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असली समस्याओं की अनदेखी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगी भारी
नीति नियम
मिहिर शर्मा /  February 15, 2017

वित्त वर्ष 2017-18 का केंद्रीय बजट पेश होने के बाद की शुरुआती प्रतिक्रिया का दौर अब थम चुका है और उसकी जगह विशेषज्ञ गहन पड़ताल में लग गए हैं। पिछले बजट के उलट इस बार बजट में आगे की तरफ बढऩे वाला कोई कदम नहीं दिखता है। यह बजट भारतीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों के प्रति सक्रिय नहीं दिखता है और न ही इसमें अर्थव्यवस्था के भविष्य को दिशा देने की कोशिश की गई है। दरअसल यह बजट और इसका सारा अंकगणित और ध्यान का विषय मूलत: नोटबंदी ही रहा है। 

 
ऐसा होना दुर्भाग्यपूर्ण है। उम्मीद की जा रही थी कि बजट बिना किसी तैयारी और सोच के लागू कर दिए गए फैसले से अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की भरपाई में मदद करेगा लेकिन यह बजट केवल प्रतिक्रियावादी ही नजर आया। वैसे नोटबंदी के बगैर भी बजट बनाते समय मुश्किल हालात ही रहते। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के 1 जुलाई से लागू होने से अगले वित्त वर्ष के लिए राजस्व आकलन के अनिश्चित रहने के आसार हैं। इसके अलावा बजट प्रक्रिया को एक महीना पहले करने और नोटबंदी के कदम के चलते राजस्व संग्रह को लेकर अनिश्चय बना हुआ है। अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि इस साल के आंकड़ों के अनिश्चित होने से अगले वित्त वर्ष के बारे में कुछ कह पाना तो और भी मुश्किल है। उसमें भी अगर यह बात जोड़ दें कि कर प्रणाली में सुधार का कदम जुलाई से लागू होने जा रहा है तो किसी भी विशेषज्ञ के लिए राजस्व अनुमान लगा पाना और भी मुश्किल काम हो जाएगा। इसके बावजूद बजट तैयार करते समय यह दिखाने की कोशिश की गई है कि जीएसटी का कोई वजूद ही नहीं है। इसका मतलब कहीं यह तो नहीं है कि 1 जुलाई को नए आंकड़े जारी किए जाएंगे जिसमें राजकोषीय घाटे के बारे में अनुमान थोड़ा कम आकर्षक हो सकता है? या फिर यह सरकार जीएसटी को लेकर प्रतिबद्ध ही नहीं है? 
 
बजट में घोषित नीतियों में व्यापक जोर मुख्यत: नोटबंदी से हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई करने की कोशिश के साथ ही राजनीतिक मोर्चे पर मिले थोड़े-बहुत लाभों को मजबूत करने पर ही रहा है। कई वर्षों बाद भारत में अमीरों को निचोड़कर गरीबी हटाने की सोच हावी होती दिखी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए साल की पूर्व संध्या पर दिए राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में ही इसके संकेत दे दिए थे। 
 
