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शिव सेना फिर खुद को स्थापित करने की कर रही है कोशिश?
सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  February 12, 2017

 शिव सेना हाल ही में दो विरोधाभासों के कारण सुर्खियों में रही। बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव (संयोग से इन चुनावों में कम से कम एक उम्मीदवार के पास 680 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है) से पहले शिव सेना ने महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ संबंध तोड़ दिए। लेकिन पार्टी के मंत्री अभी सरकार में बने हुए हैं। ऐसा लग रहा है कि वे कहीं नहीं जा रहे हैं। दूसरा विरोधाभास और ज्यादा तीखा है। शिव सेना ने एकतरफा यह घोषणा कर दी कि गुजरात में इस साल के आखिर या अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद अगली बार हार्दिक पटेल उसके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। पटेल की उम्र अभी 23 साल है और वह चुनाव भी नहीं लड़ सकते, मुख्यमंत्री बनना तो दूर की बात है। पटेल ने तुरंत स्पष्टïीकरण देते हुए कहा, 'मैं अभी लोगों से मिलकर उनका समर्थन हासिल कर रहा हूं, राजनीति नहीं कर रहा हूं। मेरा संबंध एक साधारण किसान परिवार से है और मैं सिद्घांतों की लड़ाई लड़ रहा हूं। मैं मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहता हूं मैं एक आम आदमी बनना चाहता हूं।' शिव सेना को उनका 'धन्यवाद लेकिन मैं इच्छुक नहीं हूं', यह संदेश साफ भी था और गोलमोल भी। इसमें पटेल का जवाब ही नहीं बल्कि शिव सेना की पेशकश भी दिलचस्प है। इससे पता चलता है कि पार्टी में चीजें कैसे बदल गई हैं।

 
बाल ठाकरे के निधन के बाद शिव सेना में एक शून्य पैदा हो गया। एमजीआर और मुलायम सिंह यादव के साथ-साथ ठाकरे हमेशा भारत में राजनीतिक चातुर्य के लिए याद किए जाएंगे। 1960 के दशक में भाषाई आधार पर आधुनिक महाराष्ट्र राज्य के निर्माण के लिए शुरू हुए संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन का खुमार उतरने लगा था। चूंकि इस आंदोलन में मुंबई को राजधानी बनाने का वादा किया गया था, लिहाजा मुंबई के मराठी युवकों ने बढ़चढ़कर इसमें हिस्सा लिया था और गिरफ्तारियां दीं। लेकिन इसकी कड़वी सच्चाई अब उनके सामने आ रही थी। 
 
मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी तो बन गई लेकिन इसका नियंत्रण वास्तव में महाराष्ट्र वालों के हाथों में नहीं था। कारोबार पर गुजरातियों, मारवाडिय़ों और पारसियों का दबदबा था और बड़ी नौकरियां दक्षिण भारतीयों के पास जा रही थीं जो अंग्रेजी, अकाउंटेंसी और शॉर्टहैंड में दक्ष थे। मुंबई के नए शासकों यानी मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को शहरी महाराष्टï के युवकों की चिंता नहीं थी क्योंकि उनका चुनाव क्षेत्र राज्य के दूरदराज के क्षेत्रों में था। ठाकरे ने 'फ्री प्रेस जर्नल' में कार्टूनिस्ट की नौकरी छोड़कर नया प्रकाशन शुरू किया। यह ब्रितानी पत्रिका पंच की तर्ज पर थी। उन्होंने इसे 'मार्मिक' नाम दिया। 
 
