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'बढ़त के लिहाज से अनुकूल हैं नरेंद्र मोदी की नीतियां'
पुनीत वाधवा /  February 07, 2017

मशहूर वैश्विक निवेशक और 'ग्लूम, बूम और डूम' के लेखक मार्क फेबर ने आम बजट के प्रस्तावों की सराहना की है। पुनीत वाधवा को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचे पर भारत का खर्च अपर्याप्त है। अगले 10 सालों में निवेशक अमेरिका के मुकाबले उभरते बाजारों में बेहतर स्थिति में होंगे। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश...

 
वैश्विक अवरोध और आम बजट के प्रस्तावों की पृष्ठभूमि में आपको भारतीय अर्थव्यवस्था किस तरह का आकार लेता नजर आ रहा है?
 
भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर है। भारत में इस पर हमेशा से ही बहस होती रही है कि अर्थव्यवस्था की बढ़त की रफ्तार कितनी है, 6 फीसदी या 7 फीसदी या 8 फीसदी है और इसमें कितनी बढ़त की क्षमता है। वास्तव में अगर भारत व चीन जैसे देश 4 फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ सकते हैं तो लंबी अवधि में सकल घरेलू उत्पादों में अच्छी खासी बढ़त देखने को मिलेगी, खास तौर से जापान, यूरोप और अमेरिका जैसे देशों के मुकाबले, जो लंबी अवधि में या तो बढ़त हासिल नहीं करेंगे या 2 फीसदी सालाना की बढ़त दर्ज करेंगे। मेरा मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था किसी तरह की समस्या का संकेत नहीं दे रहा है। बढ़त के लिहाज से बजट अनुकूल नजर आ रहा है। हालांकि चीन के मुकाबले भारत में बुनियादी ढांचे पर खर्च अभी भी अपर्याप्त है। पिछले साल चीन ने बुनियादी ढांचे पर करीब 1.4 खबर डॉलर खर्च किए। दूसरी ओर भारत में इस पर खर्च चीन के मुकाबले काफी कम है। मेरा मानना है कि इस पर भारत में खर्च बढऩा चाहिए।
 
नोटबंदी के बाद अर्थशास्त्रियों ने भारत की बढ़त की रफ्तार का अनुमान घटा दिया है। इस पर आपका क्या मानना है?
 
मुझे नहीं लगता कि नोटबंदी का असर लंबी अवधि तक रहेगा। अल्पावधि का असर हालांकि संभावित तौर पर नकारात्मक है। लंबी अवधि के लिहाज से यह संभवत: सकारात्मक होगा। पहला, नोटबंदी का असर बहुत महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि बैंक नोट का 86 फीसदी बदल चुका है और नए नोट आ चुके हैं। ऐसा नहीं है कि भारत कागजविहीन अर्थव्यवस्था बन गया है। व्यवस्था में अभी भी नकदी है, लेकिन पुराने नोट संग्रहीत किए जा चुके हैं। दूसरा, भारत को और बेहतर कर संग्रह व्यवस्था की दरकार है। मैं उच्च कर के पक्ष में कभी नहीं रहा।
 
सरकार की आर्थिक नीतियां जारी रहे, इस लिहाज से बाजार और विदेशी निवेशक आगामी विधानसभा चुनाव के नतीजों को कितनी तवज्ज्जो दे सकते हैं?
 
इसके नतीजे नरेंद्र मोदी की नीतियों के समर्थन या विरोध सामने रखेंगे। मेरा मानना है कि सामान्य तौर पर मोदी की नीतियां विकास और भारत के अनुकूल हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि चुनाव का शेयर बाजार पर लंबी अवधि में बड़ा असर दिखेगा। मुझे लगता है कि अन्य चीजें ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूं कि भारतीय मीडिया शेयर बाजार पर चुनाव के नतीजे के असर को इतनी तवज्जो क्यों देता है, जब देश की 95 फीसदी आबादी के पास कोई शेयर नहीं है। 95 फीसदी भारतीय के लिए शेयर बाजार पूरी तरह अप्रासंगिक है। शेयर में निवेश न करने वालों के लिए रुपये की कीमत, आर्थिक बढ़त और प्रति व्यक्ति जीडीपी ज्यादा प्रासंगिक है।
 
देसी व वैश्विक अवरोधों को देखते हुए अगली कुछ तिमाहियों में आरबीआई की तरफ से दरों में कटौती की कितनी गुंजाइश है?
 
मैं उम्मीद करता हूं कि ये नीचे नहीं आएंगे क्योंकि अगर इसमें गिरावट नहींं आती है तो अर्थव्यवस्था के लिए यह इस लिहाज से बेहतर होगा कि मुद्रा स्थिर रहेगी। अगर आरबीआई दरों में आक्रामक तरीके से कटौती करता है तो मुद्रा एक बार फिर कमजोर होगी। आम भारतीय के लिए शेयर बाजार महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि मुद्रा की स्थिरता। अगर मुद्रा स्थिर है तो प्रति व्यक्ति जीडीपी में इजाफा होगा।
 
डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल के पहले कुछ हफ्तों को आप कैसे देखते हैं?
 
अभी तक वास्तव में कुछ खास नहीं हुआ है। हम नहीं जानते कि संरक्षणवाद की तरफ वास्तव में कितना आगे बढ़ेंगे। सामान्य तौर पर मेरा मानना है कि ट्रंप की अमेरिका की महान बनाने की कोशिश अमेरिका व इसकी अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक होगी।
 
उभरते बाजारों पर आपका क्या नजरिया है?
 
मैं एक साल से कहता रहा हूं कि हमें उभरते बाजारों में निवेश करना चाहिए, न कि अमेरिका में। अमेरिकी बाजार काफी महंगे हैं, अमेरिकी डॉलर का स्तर काफी ऊंचा है और आय व बिक्री की तुलना में बाजार के मूल्यांकन ज्यादा हैं। अगले 10 सालों में निवेशक अमेरिकी बाजार के मुकाबले उभरते बाजारों में बेहतर स्थिति में होंगे।
 
Keyword: ग्लूम, बूम और डूम, लेखक, मार्क फेबर, आम बजट,
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