190 देशों के बीच 130-131 स्थान पर अटके हैं। यहां पर सवाल यह है कि कोई भी संभावित घरेलू या विदेशी निवेशक भारत में निवेश क्यों करेगा जबकि 129-130 देशों में कारोबारी माहौल उससे बेहतर हो। क्या बजट में उल्लिखित तमाम नीतिगत प्रस्ताव इस सच्चाई से निपटने का कोई हल प्रदान करते हैं?
 
कर चुकाने में सुगमता के सूचकांक में भी भारत 190 देशों में 172वें स्थान पर है। जबकि कर प्रशासन सुधार आयोग (टार्क) को अपनी रपट पेश किए दो साल का समय हो चुका है। इसमें अहम कर सुधारों की अनुशंसा है। इस आधार पर भी यह बात समझ से परे है कि बिना किसी खास रुचि के कोई निवेशक आखिर भारत में निवेश क्यों करेगा? भारत का बड़ा बाजार इसकी एक वजह हो सकता है लेकिन यहां भी अगर कारोबारी चर्चाओं और चिंताओं की अनदेखी की जाए तो हालात तनावपूर्ण ही हैं। बड़े और छोटे, देसी और विदेशी कारोबारी क्षेत्र में यह विचार तेजी से जड़ें जमा रहा है कि जमीनी स्तर पर कर और गैर कर माहौल तेजी से बिगड़ा है। क्या नीति निर्माता इसे लेकर सचेत हैं? बजट में इसका भी कोई जिक्र नहीं था। 
 
निश्चित तौर पर नौकरशाहों को अतिरिक्त विवेकाधीन शक्तियां देने का नीतिगत क्रियान्वयन की मजबूती पर नकारात्मक असर होगा। इसके विपरीत उन शक्तियों को तार्किक बनाया जाना चाहिए। सरकार को टार्क के पिछले संस्करण को निकालना होगा जिसमें तमाम तरह की अनुशंसाओं को स्थान दिया गया है। इनमें से पसंदीदा का चुनाव नहीं करना चाहिए बल्कि समूचे ढांचागत सुधार को लागू कर दिया जाना चाहिए जिसकी अनुशंसा की गई है। अगर प्रधानमंत्री के निवेश लक्ष्यों को हासिल करना है तो यह काम तेजी से करना होगा। उसके लिए नोटबंदी के बाद अब ढांचागत कर सुधार लाना जरूरी है। 
 
देखा जाए तो फिलहाल हकीकत से दूरी बनाए रखने की कवायद नजर आती है। प्राचीन ग्रीक डेमोक्रिटस ने तीन सहस्राब्दि पूर्व लोकतंत्र की शुरुआती राह दिखाई थी। डेमोक्रिटस का विचार था कि पूरा ब्रह्मïांड रंगहीन, स्वादहीन और बिना वजन के परमाणु से बना है जो पूरी तरह असीमित है। जिसके न ऊपर कुछ है न नीचे। सम्राट थियोडोसिस के वक्त में उनके दूरदर्शी और सही विचारों को जमकर दबाया गया। थियोडोसिस ने ईसाइयत को इकलौते और अनिवार्य धर्म के रूप में स्थापित किया। इस दौरान लोकतंत्र का विचार हवा हो गया और उसकी जगह राजशासन ने ले ली। अरस्तू और प्लेटो को इसलिए जगह मिली क्योंकि उन्होंने सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार कर लिया। इसीलिए उनका लेखन भी बचा रहा। वहीं लोकतंत्र के तमाम समर्थकों को खत्म कर दिया गया। उन तक केवल अन्य दार्शनिकों की मदद से पहुंचा जा सकता है। अब डेमोक्रिटस के मूलभूत सत्य तक दोबारा पहुंचने में तीन सहस्राब्दियों का वक्त लगा। 
 
क्या आधुनिक लोकतांत्रिक देश मसलन अमेरिका, ब्रिटेन, भारत आदि उत्तर सत्य समय में हैं, जैसा कि अंतरराष्टï्रीय साहित्य में दावा किया जा रहा है? सत्य को परे रखकर बात करें तो वैकल्पिक तथ्यों का जिक्र आता है जिसे लेकर तमाम दावे किए जा रहे हैं। आश्वस्त करने वाली बात यह है कि अनेक लोग इस संबंध में अपनी आवाज उठा रहे हैं हालांकि भारत जैसे देश में उन आवाजों की सुनवाई भी कम ही हो रही है। तात्कालिक संदर्भ की बात करें तो उचित नीतिगत कदम, सही आंकड़े, जनता के साथ खुली चर्चा, सच को अंगीकृत करने की इच्छा आदि ऐसे लक्ष्य हैं जो तय किए जाते हैं लेकिन जिनके लिए प्रयास नहीं होता। अब वक्त आ गया है कि हम इस अवसर का लाभ उठाएं।
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