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गहन सुधार दिलाएंगे निवेश को रफ्तार
अजय शाह /  February 08, 2017

अगर निवेश को गति प्रदान करनी है तो गहन ढांचागत सुधारों के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह 

 
अब नोटबंदी और बजट की चर्चा पर धीरे-धीरे विराम लग रहा है। अब वक्त आ गया है कि अर्थव्यवस्था के कष्ट की वजहों पर नई दृष्टि डाली जाए। इनमें एक अहम मुद्दा है निवेश में आया ठहराव। सरकार के ठीक ढंग से काम न करने, बैलेंस शीट की दिक्कतों तथा मुनाफे से जुड़ी समस्याओं ने कंपनियों को नया निवेश करने से रोक रखा है। बैंकों की बैलेंसशीट खासे दबाव में है। प्रवर्तन एजेंसियों का व्यवहार निजी क्षेत्र को परेशानी में डाले है और तात्कालिक उपाय विफल हो रहे हैं। इन तमाम बातों के बीच गहन ढांचागत सुधारों के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रह गया है। नवंबर की शुरुआत से ही हमारे दिलोदिमाग पर नोटबंदी छाई रही। उसके बाद बजट आ गया। अब हम पूरे परिदृश्य पर नजर डालने के लिए दो काम कर सकते हैं। 
 
अर्थव्यवस्था के समक्ष निवेश की कमी एक बड़ी समस्या है। सीएमआईई कैपेक्स डाटाबेस के मुताबिक इसे आंकने का सबसे बेहतर तरीका है क्रियान्वयाधीन परियोजनाओं में निवेश गतिविधि का आकलन करना। वर्ष 2012 से 2017 तक यह आंकड़ा 100 लाख करोड़ रुपये पर अटका रहा। अगर हमने मुद्रास्फीति के हिसाब से समायोजन किया होता या हम इसे जीडीपी के अनुपात के रूप में देखें तो इस अवधि में निवेश में कमी आई। कुछ लोगों को लगता है कि सरकारी निवेश से इस समस्या का अंत किया जा सकता है लेकिन दिक्कत यह है कि केंद्र सरकार इस लिहाज से बहुत अधिक धनराशि नहीं दे सकती। वर्ष 2016-17 के दौरान गैर ब्याज वाला सरकारी व्यय 15.3 लाख करोड़ रुपये था। जाहिर है सरकारी निवेश में बहुत बड़ा इजाफा करना संभव नहीं है। उस दृष्टिï से कहें तो वृहद आर्थिक नीति के किताबी सिद्घांत हमारे देश में लागू नहीं होते। 
 
कुछ लोगों को लगता है कि समस्या संप्रग सरकार की नीतिगत पंगुता में है। सोचा गया कि अगर इस समस्या का हल हो जाता है तो निवेश के क्षेत्र में 2002-2008 के पुराने दिनों की वापसी हो सकती है। इस दिशा में कोशिश की गई लेकिन सफलता नहीं मिल सकी। हमें इस बात का गहन अध्ययन करना होगा कि निवेश में तेजी आखिर समस्याग्रस्त कैसे हुई, तभी हल निकाला जा सकता है। इसके चार तत्त्व हैं। 
 
पहली समस्या बुनियादी क्षेत्र की परियोजनाओं से जुड़ी है जहां कुल निवेश का तकरीबन आधा जाता है। सरकार और निजी क्षेत्र के बीच के संबंधों के निर्धारक तत्त्वों में गड़बड़ी है। सारे देश में निवेश (सीएमआईई कैपेक्स के आंकड़ों के मुताबिक करीब 50 लाख करोड़ रुपये मूल्य की परियोजनाएं क्रियान्वयनाधीन हैं) का अध्ययन करना बहुत मुश्किल काम है। निजी-सार्वजनिक भागीदारी में सरकार को प्रबंधन के क्षेत्र में काफी मेहनत करनी होती है। 
 
दूसरा मुद्दा गैर वित्तीय कंपनियों पर पडऩे वाले वित्तीय दबाव का है। खासतौर पर बुनियादी क्षेत्र में। मुनाफा और ऋण की बात करें तो देश के आधे से अधिक कॉर्पोरेट जगत की बैलेंस शीट में इनकी स्थिति बहुत जोखिम भरी हो चुकी है। जब मौजूदा कारोबारी चक्र इक्विटी पर खराब रिटर्न देता है तो कंपनियां नई पूंजी डालने में हिचकिचाने लगती हैं। जो कंपनियां संघर्षरत हैं वे नकदी कम करना चाहती हैं बजाय कि नया निवेश करने के। तीसरा मुद्दा है बैंकिंग व्यवस्था। देश की बैंकिंग व्यवस्था का 80 फीसदी हिस्सा दबाव में है। बैंकों का ध्यान अब एनपीए यानी फंसे कर्ज की वसूली पर है। इसके अलावा वे नकदी कम करना चाहते हैं, बजाय कि नई परियोजनाओं में निवेश करने के। 
 
