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न्यूनतम शासन के लिए जरूरी है केंद्रीय कर्मियों की तादाद में कमी
दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  February 07, 2017

 

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की संख्या बढ़ी है या घटी है? मोदी ने अधिकतम प्रशासन न्यूनतम शासन का वादा किया था, ऐसे में उम्मीद तो यही थी कि कर्मचारियों की तादाद कम होगी। मोदी सरकार के कार्यकाल के पहले साल में इन कर्मचारियों की कुल तादाद में आधा फीसदी की मामूली ही सही लेकिन कमी तो आई। दूसरे वर्ष के आखिर में भी यह रुझान बरकरार रहा। इस वर्ष सरकारी कर्मचारियों की संख्या 0.63 फीसदी घटकर 32.8 लाख रह गई। अचरज की बात यह है कि मोदी सरकार के कार्यकाल के तीसरे वर्ष इन कर्मचारियों की संख्या में इजाफा नजर आया। मार्च 2017 के आखिर तक केंद्र सरकार के कुल कर्मचारियों की संख्या करीब 8 फीसदी बढ़कर 35.4 लाख होगी। इससे भी बुरी बात यह कि अगले वर्ष भी इसमें 0.83 फीसदी का इजाफा होने और इसके 35.7 लाख पहुंचने का अनुमान है। मोदी सरकार के नौकरशाही का आकार कम करने के वादे का क्या हुआ? उनका वादा था कि सरकार न्यूनतम हस्तक्षेप करेगी और अधिकतम शासन सुनिश्चित किया जाएगा। यह सच है कि अधिकतम प्रशासन और न्यूनतम सरकार के मामले में प्रधानमंत्री की समझ थोड़ी अलग है। उनका कहना है कि इसका आकलन सरकारी मंजूरियों की संख्या में कमी से किया जाना चाहिए। यानी भिन्न-भिन्न विभागों के बीच सरकारी फाइलों का तेज निपटारा ताकि जल्दी निर्णय लिया जा सके। लेकिन नौकरशाही का आकार भी सरकार के कामकाज और उसके वादों को पूरा करने या न करने का एक मानक होना चाहिए। 
 
अगर कर्मचारियों की तादाद पर करीबी नजर डाली जाए तो और दिलचस्प आंकड़े सामने आते हैं। भारतीय रेल जिसका सालाना बजट अब आम बजट में मिला दिया गया है, उसके कर्मचारियों की हिस्सेदारी कुल संख्या में करीब 37 फीसदी है। भारतीय रेल का निजीकरण होने पर कुल कर्मचारियों की तादाद घटकर 22.4 लाख रह जाएगी जिनका प्रबंधन अपेक्षाकृत आसान है। अकेले इस वजह से भी मोदी सरकार को देश की सबसे बड़ी माल एवं यात्री वाहक भारतीय रेल को पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी में बदलना चाहिए और फिर धीरे-धीरे उसमें अपनी हिस्सेदारी कम करनी चाहिए। ऐसा करने एक तीर से कई निशाने साधे जा सकेंगे। यानी सरकार के कर्मचारियों की संख्या भी कम होगी और भारतीय रेल की किफायत बढ़ेगी। इसके साथ ही केंद्र सरकार के लिए राजस्व के नए रास्ते खुलेंगे। 
 
केंद्र सरकार के कर्मचारियों में अगली सबसे बड़ी तादाद है पुलिसकर्मियों की। करीब 11 लाख की तादाद के साथ ये केंद्र के कर्मचारियों में दूसरे स्थान पर हैं और उनकी हिस्सेदारी कुल केंद्रीय कर्मियों में 31 फीसदी है। इस बारे में कुछ खास नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा डाक, राजस्व, अंकेक्षण आदि विभागों में कर्मचारियों की संख्या पर भी दृष्टिï रखी जानी चाहिए। डाक विभाग जो इन दिनों भुगतान बैंक की शुरुआत में व्यस्त है, उसे इस बात पर विचार करना चाहिए कि उसके 47,000 मौजूदा कर्मचारियों (सालाना 5 फीसदी वृद्घि दर) को पुनर्गठन के जरिये बैंक में नई भूमिका सौंपी जाए। 
 
ऐसे समय में जबकि तकनीक की मदद से कम से कम लोगों की मदद से अधिकाधिक लाभ हासिल किए जा रहे हैं और लागत कम की जा रही है, वैसे में डाक विभाग को भी अपने कर्मचारियों की संख्या कम करने पर विचार करना चाहिए। ऐसा करके ही वह निजी क्षेत्र की कुरियर कंपनियों का मुकाबला कर पाएगा। दूसरी पहेली है राजस्व विभाग और अंकेक्षण एवं लेखा विभाग में कर्मचारियों की बढ़ती संख्या। दोनों वित्त मंत्रालय के अधीन आते हैं। वर्ष 2015 में दोनों कर विभागों में कर्मचारियों की तादाद 123 फीसदी बढ़ी। इसमें लगातार इजाफा जारी है। गत वर्ष और इस वर्ष भी इनमें बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस दर से देखा जाए तो राजस्व विभाग के कर्मचारियों की संख्या अगले साल बढ़कर 1.8 लाख से अधिक हो जाएगी। ऐसे में इस प्रश्न का जवाब दिया जाना चाहिए कि आखिरकार प्रशासन द्वारा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ाने और उसे सुरक्षित बनाने की प्रक्रिया में अधिक लोगों की आवश्यकता होगी या कम? असहज करने वाला तथ्य यह है कि केंद्र सरकार के 88 फीसदी असैनिक कर्मचारी तो उसके पांच विभागों-रेलवे, पुलिस, अंकेक्षण एवं लेखा, राजस्व तथा डाक में ही हैं।
 
अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न्यूनतम शासन के साथ अधिकतम प्रशासन के अपने वादे को थोड़ा और अधिक गंभीरता से तथा समग्रता से लें तो उनकी सरकार का न केवल खर्च कम होगा बल्कि उसकी प्रशासनिक क्षमता में भी बेहतरी आएगी। सरकारी कर्मचारियों के पास भी शिकायत करने के लिए कोई खास वजह नहीं रहेगी। केंद्र सरकार के कर्मचारियों का औसत वेतन वर्ष 2013-14 की तुलना में 2016-17 में 47 फीसदी बढ़ चुका है। 
Keyword: नरेंद्र मोदी, केंद्र सरकार, भारतीय रेल, आम बजट,
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