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पीएसएलवी से जीएसएलवी
संपादकीय /  February 15, 2017

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बुधवार को अपनी प्रतिष्ठïा में उस समय और इजाफा किया जब उसे एक ही प्रक्षेपण यान से 104 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने में सफलता मिली। इसरो का पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) इससे पहले 38 उड़ान भर चुका है। अतिरिक्त बूस्टर के साथ इसे इतना क्षमतावान बनाया गया कि यह तकरीबन 1,400 किलोग्राम वजन वाले 104 उपग्रहों को ले जा सके। इन उपग्रहों की कक्षाओं का आकलन करना और उनका प्रबंधन करना अत्यंत जटिल कार्य था और इसरो को इस उपलब्धि के लिए निश्चित रूप से सराहा जाना चाहिए। इसके कुल वजन का आधा से अधिक तो कार्टोसैट उपग्रह था जो पृथ्वी का पर्यवेक्षण करता है। अन्य उपग्रहों में 100 से अधिक नैनो सैटेलाइट थे। इनमें से लगभग सारे कैलिफोर्निया की कंपनी प्लैनेट लैब के थे। यह कंपनी कुल 88 नैनो-सैटेलाइट का जत्था भेज रही है जिसे उसने डव्स नाम दिया है। प्लैनेट लैब का मानना है कि छोटे उपग्रहों का समूह अधिक प्रभावी ढंग से पृथ्वी की गतिविधियों को दर्ज कर सकता है, बनिस्बत बड़े उपग्रहों के। प्लैनेट लैब्स के उपग्रह पृथ्वी की सतह के चित्र खींचकर भेजेंगे जिनको गूगल को बेचा जाएगा। 

 
यह बात एकदम स्पष्ट है कि छोटे और अत्यधिक छोटे उपग्रहों का बाजार काफी बड़ा और आकर्षक है। ऐसे में इसरो इसका लाभ उठाकर अच्छा कर रहा है। यह बात खासतौर पर श्रेय देने लायक है क्योंकि आखिर है तो यह सरकारी संस्थान। अप्रैल 2008 में पीएसएलवी-सी9 की मदद से 10 उपग्रहों को कक्षा में भेजा गया। वह भी विश्व रिकॉर्ड था। गत जून में पीएसएलवी-सी34 के जरिये 20 उपग्रह और अब पीएसएलवी-सी 37 के जरिये 100 से अधिक उपग्रह अंतरिक्ष में रवाना किए गए। पीएसएलवी की मदद से अब तक कुल 179 विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया जा चुका है। औसतन देखा जाए तो इसरो साल में चार से पांच प्रक्षेपण करता है। निश्चित तौर पर उसने कई गैर वाािण्ज्यिक सफलताएं अर्जित की हैं। 
 
मसलन 2008 का चंद्रयान मिशन और मार्स ऑर्बिटर मिशन इसकी बड़ी उपलब्धियों में शामिल किए जाते हैं। इसरो ने क्रायोजनिक इंजन वाले रॉकेट भी सफलतापूर्वक छोड़े हैं। बहरहाल एजेंसी की मितव्ययता और लागत कम रखने की कोशिश की सराहना नहीं की जा सकती। उसकी सफलता को कम लागत से जोड़ कर देखा जा रहा है। आज देश के सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के समक्ष जो सीमाएं हैं उसमें भी उनकी लागत की भूमिका रही है। तकरीबन 1,400 किलोग्राम वजन को अंतरिक्ष में स्थापित करना भी निश्चित रूप से अपने आप में एक अहम उपलब्धि है लेकिन हमें दो बातों का ध्यान रखना होगा। पहली, चीन साल में कम से कम 20 प्रक्षेपण करता है और वाणिज्यिक बाजार की अपेक्षा अब लगभग 3,500 किलोग्राम से अधिक वजन के प्रक्षेपण की है। 
 
पीएसएलवी के साथ ऐसा करना दुष्कर साबित होगा। उसमें पर्याप्त क्षमता ही नहीं है। इसरो को अब जियोक्रायोजनिक सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल या जीएसएलवी की शीघ्र आवश्यकता है। इस दिशा में हमें कई नाकामियां हाथ लग चुकी हैं। समस्या यह है कि जीएसएलवी जहां इसरो के लिए अब स्थिर तकनीक नजर आ रही है, वहीं इसका निर्माण मूलतया रूसी तकनीक की मदद से किया गया था। स्थानीय स्तर पर बना क्रायोजनिक इंजन काफी अलग होता है। बहरहाल, गत वर्ष सितंबर में एक देसी क्रायोजनिक इंजन की मदद से जीएसएलवी का प्रक्षेपण किया गया था। यदि इसरो और उसकी वाणिज्यिक शाखा एंट्रिक्स अपनी महत्त्वाकांक्षाएं पूरी करना चाहते हैं तो यह बात अहम है कि वे अपने रॉकेट में बेहतरीन तकनीक का इस्तेमाल करें, बजाय कि छोटे और नैनो सैटेलाइट के बाजार में लागत के क्षेत्र में बढ़त हासिल करने के। 
Keyword: पीएसएलवी, जीएसएलवी, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, इसरो,
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