कार्टूनों के माध्यम से इसने खुद को ऐसे प्रकाशन के रूप स्थापित किया जो गैर महाराष्ट्री जैसे गुजराती सेठ, दक्षिण भारतीय क्लर्क, उडुपी होटल मालिक और कांग्रेस के नेताओं पर व्यंग्य कसता था। जल्दी ही पत्रिका ने एसबीआई, आरबीआई, एयर इंडिया और एलआईसी जैसे सार्वजनिक उपक्रमों में भर्ती होने वाले लोगों की सूची भी छापनी शुरू की। इसका मकसद यह बताना था कि इन भर्तियों में स्थानीय लोगों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इस सूची को नाम दिया गया, 'वाचा आणि स्वस्थ बसा' यानी पढ़ो और चुप रहो। 'मार्मिक' की सफलता से बड़ी संख्या में युवाओं का झुकाव ठाकरे की तरफ हुआ जिसकी बदौलत 19 जून, 1966 में शिव सेना का गठन हुआ। शिव सेना को मुंबई में लोकप्रियता मिली लेकिन यह मुंबई और ठाणे तक ही सीमित रही। इसका कारण यह था कि महाराष्ट्र के बाकी इलाके के लोगों ने बाहरी लोगों को खतरे के रूप में नहीं देखा। यहां तक कि 1980 के दशक की शुरुआत में शिव सेना मुंबई में ही हाशिये पर चली गई थी लेकिन इसका जोश बरकरार रहा। ऐसे में पार्टी को फिर से खुद को स्थापित करने की जरूरत थी। 
 
युवा प्रमोद महाजन और सेना के नेतृत्व ने इस मौके को ताड़ लिया। 1984 में भाजपा और शिव सेना का गठबंधन बना। हालांकि गठबंधन को महाराष्ट्र में एक भी सीट नहीं मिली लेकिन मुंबई में उसे अच्छे खासे वोट मिले। 1985 में मुंबई महानगरपालिका के चुनावों में शिव सेना ने जबरदस्त बहुमत हासिल किया। इतनी शानदार सफलता तो पार्टी को तब भी नहीं मिली थी जब दक्षिण भारतीयों के खिलाफ आंदोलन चरम पर था। छगन भुजबल मुंबई के महापौर बने। उसी साल शिव सेना और भाजपा के रास्ते अलग हो गए और दोनों ने अलग-अलग विधानसभा चुनाव लड़ा। तब तक ठाकरे की महत्त्वाकांक्षा बढ़ गई थी और वह पूरे महाराष्ट्र में पैर जमाने की कोशिश में जुट गए। दरअसल रामजन्मभूमि आंदोलन और शाह बानो मामले से उन्हें हिंदू मतों के धु्रवीकरण का अहसास हो गया था और उन्होंने खुद को हिन्दुत्व का झंडाबरदार के तौर पर पेश करने का फैसला किया। लिहाजा शिव सेना ने 'महाराष्ट्र महाराष्ट्र वालों के लिए' का नारा छोड़कर हिन्दुत्व का नारा अपना लिया।
 
इतिहास के इस लंबे अध्याय का लब्बोलुबाब यह है कि क्या शिव सेना एक बार फिर से खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रही है? और पटेल को न्योता देना क्या जाति केंद्रित नई राजनीतिक कोशिश नहीं है? सेना के मुखपत्र सामना में मराठों की आरक्षण की मांग का मजाक उड़ाया गया था। इस पर पार्टी की काफी किरकिरी हुई थी। यह एक अपवाद था। वर्ष 2014 के आम चुनावों में बड़ी संख्या में मराठों ने शिवसेना को वोट दिया। अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित मतदाताओं के अच्छे खासे वोट भी पार्टी को मिले। महाराष्ट्र में शिव सेना का अपना दलित आधार बढ़ाना समझ में आता है। हालांकि वह हमेशा इस बात को लेकर सतर्क रहती है यह विस्तार मराठा वोटों की कीमत पर नहीं हो सकता। लेकिन गुजरात में ऐसा करना? पटेल का समर्थन मतलब भाजपा के साथ एक और पंगा लेना। इसका मतलब यह है कि पार्टी सोचसमझकर मराठी माणूस के विचार की जगह पाटीदार समर्थक, मराठा समर्थक की अपील को आगे बढ़ा रही है। हालांकि पुख्ता तौर पर यह कहने के लिए अभी और साक्ष्यों की जरूरत है लेकिन लगता है कि शिव सेना फिर बदल रही है।
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