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पारिस्थितिक स्थिरता पर निराश करता है बजट
श्याम सरन /  February 13, 2017

भारत को अब वृद्घि की ऐसी राह तलाश करनी होगी जहां वह नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का वह अधिक से अधिक इस्तेमाल करे। कैसे संभव है यह बता रहे हैं श्याम सरन

 
वर्ष 2017 के आम बजट को इस लिहाज से बेहतर बताया गया है कि इसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। इसके अलावा नोटबंदी की खराब तैयारी के साथ लाई गई योजना के बाद इस बजट ने उसके असर से सुधार की योजना भी पेश की। परंतु पारिस्थितिक स्थिरता की बात करें तो बजट में इसे लेकर कोई तेजी या जरूरी प्रयास नहीं नजर आते। जबकि देश के भविष्य की दृष्टिï से यह अत्यंत अहम है। 
 
इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है कि सरकार ने स्थिरता विकास लक्ष्य (एसडीजी) के अधीन जो प्रतिबद्घताएं की हैं उनको पूरा करने की दिशा में क्या प्रयास किए जाने हैं। राष्टï्रीय सौर मिशन जैसी योजनाओं में बढ़ा हुआ आवंटन जहां स्वागतयोग्य है, वहीं पेरिस जलवायु समझौते के अधीन देश ने जिस राष्टï्रीय प्रतिबद्घता सहयोग पर हस्ताक्षर किए हैं उसके क्रियान्वयन की कोई योजना नजर नहीं आती। राष्टï्रीय बजट में पारिस्थितिक मानकों को एकीकृत घटक के रूप में शामिल किया जाना चाहिए था और उसके लिए विभिन्न मद में खर्च और आवंटन की व्यवस्था की जानी थी ताकि पारिस्थितिक स्थिरता के लक्ष्य की दिशा में काम किया जा सके। 
 
बजट की घोषणा से महज एक सप्ताह पहले कहा गया था कि सरकार राष्टï्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (एनएपीसीसी) में पहले से शामिल आठ राष्टï्रीय मिशन में तीन और शामिल करने जा रही है। इनका संबंध जलवायु परिवर्तन के जन स्वास्थ्य पर प्रभाव, तटीय इलाकों और कचरे से ऊर्जा बनाने से है। बहरहाल, बजट में ऐसी कोई घोषणा नहीं की गई। इनके क्रियान्वयन के लिए आवंटन तो दूर की कौड़ी है। 
 
उम्मीद है कि 400 रुपये प्रति टन की दर वाला कोयला उपकर बरकरार रहेगा। यह स्वच्छ ऊर्जा फंड में अहम योगदान वाला उपकर है। इसका इस्तेमाल भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में किया जा सकता है। कुछ वर्ष पहले इसके केवल स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण कोष का नाम देकर इसके उद्देश्य को ही बदल दिया गया था। इसके अलावा पर्यावरण संबंधी कई परियोजनाओं को इसमें शामिल कर दिया गया था। गंगा सफाई योजना भी इसमें शामिल कर दी गई। कोयले से मिला सारा उपकर भी फंड में नहीं दिया गया और अभी भी व्यय और फंड की उपलब्धता में अंतर बरकरार है। चालू वित्त वर्ष के आखिर में फंड कुल 54,336 करोड़ रुपये की राशि एकत्रित हो जाएगी। कोयला उपकर के उपयोग के लिए तत्काल पारदर्शी नियम बनाए जाने की आवश्यकता है। यह भी स्पष्टï किया जाना चाहिए कि आखिर क्यों सारी एकत्रित राशि कोष में नहीं जानी चाहिए और क्यों इसका इस्तेमाल केवल स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने में नहीं किया जाना चाहिए। 
 
