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समय पर रिटर्न भरें वरना जुर्माना अदा करें
प्रिया नायर /  February 12, 2017

अगर आप आयकर रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं या देर से दाखिल करते हैं तो अगले वित्त वर्ष यानी 2017-18 से आपको मुश्किल हो जाएगी। लेकिन अगर आपको कर संबंधी नोटिस मिलेगा तो उसमें अनावश्यक पूछताछ नहीं होगी और अगर आपने अपील दाखिल की है तो आपको लंबा इंतजार भी शायद नहीं करना पड़े। इस बार के बजट में ऐसे कई प्रावधान किए गए हैं, जिनसे लोगों को रिटर्न दाखिल करने के लिए बढ़ावा मिलेगा और जो आयकर भरते हैं तथा रिटर्न दाखिल करते हैं, उनके लिए कई मुश्किलें खत्म हो जाएंगी।

 
रिटर्न में देर तो लगेगा शुल्क
 
फिलहाल करदाता यदि समय पर रिटर्न फाइल नहीं करता है तो उससे जुर्माना वसूले जाने की व्यवस्था है। लेकिन जुर्माना लगाना या नहीं लगाना कर अधिकारियों की मर्जी पर निर्भर करता है और उसे रिटर्न दाखिल करने के बाद भी भरा जा सकता है। बहरहाल जुर्माना तभी लगाया जाता है, जब यह साबित हो जाता है कि करदाता ने रिटर्न जानबूझकर दाखिल नहीं किया। इसीलिए तकनीकी रूप से रिटर्न को अगले वित्त वर्ष के अंत तक टालना अभी मुमकिन है। इसका मतलब है कि वित्त वर्ष 2016-17 के लिए रिटर्न 31 जुलाई, 2017 तक भरे जाने हैं, लेकिन अगर आप पर किसी तरह की कर देनदारी नहीं बनती है (अगर आपकी आमदनी केवल वेतन से होती है और समूचा कर स्रोत पर ही काट लिया गया है) तो आप रिटर्न को 31 मार्च, 2018 तक टाल सकते हैं। इसलिए अगर आप पर जुर्माना लगना भी होगा तो वह 31 मार्च, 2018 के बाद ही लगेगा। लेकिन जुर्माना लगाने से पहले आकलन अधिकारी आपको लिखित आदेश देगा। उसके बाद करदाता को यह बताने का मौका दिया जाएगा कि उसने रिटर्न दाखिल क्यों नहीं किया।
 
लेकिन अब जुर्माने को शुल्क में बदल दिया गया है। अगर आकलन वर्ष 2018-19 के लिए रिटर्न तय तारीख यानी 31 जुलाई 2018 के एक दिन बाद भी दाखिल किया जाता है तो शुल्क देना होगा। 31 दिसंबर 2018 तक रिटर्न फाइल कर दिया गया तो 5,000 रुपये शुल्क होगा और उसके बाद यानी 1 जनवरी, 2019 से शुल्क बढ़कर 10,000 रुपये हो जाएगा। चूंकि यह शुल्क है, इसलिए कर रिटर्न दाखिल करते समय साथ में इसे भी चुकाना होगा। 
 
सेबी के साथ पंजीकृत वित्तीय सलाहकार हर्ष रूंगटा का कहना है, 'यह स्वागतयोग्य कदम है क्योंकि इसके पीछे अनुपालन को बढ़ावा देने का मकसद है। रिटर्न दाखिल करने में एक दिन की भी देर हुई तो शुल्क चुकाना पड़ेगा। कई वेतनभोगी अक्सर रिटर्न इसीलिए दाखिल नहीं करते हैं क्योंकि उन पर किसी तरह की कर देनदारी ही नहीं होती। लेकिन अब यह मुमकिन नहीं होगा।'
 
