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रणनीतिक बिक्री से ही निकलेगा बैंकिंग क्षेत्र की सेहत का रास्ता
मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  February 13, 2017

केंद्रीय बजट 2017 में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) से हलकान बैंकिंग क्षेत्र को सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया गया है। सार्वजनिक बैंकों में केवल 10,000 करोड़ रुपये की पूंजी डालने का प्रस्ताव रखा गया है जबकि वित्तीय विश्लेषक फर्म एसऐंडपी ने 2.5 लाख करोड़ रुपये के पुनर्पूंजीकरण की जरूरत बताई थी। पिछले बजट में सरकारी बैंकों में 25,000 करोड़ रुपये डालने की बात कही गई थी। 

 
सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने बैंकों के एनपीए को एक 'दु:साध्य' समस्या बताते हुए कहा है कि बैंक भी अस्वस्थ चल रही कंपनियों का साथ नहीं छोड़ रहे हैं। इस समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि बैंकों के एनपीए की देखरेख के लिए एक संस्था बनाने का खर्च केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता है। भारी एनपीए का बोझ उठा रहे बैंकों के पास नए कर्ज देने के लिए पूंजी उपलब्धता कम हो गई है जिससे निवेश संवद्र्धन भी प्रभावित हो रहा है। फिच का अनुमान है कि 2016-17 में सभी बैंकों की कुल पूंजी में एनपीए का हिस्सा 12 फीसदी तक पहुंच चुका है। 
 
मोदी सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में सार्वजनिक क्षेत्र के 27 बैंकों के आपसी विलय की प्रक्रिया तेज करने पर काफी ध्यान दिया गया है। इसके जरिये छह बड़े सार्वजनिक बैंकों को सशक्त बनाने की तैयारी है। सरकार ने इन बैंकों के लिए अच्छे प्रबंधकों की तलाश करने और बैंकों के कामकाज में सुधार के लिए बैंक बोर्ड ब्यूरो का भी गठन किया है। लेकिन पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय की अगुआई वाले इस बोर्ड के वजूद में आने के एक साल बाद भी खास प्रगति नहीं दिख रही है। यहां तक कि स्टेट बैंक समूह के सहयोगी बैंकों का भी भारतीय स्टेट बैंक में विलय अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर ठीक काम कर रहे छोटे बैंकों के बड़े आकार वाले बैंकों में विलय के फैसले को भी आशंका से देखा जा रहा है। 
 
हाल की दो घटनाओं ने एक बार फिर उस मुद्दे को उठाया है कि सरकारी बैंक उस काम को कर सकते हैं जो निजी बैंक नहीं करना चाहते हैं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किए जाने के बाद सरकार ने बैंकिंग सुविधा को देश के दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाने के प्रयास किए थे। लेकिन एक समय के बाद शिथिलता आने लगी जिससे बड़ी आबादी बैंकिंग सुविधाओं से वंचित ही रही। वित्तीय समावेशन को तेज करने के लिए रिजर्व बैंक ने अच्छी तरह काम कर रहे लघु वित्तीय संस्थानों को लघु वित्तीय बैंक के रूप में काम करने का लाइसेंस दे दिया। इससे गरीब महिलाओं को कर्ज के रूप में बिना गारंटी वाली छोटी रकम देने की राह सुगम हुई और कर्ज की वसूली भी तेज रही। नए बैंकों का अनुभव यही बताता है कि बैंकिंग को अभी भी उन इलाकों में ले जाने की जरूरत है जो इसके दायरे के बाहर हैं।
 
नोटबंदी अभियान के दौरान लोगों को हुई भारी परेशानियों ने हमें यह अहसास दिलाया कि अब भी कितने बड़े स्तर पर बैंकिंग सुविधाओं की कमी है। ग्रामीण इलाकों के अलावा शहरों में भी कुछ हद तक गरीब लोग पर्याप्त बैंकिंग सुविधाओं के अभाव का शिकार हुए। इसकी वजह यह है कि ये लोग अधिकांशत: नकदी में ही लेनदेन करते हैं और बैंक तक जाने के लिए भी उन्हें अच्छी-खासी दूरी तय करनी पड़ती है। बैंकों ने वित्तीय समावेशन के तहत जो शाखाएं खोली भी हैं वे मूलत: कस्बाई इलाके ही हैं।
 
सच्चाई तो यह है कि सार्वजनिक बैंक अब ऐतिहासिक विकास की अपनी भूमिका पूरी कर चुके हैं और जितना जल्दी वे सरकारी नियंत्रण से मुक्त होते हैं, उतना ही बैंकिंग प्रणाली के लिए बेहतर होगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो सरकार इनमें एक के बाद एक पैसा डालती जाएगी। फिच की रिपोर्ट कहती है कि बेसल-3 मानकों को पूरा करने के लिए करीब छह लाख करोड़ रुपये की दरकार होगी। अगर हम मान लें कि सार्वजनिक बैंकों की पूंजीगत आवश्यकता 70 फीसदी तक बढ़ती है तो यह अगले वित्त वर्ष के लिए केंद्र सरकार के कुल अनुमानित राजस्व के 30 फीसदी के करीब पहुंच जाएगा। क्या यह सरकारी धन खर्च करने का बेहतर तरीका है? 
 
फिर सवाल यह है कि आगे का रास्ता क्या हो? एक रास्ता तो यह है कि सरकार मौजूदा समय की ही तरह वैश्विक और घरेलू अर्थव्यवस्था के तेजी पकडऩे की उम्मीद करे। कहा जा रहा है कि आर्थिक गतिविधियों के रफ्तार पकड़ते ही बैंकों की समस्याएं दूर हो जाएंगी। लेकिन खुद सुब्रमण्यन भी स्वीकार कर चुके हैं कि हाथ पर हाथ रखकर बैठने से काम नहीं चलेगा।  दूसरा विकल्प है कि बैंकों का परिचालन कमोबेश पुराने अंदाज में ही करते हुए उनका विलय और पुनर्पूंजीकरण जारी रखा जाए। लेकिन डर यही है कि कई साल बाद भी स्थिति शायद ही सुधर पाए। तीसरा विकल्प बैंकों की रणनीतिक बिक्री का है। राजनीतिक रूप से मुश्किल फैसला होने के साथ ही बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे बैंकों के लिए खरीदार खोज पाना भी आसान नहीं होगा। हाल ही में बंधन बैंक के मुख्य कार्याधिकारी ने मध्यम स्तर के एक सार्वजनिक बैंक को खरीदने के बारे में पूछे गए सवाल पर चुप्पी साध ली थी। 
 
ऐसे में इकलौता रास्ता यही है कि सूचना प्रौद्योगिकी का अधिकतम इस्तेमाल कर बैंकों कर्मचारियों की कार्यक्षमता को बढ़ाया जाए और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को भी प्रोत्साहित किया जाए। बैंक बोर्ड ब्यूरो भी बैंकों के शीर्ष प्रबंधन पर बेहतरीन पेशेवरों के नाम सुझाकर बैंकों की दक्षता सुधारने में सहयोग दे सकता है। दूरदराज के इलाकों में शाखाओं की मौजूदगी इन बैंकों की बड़ी खासियत है। यही उम्मीद है कि कुछ समय बाद इन बैंकों के लिए अधिक बोली लगाने वाले खरीदार सामने आएंगे।
 
Keyword: केंद्रीय बजट, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों, एनपीए, मुख्य आर्थिक सलाहकार, अरविंद सुब्रमण्यन,
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