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रक्षा आवंटन में नई सोच की दरकार तभी सैन्यबल बन पाएंगे असरदार
दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  February 08, 2017

वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में रक्षा आवंटन को देखकर रक्षा योजना में पहले से मौजूद खामियां फिर से परिलक्षित होती हैं। इस आवंटन को देखने पर भारतीय सेना बीसवीं सदी के शुरुआती दौर वाला एक ऐसा सैन्य समूह नजर आती है जिसमें कार्यबल की तो बहुतायत है लेकिन उसके साजो-सामान की हालत खराब है। अधिकारियों और जवानों के वेतन पर किए जाने वाले भारी-भरकम खर्च के बाद सैन्य उपकरणों की खरीद कर उसे आधुनिक रूप दे पाने की गुंजाइश काफी कम नजर आती है। पिछले बजट में रक्षा के लिए आवंटित 7,000 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो पाने से उसे सरकार को वापस करने की नौबत आ गई जो सैन्य ढांचे की अक्षमता को उजागर करता है। बजट पर हुई चर्चाओं को देखने से लगता है कि आम लोगों के अलावा राजनीति और सामरिक विशेषज्ञ भी देश की इस अंतिम शरणस्थली में भी बन रहे गड्ढïे के खतरनाक रूप से बड़े होते जाने को लेकर किस कदर बेपरवाह हैं।

 
वैसे पिछले वर्षों के रक्षा बजट की तुलना और विश्लेषण काफी मुश्किल काम है। हालांकि मौजूदा सरकार ने लेखांकन को सरल बनाने वाले कदम उठाने के साथ ही पूर्व सैनिकों को दी जाने वाली पेंशन को भी रक्षा बजट के दायरे में लाकर काम थोड़ा आसान कर दिया है। ऐसे में पिछले तीन वर्षों के रक्षा बजट की तुलना के लिए विभिन्न मदों में किए गए आवंटनों का सहारा लिया जा सकता है। 
 
इस पद्धति का सहारा लेने पर बजट में थलसेना, नौसेना और वायुसेना के लिए किए गए आवंटन मेल नहीं खाते दिखते हैं। आगामी वित्त वर्ष के लिए कुल 359,854 करोड़ रुपये का रक्षा आवंटन किया गया है और इसका 91 फीसदी हिस्सा यानी 328,000 करोड़ रुपये तीनों सशस्त्र सेनाओं को दिया गया है। बाकी बचे नौ फीसदी हिस्से में रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग, आयुध कारखाना बोर्ड, सीमा सड़क संगठन, तटरक्षक बल और जम्मू कश्मीर लाइट इन्फैंट्री जैसे अन्य रक्षा संगठन शामिल हैं। माना जा रहा है कि रक्षा बजट को पारदर्शी बनाने की कवायद जारी रखते हुए सरकार अगले साल तटरक्षक बल को नौसेना के संवर्ग में और लाइट इन्फैंट्री को सेना के संवर्ग में समाहित कर देगी। 
 
बहरहाल रक्षा क्षेत्र के मद में आवंटित राशि में गिरावट देखी गई है। वर्ष 2013-14 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की 2.29 फीसदी राशि रक्षा मद में दी गई जबकि 2014-15 में यह हिस्सा घटकर 2.28 फीसदी हो गया। वर्ष 2015-16 में जीडीपी का केवल 2.15 फीसदी हिस्सा ही रक्षा मद में खर्च किया गया जबकि 2016-17 में जीडीपी का 2.29 फीसदी हिस्सा रक्षा पर खर्च होने का संशोधित अनुमान लगाया गया है। लेकिन अगले वित्त वर्ष के लिए इसे घटाकर 2.14 फीसदी कर दिया गया है। वहीं सरकार की तरफ से किए जाने वाले व्यय के अनुपात के तौर पर देखें तो 2013-14 में 16.4 फीसदी, 2014-15 में 17.1 फीसदी, 2015-16 में 16.4 फीसदी, 2016-17 में 17.1 फीसदी और 2017-18 में 16.8 फीसदी हिस्सा रहने का अनुमान है। 
 
