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ऑप्टिकल फाइबर से बेहतर है वायरलेस से संपर्क
श्याम पोनप्पा /  February 07, 2017

 

ग्रामीण इलाकों में जहां ब्रॉडबैंड पहुंचाने के लिए फाइबर केबल व्यवहार्य नहीं है, वहां इसके लिए अन्य विकल्प आजमाये जा सकते हैं। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा 
 
अधिकांश लोग मानते हैं कि ब्रॉडबैंड के लिए ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी) आवश्यक है। यह बात मोटे तौर पर सही है परंतु यह तरीका अक्सर केवल शहरी इलाकों में ही कारगर साबित होता है। एक बात जो लोग नहीं जानते हैं वह यह है कि ट्रेडिंग कंपनियां न्यूयॉर्क और शिकागो के बीच उच्च गति वाले इलेक्ट्रॉनिक कारोबार के लिए वायरलेस लिंक का प्रयोग करती हैं। शहरी बसावट से बाहर के लोगों के लिए वायरलेस फाइबर का एक कम महंगा विकल्प है। उनको प्रति सेकंड कुछ मेगाबिट की स्पीड मिलती है लेकिन देखा जाए तो 2 एमबीपीएस की गति वाला ब्रॉडबैंड खासा बेहतर है। 
 
देश में इंटरनेट की पहुंच और उसके उपयोग से जुड़े तीन कारक हैं। एक बात यह भी है कि दुनिया भर में वायरलेस उपकरणों का इस्तेमाल और उनकी पहुंच बढ़ी है। सिस्को के जून 2016 के अनुमान के मुताबिक 2015 में कुल आईपी ट्रैफिक में 52 फीसदी हिस्सेदारी तार वाले इंटरनेट की थी। परंतु 2020 तक यह घटकर एक तिहाई रह जाएगी। जबकि वायरलेस पहुंच बढ़कर दोतिहाई हो जाएगी। लागत कम करने और प्रदर्शन में सुधार करने वाले कारकों ने इस पर और बल दिया है। 
 
शहरी इलाकों में कुछ अन्य कारक भी हैं। मिसाल के तौर पर उच्च वाणिज्यिक संभावना वाले क्षेत्रों में ओएफसी के लिए जबरदस्त प्रतिस्पर्धा। इन इलाकों में फाइबर को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि उसकी लागत व्यवहार्य होती है और वह वाणिज्यिक दृष्टिï से भी स्थायित्व भरा होता है। हालांकि इसके अपवाद हैं। मिसाल के तौर पर उच्च गति वाले ट्रेडिंग लिंक जिनका जिक्र हमने ऊपर किया। या फिर ऐसे स्थान जहां उपयोगकर्ता भौगोलिक रूप से बंटे हुए होते हैं। यहां तक कि घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में भी कई बार ओएफसी की स्थापना करना कष्टïसाध्य होता है क्योंकि वहां घनी बसावट होती है। तीसरी दिक्कत है जनसंख्या का भौगोलिक विस्तार, ब्रॉडबैंड का विस्तार और ओएफसी नेटवर्क की सीमित पहुंच। बड़े शहर और उनके संपर्क जहां ओएफसी से जुड़े रहते हैं, वहीं कम आबादी वाले और बीच के वाणिज्यिक रूप से कम व्यवहार्य इलाके बचे रह जाते हैं। पहाड़ी इलाकों में ओएफसी बिछाने में खासी दिक्कत होती है। इसका असर लागत पर भी पड़ता है। तमाम प्रक्रियागत और व्यावहारिक दिक्कतों की वजह से समस्या आती है लेकिन एक मजबूत और व्यवहार्य ओएफसी नेटवर्क की स्थापना के लिए इनका होना अत्यंत आवश्यक है। 
 
बात केवल ओएफसी की स्थापना की नहीं है बल्कि गुणवत्ता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। हमारे देश में ओएफसी नेटवर्क औसतन प्रति माह 12 से 14 कट प्रति किमी प्रति माह से प्रभावित होते हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय मानक 0.7 किमी प्रति माह का है। वहीं नियमित मरम्मत और रखरखाव के कारण पूंजीगत व्यय बढ़कर करीब अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया की तुलना में तीन गुना तक हो जाता है। 
 
मानक प्रक्रिया अपनाते हुए ओएफसी स्थापित करने की लागत के अनुमान एक लाख रुपये से चार लाख रुपये प्रति किमी तक हो सकती है। बहरहाल इसमें कमी लाने के प्रयास भी किए गए। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश ने 4,700 करोड़ रुपये में 22,500 किमी लंबे ओएफसी की स्थापना पर विचार किया। इसके लिए फाइबर को बिजली की केबल के साथ बिछाने पर विचार किया गया। बाद में अनुमानित राशि घटाकर 333 करोड़ रुपये कर दी गई। इसके साथ ही प्रति किमी लागत भी 21 लाख रुपये से घटकर 1.5 लाख रुपये प्रति किमी हो गई। अब देखना है कि गुणवत्ता और विश्वसनीयता के मानक पर यह नेटवर्क कितना खरा उतरता है। संचार बढ़ाने के लिए वायरलेस तकनीक की मदद ली जा सकती है। इससे गांवों और दूरदराज इलाकों को जोडऩा आसान होगा।
 
