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कठिन हालात में बेहतर बजट
शंकर आचार्य /  February 12, 2017

उठापटक भरे और अनिश्चित माहौल में पेश किए गए वर्ष 2017-18 के बजट को अच्छा कहा जा सकता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं शंकर आचार्य 

 
कई लोगों ने वर्ष 2017 के आम बजट की परोक्ष आलोचना की। किसी ने इसे रूढि़वादी बताया तो किसी ने कारीगरी भरा। किसी ने कहा कि यह बीच राह में छोड़ देता है, किसी का नुकसान नहीं करता तो किसी ने इसे सबको प्रसन्न करने वाला बजट बताया। यह सही नहीं है। अगर यह कोई सामान्य वर्ष होता तो शायद इस आलोचना को ठीक माना भी जा सकता था। लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं है। इस वक्त बजट निर्माण की प्रक्रिया असाधारण रूप से कठिन है। कहा जा सकता है कि वर्ष 1991 की गर्मियों के बाद से यह सर्वाधिक कठिन वक्त है। जेटली और उनकी टीम ने इस कठिन समय में बहुत अच्छा बजट पेश किया है जिसके लिए उसकी सराहना की जानी चाहिए। वे बहुत आसानी से लोकलुभावन वाद और कुछ साहसी कदमों के मिश्रण वाला बजट तैयार कर सकते थे। 
 
जरा कुछ चुनौतियों पर विचार करें। देश की अर्थव्यवस्था और इसकी वित्तीय स्थिति गत नवंबर में घोषित की गई नोटबंदी के व्यापक और असाधारण प्रभाव से जूझ रही है। इसके प्रभाव के दायरे का अंदाज केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा वर्णित आंकड़ों तक से नहीं लगाया जा सकता है। ये आंकड़े तयशुदा समय से एक माह पहले जारी कर दिए गए। इस बीच बजट निर्माण से जुड़े अधिकारी तथा अन्य लोग आर्थिक वृद्घि के मजबूत अनुमानों की कमी से जूझते रहे। जुलाई से सितंबर तिमाही में देश के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था में स्थानांतरित हो जाने की उम्मीद है। ऐसे में अप्रत्यक्ष कर से जुड़े अनुमान बहुत हद तक अप्रत्याशित और अनिश्चित हैं। रेलवे बजट को आम बजट में शामिल किए जाने और योजनागत, गैर योजनागत खर्च के अंतर को खत्म करने की भी अलग चुनौतियां हैं। बजट टीम को न केवल नोटबंदी का उचित प्रबंधन करना था बल्कि जीएसटी वार्ता के अंतिम चरण में होने के कारण उसे लेकर भी पूरी तैयारी करनी थी। इन तमाम बातों के लिए समय, संसाधन और तवज्जो तीनों आवश्यक थे। बजट की तिथि को लेकर सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग में शिकायत की गई थी लेकिन उससे कोई राहत नहीं मिली। इस बीच वैश्विक घटनाओं ने विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था के समक्ष नई चुनौतियां पेश की थीं। 
 
इन तमाम अनिश्चितताओं और दिक्कतों के बीच वर्ष 2017-18 का आम बजट स्थिर और अग्रगामी सोच का बना रहा। इस बजट में कई खूबियां हैं। मैं उनमें से केवल कुछ की बात करूंगा:
 
राजकोषीय घाटे के जीडीपी के 3.2 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है। इस दृष्टिï से बजट दूरदर्शी है। जो लोग धीमी अर्थव्यवस्था में तेज आर्थिक प्रोत्साहन की मांग कर रहे हैं, उन्हें मैं यही बताना चाहूंगा कि केंद्र सरकार की पिछले वर्ष के वेतन बढ़ोतरी का अनुकरण राज्य सरकारों के घाटे का विस्तार कर सकता है। इसमें अगर नोटबंदी के प्रभाव और जीएसटी के लागू होने के बाद की स्थिति को शामिल कर दें तो हालात ज्यादा खराब हो सकते हैं। काफी आशंका है कि यह संयुक्त घाटा जीडीपी के 6.5 फीसदी के आसपास जा पहुंचे। 
 
कुल व्यय वृद्घि जहां 6.6 फीसदी पर सीमित है, वहीं बुनियादी ढांचा, कृषि और ग्रामीण विकास तथा पूंजीगत व्यय जैसी प्राथमिकताओं के लिए बढिय़ा समर्थन मौजूद है।
 