रक्षा व्यय की सबसे बड़ी समस्या यह है कि सैन्य कर्मचारियों की बढ़ती संख्या पर तो खर्च बढ़ रहा है लेकिन सैन्य साजो-सामान की खरीद को नजरअंदाज किया जा रहा है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से वेतन पर खर्च बढ़ा है और वन रैंक वन पेंशन लागू होने से पूर्व सैनिकों के पेंशन मद पर भी खर्च काफी बढ़ गया है। इन खर्चों की वजह से बुलेटप्रूफ जैकेट, राइफल, गोला-बारूद, पनडुब्बी, युद्धपोत और लड़ाकू विमानों की खरीद जैसे बेहद अहम काम अटक गए हैं। वर्ष 2015-16 में सेना अपने लिए आवंटित राशि का केवल आठ फीसदी हिस्सा नए साजो-सामान पर खर्च कर रही थी। हालांकि उसके बाद सरकार ने कुछ राशि बढ़ाई है लेकिन वेतन और पेंशन पर कुल व्यय का 72 फीसदी हिस्सा खर्च होने के बाद सेना के पास नए उपकरणों के लिए केवल 11 फीसदी राशि ही बचेगी। 
 
आम तौर पर अपने बजट का आधा हिस्सा नए उपकरणों पर खर्च करने वाली नौसेना और वायुसेना पर भी बढ़े हुए वेतन और पेंशन मद की मार देखी जा रही है। नौसेना के पास जंगी जहाजों की किल्लत होने के बावजूद वह अगले वित्त वर्ष में केवल 47 फीसदी राशि ही नए सामान खरीदने पर खर्च कर पाएगी। केवल वायुसेना ही अपने हिस्से का आधा बजट आधुनिकीकरण पर खर्च करेगी और उसकी वजह भी यह है कि पिछले साल खरीदे गए 36 राफेल विमानों के भुगतान के लिए 5,000 करोड़ रुपये इस बजट में आवंटित किए गए हैं।  
इन वर्गीकरणों पर गौर करने से यह चिंताजनक पहलू सामने आता है कि पूरे साल नियंत्रण रेखा पर विपरीत माहौल में काम करने वाली और आतंकवाद रोधी अभियानों में लगी सेना के पास जरूरी साजोसामान खरीदने के लिए पर्याप्त कोष ही नहीं हैं।
 
इसके पीछे वित्त मंत्रालय के अधिकारी यह तर्क देते हैं कि सेना तो अपने लिए आवंटित रकम भी छीक से नहीं खर्च कर पाती है। तकनीकी तौर पर यह तर्क सही हो सकता है लेकिन इसकी एक वजह यह भी है कि सेना की तरफ से वित्त मंत्रालय भेजे गए प्रस्तावों को स्वीकृति देने में कई बार लेटलतीफी बरती जाती है। सेना नौकरशाही के इस खेल को लाचार होकर देखने के लिए मजबूर हो जाती है और उसके हिस्से का पैसा वापस लौट जाता है। असल में 500 करोड़ रुपये से अधिक रकम वाले किसी भी प्रस्ताव को वित्त मंत्रालय से मंजूरी लेनी होती है। इसे रोकने के लिए जरूरी है कि वित्त मंत्रालय के भीतर सैन्य प्रस्तावों को मंजूरी देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। 
 
सैन्यबलों खासकर सेना को ऐसे रास्ते तलाशने होंगे कि धीरे-धीरे कर्मचारियों की संख्या में कमी लाई जाए और साजो-सामान पर खर्च बढ़ाया जाए। सैन्य जनरलों को यह भरोसा दिलाना होगा कि सैन्यकर्मियों पर की गई बचत का इस्तेमाल उनके आधुनिकीकरण में किया जाएगा। सैन्यबलों को भरोसे में लेकर लंबी अवधि के दृष्टिकोण पत्र की दिशा में भी सरकार को पहल करनी चाहिए।  
 
(लेख में दिए गए आंकड़े बजट दस्तावेज पर आधारित हैं)
Keyword: बजट, रक्षा आवंटन, भारतीय सेना, सैन्य उपकरण, खरीद,
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