घटेगा बेजा पूछताछ का खटका
 
बजट में नोटिस को केंद्रीकृत तरीके से जारी करने, जानकारी तथा दस्तावेजों की प्रोसेसिंग करने और उसके परिणाम को आकलन अधिकारी के पास पहुंचाने के लिए एक योजना का प्रस्ताव रखा गया है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि अगर किसी रिफंड की जांच की जाती है तो आकलन अधिकारी को उस मामले के विशेष बिंदुओं पर ही बात करनी होगी। हालांकि करदाता से केंद्रीकृत प्रोसेसिंग केंद्र द्वारा बताए गए मुद्दों के अलावा भी जानकारी मांगने का अधिकार उसके पास है। लेकिन उसे आकलन अधिकारी द्वारा प्रताडऩा बताकर चुनौती दी जा सकती है क्योंकि पूरी प्रक्रिया अब केंद्रीकृत तरीके से होगी। यदि प्रक्रिया को उचित तरीके से लागू किया गया और उसकी निगरानी की गई तो बेजा जांच और आकलन की गुंजाइश कम हो जाएगी।
 
संक्षिप्त आकलन अनिवार्य
 
यदि रिफंड का दावा हो तो अभी उस मामले में आयकर विभाग को संक्षिप्त आकलन करना होता है। लेकिन अक्सर विभाग संक्षिप्त आकलन को आखिरी समय तक टालता रहता है और उसके बजाय जांच अथवा विस्तृत आकलन का नोटिस जारी कर देता है। बहरहाल अब बजट ने संक्षिप्त आकलन को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव पेश किया है चाहे दावे की जांच की जाए या नहीं। इससे भी रिफंड में लगने वाला समय काफी घट जाएगा।
 
जांच नोटिसों का तेजी से निपटारा
 
पहले अगर आपको जांच का नोटिस मिलता था तो आकलन को पूरा करने के लिए 21 महीने की मियाद दी जाती थी। लेकिन आकलन वर्ष 2017-18 के लिए इसे घटाकर 18 महीने कर दिया गया है। आकलन वर्ष 2018-19 के लिए इसमें और कटौती करते हुए इसे 12 महीने कर दिया गया है। पीडब्ल्यूसी इंडिया में पार्टनर एवं लीडर (व्यक्तिगत कर) कुलदीप कुमार कहते हैं, 'इससे जांच के मामलों का तेज निपटान सुनिश्चित होगा और समाधान की प्रक्रिया में तेजी आएगी।' इस प्रावधान में एक और सकारात्मक बात यह है कि यदि जांच के लिए चुने गए दावे में रिफंड दिया जाना है तो उच्चाधिकारियों के आदेश के बगैर आकलन अधिकारी उसे रोककर नहीं रख सकता है। कुमार बताते हैं कि आकलन अधिकारी को रिफंड रोकने की वजह बतानी होगी और वह एकतरफा निर्णय नहीं ले सकता।
 
पुनर्विकास पूरा होने पर ही कर
 
जो लोग अपनी भूमि का विकास एक साथ मिलकर कर रहे हैं या मौजूदा हाउसिंग सोसाइटी का पुनर्विकास बिल्डर के साथ मिलकर कराना चाहते हैं, उनके लिए संपत्ति पर लगने वाले कर को स्पष्टï कर दिया गया है। अभी किसी भी जमीन पर विकास किया जाता है या किसी इमारत का पुनर्विकास किया जाता है ता बिल्डर मालिक को या तो नकद देता है या मकान देता है या मकान और नकद दोनों साथ देता है। लेकिन सवाल यह है कि मालिक से मकान के लिए कर कब वसूला जाना चाहिए क्योंकि समझौते पर दस्तखत करने के कुछ साल बाद ही उसे मकान मिल पाएगा?
 
बजट में यह स्पष्टï किया गया है कि इस तरह के फ्लैट के मालिक से कर तभी से लगेगा, जब उसके पास मकान पूरा होने का प्रमाण पत्र आ गया हो। इसका मतलब यह है कि मकान के मालिक को कर तभी चुकाना होगा, जब संपत्ति यानी मकान पर उसका कब्जा हो गया हो। इससे यह बात भी साफ हो गई है कि स्टांप शुल्क का भुगतान कब करना होगा। स्टांप शुल्क की गणना मकान की उस वक्त की कीमत के अनुसार की जाएगी, जब उसकी चाबी मकान मालिक के हाथ में आएगी। इससे उस वक्त भी सहूलियत होगी, जब मकान बेचा जाएगा क्योंकि खरीद पर हुए खर्च को कर चुकाते वक्त मकान की कीमत माना जाएगा।
Keyword: आयकर रिटर्न, जुर्माना, नोटिस,
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