मैं इस राजनीतिक विकल्प के बुद्धिमानी भरा फैसला होने या नहीं होने के बारे में कोई बहस नहीं करना चाहता। बात केवल इतनी है कि इस बजट से हमारी अर्थव्यवस्था विकासवादी सोच की तरफ बढ़ती नहीं दिख रही है। आगे की तरफ देखने वाले बजट में निस्संदेह सबसे अधिक ध्यान निजी निवेशकों के भरोसे को बहाल करने पर दिया गया होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ। असल में बजट से कुछ हद तक निजी निवेशक हतोत्साहित ही हुए होंगे। भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष मौजूद समस्याओं की वास्तविक प्रकृति का अंदाजा लगाना होगा। पिछली कई तिमाहियों से निजी निवेश में गिरावट आने से अर्थव्यवस्था की विकास दर धीमी पड़ी है। जब तक निजी निवेश में तेजी नहीं आती है विकास दर में सुधार नहीं आएगा और न ही नए रोजगार अवसर सृजित होंगे। अभी तक सरकार इस कमी की भरपाई के लिए अपने फंड का इस्तेमाल करती रही है लेकिन अपनी सीमित मात्रा के चलते वह तीव्र वृद्धि के लिए नाकाफी होगा। उम्मीद है कि सरकारी निवेश से बनी उत्पादन क्षमता निजी निवेश आकर्षित करने में कामयाब होगी और निवेशकों का भरोसा भी बहाल हो सकेगा। लेकिन पिछले तीन वर्षों से चल रही यह रणनीति जमीन पर कारगर नहीं दिख रही है। इसका मतलब है कि कई अन्य पहलू हैं जो आर्थिक विकास पर असर डाल रहे हैं। बैंकिंग क्षेत्र की हालत भी ऐसा ही एक पहलू है। नोटबंदी के दौरान बड़े पैमाने पर नकदी जमा होने के बावजूद बैंकों के पास अब भी पूंजी की कमी है और वे कर्ज देने से बच रहे हैं। बजट में भी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है, इस मद में केवल 10,000 करोड़ रुपये रखे गए हैं। मुश्किल में घिरे सार्वजनिक बैंकों के लिए इस हालत से निकल पाना खासा मुश्किल दिख रहा है। काफी शोर-शराबे के साथ गठित बैंक बोर्ड ब्यूरो में भी कोई हलचल नहीं दिख रही है। सरकार ने इन बैंकों को अधिक पेशेवर बनाने के बजाय उसे मुद्रा योजना, जनधन खाते खोलने और नोटबंदी जैसे सरकारी कदमों का एक जरिया मात्र बनाकर रख दिया है। 
 
कर्ज की मांग में आई कमी का मुद्दा भी है। पिछले कई वर्षों में निजी निवेशकों का भरोसा कम हुआ है। इसकी वजह यह है कि पहले निवेश में तेजी के दौरान जो समस्याएं मौजूद थीं, उनका अब तक कोई समाधान नहीं निकला है। सरकार यह भरोसा जगा पाने में भी नाकाम रही है कि ऐसी समस्याएं दोबारा पैदा नहीं होंगी। पिछले निवेश बूम के दौरान कंपनियों के बही-खाते में कर्ज के साथ ही अनुत्पादक भी बढ़ा था। उसे सुधारने के लिए बैंकों और विवाद निपटान प्रणाली को मिलकर काम करना होगा। निवेशक किसी भी फैसले में भ्रष्टाचार की गुंजाइश को लेकर आशंकित हैं और उस पंगुता को दूर करने के लिए बहुत कम प्रयास किए गए हैं।
 
निवेशकों को लगता है कि सरकार के मनमाने फैसलों ने काफी समस्याएं पैदा की हैं। इसे दूर करने के लिए सरकार को विधायी और संस्थागत सुधारों पर ध्यान देना चाहिए था। लेकिन पिछले तीन वर्षों में हमें एक के बाद एक निवेश मेला ही देखने को मिला है जहां पर अधिकारियों की तरह उद्योगपतियों ने भी केवल वादे ही किए हैं। नोटबंदी के बाद समृद्ध लोगों के खिलाफ एक लोकप्रियतावादी धारणा मजबूत होती दिखी है जिसमें कर अधिकारियों को अधिक शक्ति देने पर जोर दिया जा रहा है। इससे निवेशकों के भरोसे पर और चोट लगी है और अर्थव्यवस्था के उच्च विकास पथ पर जाने की संभावनाएं धूमिल लग रही हैं। दूसरे शब्दों में, यह बजट अर्थव्यवस्था को आगे के बजाय पीछे की ओर ले जाने वाला है। 
 
Keyword: केंद्रीय बजट, भारतीय अर्थव्यवस्था,,
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