चौथा मुद्दा है जांच एजेसियों की चिंताओं का। हाल के दिनों में किंगफिशर के बैंक ऋण के बारे में उजागर बातों ने बैंकों और कर्ज लेने वालों में भय का माहौल पैदा किया। कानूनों में  बदलाव करने और अन्य कदमों के चलते कर अधिकारियों के व्यवहार को लेकर एक किस्म का डर पैदा हो गया है। यह भी संभव है कि इससे इंसपेक्टर राज की वापसी हो जाए। इससे निजी कंपनियों का निवेश और बैंकों की ऋण देने की क्षमता प्रभावित होगी।
 
बाजार अर्थव्यवस्था में कारोबारों का विफल होना आम है। जब सीमित दायित्व वाली कंपनी विफल होती है और अपना कर्ज चुकाने में नाकाम रहती है तो दिवालिया प्रक्रिया शुरू होती है। तब कर्ज देने वाले कंपनी पर काबिज हो जाते हैं। हकीकत में जब एक प्रवर्तक कंपनी से चोरी करता है तो वह अल्पांश हिस्सेदारों और कर्ज देने वालों से भी चोरी करता है। इस चोरी के खिलाफ प्रवर्तनकारी कदम उठाए जाने चाहिए। भले ही देनदारी में चूक हो या नहीं। तथ्य यह है कि देनदारी की चूक स्थापित करना आवश्यक नहीं। वह अपराध साबित करने के लिए उचित परिस्थिति भी तैयार नहीं करता। यह जोखिम भी रहता है कि हम उद्यमिता और जोखिम लेने की दृष्टिï से खराब माहौल तैयार करें। 
 
इस दृष्टिï से देखें तो निवेश इसलिए ठहर गया क्योंकि बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप हुआ, बैंकों और निगमों में वित्तीय दबाव की स्थिति बनी रही और इंसपेक्टर राज का आगाज होता दिखा। ऐसे में क्या किया जाए? उपरोक्त क्षेत्रों में जटिल नीतिगत काम करना आवश्यक है ताकि राज्य की क्षमता विकसित की जा सके। दिवालिया कानून की शुरुआत अच्छी है। लेकिन उसका मौजूदा स्वरूप और उसे लागू कराने वाली मशीनरी परिणाम नहीं दे सकेगी। खासतौर पर एनसीएलटी और डीआरटी के काम में बड़ी विफलताएं देखने को मिली हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए एक मजबूत टीम स्थापित करने की आवश्यकता है। बुनियादी क्षमता के क्षेत्र में सरकारी क्षमता विकसित करना आवश्यक है। ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र में तीन तरह की समस्या हैं: योजना, अनुबंध और नियमन। इस क्षेत्र में फिलहाल कई दिक्कतें हैं। यह क्षेत्र नीतिगत विचार के स्तर पर प्राथमिक चरणों में है। यह काफी हद तक एफएसएलआरसी के पहले वित्तीय क्षेत्र की तरह है।
 
बैंकिंग नियमन काफी हद तक विफल रहे और आरबीआई को इनके सुधार पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए भारतीय वित्त संहिता के मसौदे का प्रवर्तन करना होगा। उसके बाद आरबीआई में क्षमता विकसित करने के लिए कार्यबल बनाना होगा। नए रिजॉल्युशन कॉर्पोरेशन के लिए एक नया कानून बनाना होगा। उसके बाद ही यह उम्मीद की जा सकती है कि वह आने वाले वर्षों में बैंकों की छोटी-मोटी विफलता से निपट सकेगा। आखिर में हमें कर प्रशासन समेत उपरोक्त तमाम क्षेत्रों में कानून और राज्य क्षमता की आवश्यकता होगी ताकि कानून के शासन के साथ बेहतर प्रवर्तन का माहौल तैयार किया जा सके। ऐसा किए बिना हम भय और भ्रष्टïाचार के शिकार हो जाएंगे। 
 
(लेखक नई दिल्ली स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं।)
Keyword: नोटबंदी, बजट, बैंक, बैलेंसशीट, अर्थव्यवस्था,,
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