इन तमाम वजहों से भी यह आवश्यक है कि ब्रॉडबैंड को लेकर हम अपना रुख नए ढंग से तैयार करें। इस दौरान बुनियादी ढांचे से जुड़ी मूलभूत बातों का पूरा ख्याल रखना होगा और साथ ही स्पेक्ट्रम और डिजाइन का भी। मोबाइल सेवा में जबरदस्त उछाल आई लेकिन 2जी घोटाले के बाद उसकी छवि पर बुरा असर पड़ा। यही वजह है कि प्रेस में घोटाले के शिकार तलाशने की कोशिश ने जोर पकड़ी। आम जन, विभिन्न सरकारी विभागों और न्यायपालिका में भी चर्चाओं का दौर छिड़ा। कई प्रमाणित वायरलेस तकनीक ऐसी हैं जिनकी देश में इस्तेमाल की इजाजत ही नहीं है। यद्यपि ट्राई ने इनके इस्तेमाल की अनुशंसा की है। नीचे वे तरीके दिए गए हैं जिनकी मदद से संचार बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा जैसे उपयोगी पर्यावरण सुरक्षा मानकों का भी प्रयोग किया जाना चाहिए। 
 
60 गीगाहट्र्ज (वी बैंड) वायरलेस गीगाबिट छोटी दूरी के लिए
 
70 और 80 गीगाहट्र्ज (ई बैंड) बहु गीगाबिट पांच किमी तक
 
फाइबर केबल से 8-10 किमी दूर बसे गांवों तक संचार के लिए टीवी व्हाइट स्पेस का इस्तेमाल।
 
इसके अलावा कुछ अन्य उपाय भी अपनाए जा सकते हैं: 
 
5.8 गीगाहट्र्ज बैंड में बिना लाइसेंस स्पेक्ट्रम को बढ़ाना ताकि 866 एमबीपीएस प्रति चैनल अथवा अधिक क्षमता हासिल की जा सके। 
 
द्वितीयक साझेदारी बैंड मसलन टीवी व्हाइट स्पेस का प्रयोग करना। ऐसा करने से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
 
यह बात स्पष्टï है कि तमाम प्रयासों के बावजूद हमारा मौजूदा रुख हमें वहां नहीं पहुंचा पा रहा है जहां हमें होना चाहिए। सरकार और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि इस दिशा में तमाम प्रयास कर चुके हैं। लेकिन एक ठोस तरीका विकसित करने का कोई विकल्प नहीं है। यह तरीका समग्र सहभागिता वाला और पेशेवर सुविधायुक्त होना चाहिए जिसमें सरकार और उद्योग जगत, सेवा प्रदाता और उपकरण निर्माता, उपयोगकर्ता और न्यायपालिका आदि सभी शामिल हों। ऐसे में बेहतर परिणाम वाला तरीका खोजा जा सकता है। 
 
ऐसे में बेहतर होगा कि सच को स्वीकार करते हुए किसी दृष्टिïकोण को खारिज करने के पहले प्रमाणों पर विचार किया जाए। लाइसेंसिंग के लिए हमें पता है सरकार राजस्व साझेदारी से जो पाती है वह नीलामी शुल्क की तुलना में कहीं अधिक होता है। हमें यह भी अनुभव है कि सड़क, विमानतल आदि जैसे अन्य बुनियादी ढांचों को राजस्व साझेदारी के तहत कैसे बनाया जाता है। हमें ब्रॉडबैंड के विकास के दौरान भी इसी तरीके से चरणबद्घ निर्माण करना होगा। बुनियादी संसाधन संबंधी नीतियों में स्पेक्ट्रम की जरूरत को तार्किक बनाना होगा और इस क्षेत्र को थोड़ा संगठित करना होगा। हमें विनिर्माण के क्षेत्र में अग्रणी कंपनियां तैयार करनी होंगी ताकि लागत को कम रखा जा सके। उदाहरण के लिए टीवी व्हाइट स्पेस का प्रयोग करने के मामले में। ऐसे में जहां ग्रामीण और अन्य इलाकों में ओएफसी अव्यावहारिक है वहां हम आईपीआर और अन्य उत्पादों की मदद ले सकते हैं। इसके लिए प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व का सहयोग आवश्यक है। 
Keyword: ऑप्टिकल फाइबर, वायरलेस, ग्रामीण, ब्रॉडबैंड,
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