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श्रम पर परिश्रम
साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  February 10, 2017

नोटबंदी की कवायद के बाद सरकार एक और बड़ा लेकिन विवादास्पद कदम उठा सकती है। यह कदम देश के औद्योगिक श्रम से संबंधित कानूनों में बदलाव से संबद्ध हो सकता है। करीब तीन साल के कार्यकाल में मोदी सरकार की आलोचना की एक प्रमुख वजह यह रही है कि वह श्रम सुधार के मुद्दे पर अपेक्षित कदम नहीं उठा सकी है। आलोचकों का कहना है कि विनिर्माण गतिविधियों के अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाने की एक वजह यह भी रही है। तमाम आलोचना के बावजूद यह स्पष्टï नहीं है कि संबंधित प्रस्तावों को राज्यसभा में स्वीकृति मिल भी पाएगी या नहीं। गौरतलब है कि संसद के इस उच्च सदन में भारतीय जनता पार्टी और उसके गठबंधन साझेदार अल्पमत में हैं। 

 
अगर संसद इन सुधारों को मंजूरी नहीं देती है तो यह वास्तव में दुखद होगा क्योंकि प्रस्तावित बदलावों में छोटी कंपनियों के कामकाज को लचीला बनाने, छंटनी किए जाने वाले कार्मिकों को बेहतर हर्जाना देने, श्रम संगठनों को बेहतर प्रतिनिधित्व स्वरूप देने और न्यूनतम वेतन भत्तों का नया खाका तैयार करने जैसी बातें शामिल हैं। बीते दो वर्ष से इन प्रस्तावों को लेकर चर्चा चल रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के हालिया आम बजट में भी उनका हल्का सा उल्लेख मिला। परंतु कांग्रेस पहले ही इसे लेकर अपना विरोध जता चुकी है। ऐसे में हमें संसद में एक और बार गतिरोध के लिए पूरी तरह तैयार रहना चाहिए। हालांकि इस मामले में छोटे दल अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
 
अगर नए कानूनों (44 मौजूदा कानूनों को चार व्यापक संहिताओं में बांटा जाएगा जो क्रमश: वेतन भत्तों, सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षा नियम और श्रम संगठनों से संबद्घ होंगे) के पारित होने के बाद वे गत वर्ष शुरू किए गए सुधारों की प्रक्रिया के भी सिरमौर बन जाएंगे। इससे पहले कपड़ा एवं परिधान उद्योग के कामकाज को लचीला बनाने से संबंधित और अप्रेंटिस कानून में संशोधन आदि पारित किए जा चुके हैं। इनमें से अंतिम यानी अप्रेंटिस के तहत कर्मचारियों को काम सीखते हुए भी आय अर्जित करने का मौका मिलता है। उनके प्रशिक्षण के साथ ही उनके वास्तविक रोजगार की संभावनाएं जुड़ी  रहती हैं। इसकी मदद से कौशल विकास को बल मिलेगा और आने वाले दिनों में अप्रेंटिस करने वालों की संख्या में भी तेजी से इजाफा होगा। अन्य चीजों के अलावा अप्रेंटिस के तौर पर कंपनी से जुडऩे वालों को बेहतर भुगतान की व्यवस्था भी इसमें शामिल है। 
 
एक प्रस्ताव जिसकी कड़ी आलोचना होने की आशंका है उसे करीब दो दशक पहले तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने अपने बजट भाषण में रखा था। इसके तहत 300 (फिलहाल यह सीमा 100 है) कर्मचारियों वाली कंपनी बिना सरकार की मंजूरी के अपना परिचालन बंद कर सकती है। अगर इसे मंजूरी मिल गई तो बड़ी संख्या में कंपनियां एक ऐसे पुराने कानून की जद से बाहर आ जाएंगी जिसका कोई अन्य उदाहरण शायद फिलहाल दुनिया के किसी अन्य देश में देखने को नहीं मिलता हो। एक प्रावधान और ऐसा है जो सन 1990 के दशक में पहली बार सामने आया था: इसके मुताबिक निकाले गए लोगों को हर कार्य वर्ष के 45 दिन के हिसाब से भुगतान किया जाना चाहिए। फिलहाल यह सीमा 15 दिन है। छंटनी को आसान बनाया जाना चाहिए लेकिन उसकी लागत अधिक होनी चाहिए ताकि कंपनियां इसे हल्के में न लें। 
 
अन्य उदार प्रस्तावों में फैक्टरीज अधिनियम की तरह अनुबंधित श्रमिकों के मामले में, श्रम संगठनों के निर्माण के मामले में मानक स्तर तय करना शामिल है। कुलमिलाकर छोटी इकाइयों को मुक्त श्रम बाजार मिलेगा। दलील यह है कि श्रम बाजार को संगठित और असंगठित दो हिस्सों में बांटने (पहले के लिए सख्त नियम और दूसरा नियमविहीन) से अस्पष्टïता व्याप्त है जिसे दूर किया जाना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद हालात बदलेंगे। गौरतलब है कि फिलहाल 90 फीसदी गैर कृषि कर्मी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं जहां उत्पादकता और मेहनताना दोनों कम हैं। 
 
अगर मोदी और उनके साथी नहीं चाहते हैं कि इस देर से हो रहे लेकिन स्वागतयोग्य सुधार का हश्र भी उनकी सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून की तरह हो तो उसे अत्यंत सावधानीपूर्वक काम करना होगा और संसद में भी अतिरिक्त सतर्कता का परिचय देना होगा। यह इस बात का परीक्षण भी होगा कि प्रधानमंत्री को पता है या नहीं कि उनको सदन में किस हद तक समर्थन हासिल है।
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