कृषि और सिंचाई पर आम बजट में ध्यान दिया जाता है और यह समझा जा सकता है। किसानों की आय को पांच साल के भीतर दोगुना करने की प्रतिबद्घता सराहनीय है। लेकिन सरकार ने इसके लिए जो उपाय प्रस्तावित किए हैं वे पारस्थितिक स्थिरता की दृष्टिï से सही नहीं हैं। कृषि क्षेत्र गहन कृषि विकास कार्यक्रम के खराब परिणामों से जूझ रहा है जबकि सन 1960 के दशक में हरित क्रांति के पहले चरण में यह खासा सफल रहा था। इस तरीके में हाइब्रिड बीज, पानी, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों समेत तमाम तकनीक का इस्तेमाल करके  फसल की उत्पादकता में इजाफा किया गया था। उसके बाद यह नीति धीरे-धीरे नाकाम होने लगी। अब इसे लगातार जारी रखने का अर्थ है मिट्टïी की उर्वरता कम करना, खानेपीने की चीजों में जहर बढ़ाना और तमाम देश में भूजल स्तर का कम होना। बढ़ती उर्वरक सब्सिडी से यह समस्या और बढ़ेगी। देश का बड़ा हिस्सा पहले ही इससे प्रभावित है।
 
सिंचाई के लिए पानी की कमी नतीजों को प्रभावित करेगी यह तय है। इस बात को भी ध्यान में नहीं रखा जा रहा है कि किसानों और उनके परिवारों पर कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का कितना बुरा असर पड़ रहा है। अगर सरकार स्वास्थ्य को लेकर नया जलवायु परिवर्तन मिशन लागू करने को लेकर उत्सुक है तो उसे मौजूदा कृषि नीति की समीक्षा करनी चाहिए। एनएपीसीसी को जून 2008 में अंगीकृत किया गया और इसमें आठ अंतर्संबंधित राष्टï्रीय मिशन थे। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि, जल, वन, ऊर्जा किफायत और शहरीकरण आदि शामिल हैं। इनमें से केवल सौर मिशन के क्षेत्र में ही अच्छी प्रगति हुई है। जबकि शेष की बात करना ही बेमानी है। यह दुखद है क्योंकि पारिस्थितिकी स्थिरता केवल तभी हासिल होगी जब हर क्षेत्र में समान प्रगति होगी। हर सालाना बजट में एनएपीसीसी के लक्ष्यों के लिए अलग से आवंटन किया जाना चाहिए ताकि तय लक्ष्य हासिल हो सकें। मौजूदा बजट में निष्कर्ष आधारित रुख की बात है। पारिस्थितिकी स्थिरता संबंधी चुनौतियों से पार पाने के लिए यह आवश्यक है।
 
अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप राष्टï्रपति बन चुके हैं और अब इस बात की काफी संभावना है कि पेरिस जलवायु समझौते और एसडीजी को लेकर बनी अंतरराष्टï्रीय सहमति को खतरा उत्पन्न हो जाए। ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिका में उद्योग जगत के जीवाश्म ईंधन के प्रयोग पर प्रतिबंध को शिथिल किया जाएगा या खत्म कर दिया जाएगा। अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी अपने-अपने हिसाब से अमेरिका का अनुसरण कर सकती हैं। ऐसे में भारत को क्या करना चाहिए? हमारे देश में बहस हमेशा ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से निपटने के दो धु्रवों पर झूलती रहती है। वास्तव में भारत को इन दोनों ही क्षेत्रों में मौजूदा स्थिति को बदलना होगा। हमें अधिक से अधिक मात्रा में सौर ऊर्जा तथा अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों मसलन नाभिकीय ऊर्जा आदि का इस्तेमाल करना होगा। जरा इस बात पर विचार कीजिए कि भारत फिलहाल अपना 70 फीसदी तेल आयात करता है और यह 2030 तक बढ़कर 90 फीसदी हो जाएगा। यह ऊर्जा सुरक्षा तो नहीं है। बजट इस बात को समझने में नाकाम रहा है। 
 
यह बात स्पष्टï है कि आर्थिक आकांक्षाओं का पश्चिमी शैली का निर्धारण भारत जैसे देश में व्यावहारिक नहीं है। इसके लिए हमें राजनीतिक बहस में तब्दीली लानी होगी। साथ ही सामाजिक रुख में भी बदलाव लाते हुए इन तमाम चीजों को पारिस्थितिक स्थिरता से जोडऩा होगा। यह हमारी नागरिक सभ्यता का भी मूल्य रहा है। एक ऐसी सरकार जो पुरातन मूल्यों की स्थापना की बात करती है वह अगर प्रकृति और पारिस्थितिकीय अखंडता को एक साथ लाए तो यह बेहतर बात होगी। 
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। वह फिलहाल सीपीआर में वरिष्ठï फेलो हैं)
Keyword: नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत, आम बजट, विकास लक्ष्य, एसडीजी,
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