बिजनेस स्टैंडर्ड - गलत परंपरा
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गलत परंपरा
संपादकीय /  February 07, 2017

वर्ष 2017-18 के आम बजट को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आने वाले वित्त वर्ष में सरकार को अनूठी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा लगभग हर बजट में नए उपकरों और अधिभारों का अधिरोपण भी एक वजह है। आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार के राजस्व का लगभग चौथाई हिस्सा अब इसी श्रेणी से प्राप्त होता है। यह सही परंपरा नहीं है और बीते कुछ वर्षों से यह लगातार मजबूत होती जा रही है। खासतौर पर पिछले दो सालों के दौरान केंद्र सरकार के कुल राजस्व में उपकरों और अधिभार की हिस्सेदारी बहुत अधिक बढ़ गई है। बहरहाल यह बढ़ती निर्भरता आगे चलकर एक समस्या की वजह बन सकती है क्योंकि यह ऐसे समय पर हो रहा है जब देश वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यह व्यवस्था आगामी वित्त वर्ष से लागू हो सकती है। इनमें से कई उपकर और अधिभार जीएसटी में समाहित हो जाएंगे। ऐसे में यह एकदम स्पष्टï नहीं है कि उन योजनाओं और कार्यक्रमों की फंडिंग का क्या होगा जो इससे जुड़ी हुई हैं। 

 
उदाहरण के लिए सरकार ने स्वच्छ भारत उपकर से 13,300 करोड़ रुपये के संग्रह की बात कही है जबकि इसके पहले साल यानी वर्ष 2015-16 में इससे 3,926 करोड़ रुपये की राशि आई थी। इसी प्रकार कृषि कल्याण उपकर से हासिल होने वाले राजस्व की राशि भी वर्ष 2016-17 के 5,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 8,800 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। इसमें से पूर्ववर्ती उपकर का इस्तेमाल स्वच्छ भारत योजना में किया जाएगा जिसके लिए सरकार ने 16,248 करोड़ रुपये के व्यय का बजट निर्धारित किया है जबकि बाद वाले उपकर की मदद से ग्रामीण विकास योजनाएं चलाने की बात कही गई है। प्रश्न यह है कि जीएसटी के लागू होने के बाद इन योजनाओं  की फंडिंग का क्या होगा? निश्चित तौर पर ऐसा भी नहीं है कि हर उपकर इससे प्रभावित ही होगा। कुछ उपकर मसलन तेल एवं तेल उत्पादों पर लगने वाले उपकर तथा स्वच्छ पर्यावरण वाले उपकर जीएसटी में शामिल नहीं किए जाएंगे क्योंकि ये दायरे से बाहर हैं। परंतु बाकी के अधिकांश प्रभावित होंगे। लब्बोलुआब यह है कि केंद्र सरकार को जीएसटी के प्रवर्तन के बाद अतिरिक्त राजकोषीय बोझ का सामना करना पड़ सकता है। पीछे पलट कर देखने पर अहसास होगा कि यह समस्या पूरी तरह खुद खड़ी की गई है। 
 
कुछ हद तक देखा जाए तो इस बात को समझा जा सकता है कि आखिर क्यों केंद्र सरकार ने अधिकाधिक उपकर और अधिभार लगाने की राह पकड़ी। सबसे अहम बात यह है कि इसमें राज्य सरकारों के साथ कोई हिस्सेदारी नहीं करनी पड़ती और जो भी प्राप्तियां होती हैं वे पूरी तरह केंद्र सरकार के पास ही रहती हैं। इन दिनों केंद्र सरकार द्वारा समर्थित योजनाओं में लगातार कटौती की जा रही है (वे योजनाएं जिनके लिए केंद्र सरकार राज्यों को धन देती है)। ऐसा खासतौर पर 14वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं के बाद हो रहा है जिसने केंद्र के कर राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी में इजाफा कर दिया है। इन हालात के मद्देनजर उपकरों पर बढ़ती निर्भरता स्वाभाविक होती गई। लेकिन यह तय है कि यह कोई वांछित विकल्प नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि डिजाइन के मुताबिक यह राज्य सरकारों को कर राजस्व से वंचित करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई अवसरों पर सहकारी संघवाद के लाभों की प्रशंसा की है। ऐसे में उपकरों का बढ़ता इस्तेमाल केंद्र-राज्य संबंधों पर बुरा असर डालता है। तमाम ऐसी वजह हैं जिनके चलते सरकार को इस रुझान में तब्दीली लानी ही चाहिए। राजकोषीय समझदारी भी यही कहती है।
Keyword: आम बजट, केंद्र सरकार, राजस्व,
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