चुनावी बॉन्ड का प्रस्ताव एक अच्छी पहल है। इससे राजनीतिक फंडिंग से काले धन और नकदी को खत्म करने में मदद मिलेगी। 
 
बजट में लोकलुभावन कदमों से दूरी बनाई गई है। नई व्यय योजनाओं मसलन सार्वभौमिक मूलभूत आय योजना भी नहीं लाई गई। वैसे भी मौजूदा हालात में यह निहायत खराब मानी जाती। जैसा कि अन्य लोगों ने भी कहा। यह मौजूदा सब्सिडी वाली योजनाओं के समान एक और बोझ साबित होती, न कि उनका स्थानापन्न। - इसने अनुपालन बढ़ाने के लिए एकल या दोहरी लेकिन घटी हुई आयकर दर के विचार का भी प्रतिरोध किया है। हालांकि आयकर की शीर्ष दर को सन 1985 से अब तक आधा किया जा चुका है लेकिन अनुपालन में किसी नाटकीय सुधार का संकेत फिर भी नहीं मिला। इसके अतिरिक्त व्यापक अफवाहों के पूंजी बाजार को लेकर मूलभूत कर व्यवस्था में कोई छेड़छाड़ नहीं की गई। 
 
चमड़ा और जूता-चप्पल उद्योग में रोजगार को बढ़ावा देने वाली योजना का विस्तार बहुत हद तक स्वागत करने वाली बात है। यह वैसी ही योजना है जैसी कुछ महीने पहले वस्त्र क्षेत्र के लिए शुरू कर गई थी। इस व्यवस्था को श्रम आधारित विनिर्माण जगत के अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जाना चाहिए। ठ्ठ बजट प्रक्रिया में सुधार करके उसे एक महीने पहले कर देना और उसकी संसदीय स्वीकृति का काम 31 मार्च तक पूरा कर लेने का कदम वाकई काबिले तारीफ है। ऐसा करने से यह सुनिश्चित होगा कि अप्रैल के आरंभ में व्यय संबंधी तमाम काम पूरे कर लिए जाएं। यह हो सका तो बजट प्रक्रिया में हुई देरी की वजह से सरकारी कामकाज में देरी नहीं होगी। 
 
कोई भी बजट खामियों से मुक्त नहीं होता। यह भी अपवाद नहीं है। पहली बात, सरकारी बैंकों की समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। जबकि बैंकों के ऋण का 20 फीसदी हिस्सा फंसे हुए कर्ज का है। यही वजह है कि बैंकों के ऋण और निजी निवेश दोनों में ठहराव है। आर्थिक समीक्षा में इसे दोहरी बैलेंस शीट की समस्या कहा गया है। यह समस्या जल्दी समाप्त होने वाली नहीं दिखती। इसका हल जितनी जल्दी तलाश किया जाए उतना अच्छा। 
 
दूसरा, सरकार ने भले ही यह दिखाया है कि प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण की योजना व्यापक सफलता वाली रही है, खासतौर पर घरेलू गैस की सब्सिडी परंतु बजट ने अन्य प्रमुख सब्सिडी मसलन उर्वरक और खाद्य सब्सिडी के लिए ऐसी पहल की घोषणा नहीं की। कुल सरकारी व्यय में इनकी हिस्सेदारी 10 फीसदी के करीब है। तीसरी बात, वित्त विधेयक खोजबीन और जब्ती के मौजूदा प्रावधानों को मजबूत करता है। आयकर अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाए बिना उनको अधिकार संपन्न बनाया जा रहा है। नोटबंदी के बाद के परिदृश्य में यह अच्छी बात नहीं क्योंकि इस अवधि में खातों की खोजबीन और जांच की संभावना काफी बढ़ी है। ऐसे में यह शंका भी है कि आकलितों को परेशान किया जा सकता है या उनके साथ मनमाना व्यवहार किया जा सकता है। ऐसे मामले देखे भी जा रहे हैं। चौथी बात, आयकर में 10 फीसदी के प्रवेश स्तर के शुल्क की जगह पांच फीसदी कर करने से इस कर का पूरा ढांचा थोड़ा विचित्र हो गया है। पांचवीं बात यह कि रक्षा व्यय के लिए आवंटन काफी कम है। कुल मिलाकर देखा जाए तो वित्त मंत्री और उनकी टीम को कठिन परिस्थितियों में बढिय़ा बजट तैयार करने के लिए बधाई दी जानी चाहिए।
 
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