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दखलंदाजी का एक नया खतरा उभर रहा है न्याय के क्षेत्र में
अदालती आईना
एम जे एंटनी /  02 06, 2017

न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में न्यायपालिका को कार्यपालिका की ओर से अवज्ञा जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। इस बीच संवैधानिक मोर्चे पर एक नया जोखिम उत्पन्न हो गया है। न्यायपालिका की सामाजिक न्याय की चाहत की मुठभेड़ तमिलनाडु के जल्लीकट्टïू जैसे मामले से हो गई है। इससे पहले केरल के लोगों ने बड़े पैमाने पर आवारा कुत्तों को मार डाला क्योंकि वे उनके लिए खतरा बन चुके थे। अगर राजनेताओं द्वारा प्रोत्साहित अवज्ञा आदेशों के क्रियान्वयन को थाम सकती है तो अदालतों का इकबाल कम होगा और इसके भयावह परिणाम हो सकते हैं। इसके बाद कावेरी जल बंटवारे और सतलज-यमुना नहर जैसे राजनीतिक रंग लिए आर्थिक मसले और महिलाओं के मंदिर में प्रवेश और समान नागरिक संहिता जैसे सामाजिक-धार्मिक प्रश्न सामने आएंगे। 

 
अब तक सरकार का प्रतिरोध बच निकलने का रहा है। उदाहरण के लिए केंद्र सरकार ने अधिकांश कल्याण योजनाओं के लिए आधार को आवश्यक बना दिया जबकि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश इसके विपरीत है। जरा इस पर नजर डालिए कि खाद्यान्न वितरण के विस्तृत आदेशों को किस तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, कैसे ध्वनि प्रदूषण को रोकने संबंधी नियम (लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को नियंत्रित करना) बेमानी हो चुके हैं और किस तरह स्कूल बसों में पीने के पानी, अग्निशमन, प्राथमिक चिकित्सा और हर सीट के नीचे बैग रखने की ट्रे लगाने जैसे कायदों का पालन नहीं किया जाता। 
 
सुधारों का प्रतिरोध अंतिम आदेश आने के पहले ही शुरू हो जाता है। कई ऐसी जनहित याचिकाएं हैं जो उन सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को उठाती हैं जिन पर राज्य सरकारों ने दशकों से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी होती। कई बार तो इनमें वकील तक पेश नहीं होते। गत सप्ताह ऐसी ही कुछ याचिकाएं एक के बाद एक सामने आईं जहां कई राज्यों ने वर्षों से अपने जवाब दाखिल नहीं किए थे। जाहिर सी बात है मुख्य न्यायाधीश सरकारों के इस रुख से खासे नाराज थे। उन्होंने नाराजगी में पूछा, 'क्या यह जोकरों की अदालत है? क्या यह पंचायत है?' जब ऐसी युक्तियां विफल हो जाती हैं और अदालती आदेशों का सड़क पर विरोध होने लगता है तो तत्कालीन सरकार अध्यादेश का रास्ता अपनाती हैं। विधायिका द्वारा यूं अदालतों को धता बताने का सिलसिला पुराना है। ऐसा ही एक अहम मामला, जहां अदालत ने इस व्यवहार को रोकने की कोशिश की थी, वह था सन 1978 का मदन मोहन पाठक बनाम भारत सरकार का मामला। सर्वोच्च न्यायालय में सात न्यायाधीशों के पीठ ने श्रम संबंधी एक मामले को खारिज करने के लिए बनाए गए कानून को निरस्त कर दिया। उन्होंने कहा कि उक्त विधान न्यायपालिका की भूमिका नहीं हड़प सकता। उसने यह भी कहा कि अप्रत्यक्ष रूप से नागरिक अधिकारों का हनन भी नहीं किया जा सकता। 
 
तब से अब तक कई ऐसे निर्णय हो चुके हैं लेकिन कुछ फैसले ऐसे भी हैं जिनमें इस प्रश्न को सीधे तौर पर हल नहीं किया गया। सरकारें दावा करती हैं कि उनके पास जनादेश है। यही वजह है कि कई बार उन्होंने अशांति फैलने या आर्थिक परिणाम झेलने की स्थिति में न होने पर अदालती आदेशों की अनदेखी की है। वोडाफोन कर मामला भी इसका एक उदाहरण है। 
कुछ वर्ष पहले पीयूसीएल बनाम भारत सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि एक मतदाता को यह अधिकार है कि वह प्रत्याशी के अतीत के बारे में जाने। राजनीतिक वर्ग इस निर्णय के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। इसके बाद आनन-फानन में एक अध्यादेश पारित किया गया और अभूतपूर्व एकता दिखाते हुए एक कानून बनाया गया। अदालत ने इस कानून को निरस्त कर दिया। सरकार को विनीत नारायण बनाम भारत सरकार के मामले में विवादास्पद एकल निर्देश के मामले में भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा था। उसके तहत शीर्ष नौकरशाहों के खिलाफ जांच की शुरुआत के लिए सरकार की पूर्व अनुमति की आवश्यकता थी। 
 
जब कर्नाटक सरकार ने कावेरी जल विवाद मामले में पंचाट के फैसले का असर खत्म करने की कोशिश की तो सर्वोच्च न्यायालय ने कानून को निरस्त करते हुए कहा, 'अधिनियम का लक्ष्य अदालती फैसले को शक्तिहीन करना है। ऐसे कानून के जरिये राज्य न्यायिक अधिकार आजमाने और अपीलीय अदालत या पंचाट की तरह व्यवहार करते हैं।' पी सांबमूर्ति बनाम आंध प्रदेश के मामले में अदालत ने कहा था कि अगर न्यायिक समीक्षा के अधिकार के समक्ष राज्य सरकार नए कानून लाकर उनका असर खत्म करेगी तो यह विधि के शासन के लिए मौत की घंटी के समान होगा। 
 
बैलों की लड़ाई का मामला पशु प्रेमियों के लिए भी कुछ सबक समेटे है। उनको न्यायपालिका को इस हद तक नहीं खींचना चाहिए जहां वह अभी है। किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि आखिर वे बैलों या कुत्तों जैसे जानवरों के प्रति इतने आसक्त क्योंं हैं जबकि वे मुर्गीपालने वालों या रेशमी कीड़ों के बारे में कुछ नहीं कहते। बहरहाल न्यायपालिका को भी सामाजिक-धार्मिक सुधार के लिए तब प्रयास नहीं करना चाहिए जबकि समाज उसके लिए तैयार नहीं हो। उसके पास आदेशों का पालन कराने के लिए कोई मशीनरी नहीं है। वहीं एक खतरा यह भी रहता है कि असहज करने वाले आदेशों से चिढ़े हुए राजनेता भीड़ का सहारा लें।
Keyword: supreme court, high court, order, उच्चतम न्यायालय, न्यायपालिका,
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