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आर्थिक प्रगति का लाभ और राजकोषीय नीति
रथिन रॉय /  February 06, 2017

हमें भविष्य के लिए ऐसी राजकोषीय नीति तैयार करनी चाहिए ताकि वृद्धि दर में आने वाली तेजी का फायदा देश के अधिकांश लोगों तक पहुंच सके। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं रथिन रॉय

 
हाल के महीनों में कई लोगों ने भारत की राजकोषीय नीति और उसकी विकास गाथा पर टिप्पणियां की हैं। मैं वृद्धि संबंधी दो बड़े प्रश्नों पर ध्यान केंद्रित करूंगा जो राजकोषीय नीति को प्रभावित करते हैं। एक बजट इनका समाधान नहीं कर सकता लेकिन मेरी नजर में यह कहीं अधिक उत्पादक कवायद है, बजाय कि इस बात को लेकर अनावश्यक बातें करने के कि बजट किस तरह वृद्धि को प्रोत्साहन दे सकता है।
 
पहली बात तो यह कि वृद्धि में गिरावट आ रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? क्या खपत की मांग में कमी आ रही है? कीमतें कम होनी चाहिए तभी मांग में इजाफा होगा। परंतु ऐसा नहीं हो रहा है। मुद्रास्फीति भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा तय लक्ष्य से ऊपर है। अगर ऐसा है तो इसका हल यही है कि आरबीआई मुद्रास्फीति का बेहतर प्रबंधन करे। निश्चित तौर पर नीतिगत ध्यान इसी बात पर केंद्रित होना चाहिए, बजाय कि सरकार से और अधिक व्यय की गुहार लगाते रहने के। अगर वृद्धि में गिरावट निजी निवेश में कमी के चलते है तो फिर यह मांग नहीं की जा सकती। अगर ऐसा मांग में कमी की वजह से है और क्षमता काफी है तो नीतिगत कदम ऐसे होने चाहिए जैसे ऊपर बताए गए। परंतु कुछ लोगों का कहना है कि निवेश इसलिए कम है क्योंकि निवेशकों की धारणा कमजोर है। अगर ऐसा है तो फिर सरकारी व्यय इसमें कितनी मदद कर पाएगा यह समझ से परे है। आर्थिक नीति दिल से नहीं दिमाग से चलती है और सरकारी व्यय बढ़ाने जैसा फौरी उपाय मेरी नजर में बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता है।
 
कुछ लोग अर्थशास्त्री कींस की शैली के प्रति चक्र की वकालत करते हैं। परंतु मैं इससे भी बहुत प्रभावित नहीं हूं। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है किसी ने अब तक गंभीरतापूर्वक भारत के लिए कोई ऐसा कारोबारी चक्र प्रकाशित नहीं किया है जिसे ध्यान में रखकर नीति निर्माण किया जाए। भारत वृद्धि को प्रभावित कर रहे तमाम संस्थागत अवरोधों और बाहरी झटकों के बावजूद विकसित हो रहा है। मुझे अब तक किसी बाहरी झटके का प्रमाण तो नहीं नजर आ रहा है और मैं नोटबंदी को ऐसी कोई घटना मानने को तैयार नहीं हूं क्योंकि सरकार और आरबीआई दोनों ने हमें आश्वस्त किया है कि किसी भी तरह का नकारात्मक असर अस्थायी है और निकट भविष्य में उच्च वृद्धि दर की मदद से इसकी भरपाई की जा सकेगी। 
 
अगर हम कींस के सामान्य सिद्धांत को कुछ रद्दोबदल के साथ भारत पर लागू भी कर दें तो ऐसा करने का सबसे बेहतर तरीका यही होगा कि हम अतिरिक्त कराधान से जुटाए गए राजस्व से सार्वजनिक व्यय में इजाफा कर दें। इससे खर्च में इजाफा होगा। मैं इस अनुशंसा को कोई अपवाद नहीं मानता हूं जबकि सरकार में हर स्तर पर यह क्षमता मौजूद है कि वह चाहे तो करों में जोरदार इजाफा कर सकती है और यह क्षमता ऐतिहासिक रूप से प्रश्नेय भी है। सरकार ऋण ले कर भी व्यय में इजाफा कर सकती है लेकिन यहां एक समस्या है। केंद्र सरकार पहले ही राजस्व घाटे से जूझ रही है। उसका प्रमुख वाहक ऐतिहासिक रूप से पड़ रहा ब्याज का बोझ है। इसमें अगर और इजाफा किया गया तो खपत में इजाफा होगा भविष्य का राजकोषीय स्थायित्व प्रभावित होगा। 
 
अगर सरकार निवेश में इजाफा करना ही चाहती है तो उसे वास्तविक क्षेत्र में ऐसा करना चाहिए। यानी सकल जमा पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) में बढ़ोतरी होनी चाहिए। परंतु इसका प्रभाव सरकार द्वारा व्यय में किए गए इजाफे की तुलना में कम होगा। चाहे जो भी हो जीएफसीएफ का असर इसलिए नहीं हो पाता है क्योंकि ऐसे व्यय के लिए बहुत सीमित क्षेत्र ही मौजूद हैं। रेलवे जैसे विभागों में निरंतर कम व्यय यही दर्शाता है। ऐसे में निवेश बढ़ाने के लिए ऋण लेने का कोई तुक नहीं है। अगर समग्र मांग में इजाफा करना ही असल इरादा है तो एयर इंडिया या राष्ट्रीयकृत बैंकों में पूंजी डालने का क्या तुक ?
 
वृद्धि को लेकर दूसरी बड़ी चिंता यह है कि इसने देश के अधिकांश लोगों को लाभान्वित नहीं किया है। यहां मूल समस्या यह है कि वृद्धि को केवल अमीरों की खपत और उनका निवेश प्रभावित करते हैं। हम एक ऐसी अर्थव्यवस्था वाले देश हैं जहां वाहनों की बिक्री में गिरावट को आर्थिक सेहत की बानगी माना जाता है। इस समस्या के दो निदान हैं। पहला ढांचागत हल। यानी अधिक से अधिक लोगों को उच्च वेतनमान पर उत्पादक कार्य में लगाया जाए और इस तरह वृद्धि हासिल की जाए। दूसरा तरीका है वृद्धि के लाभार्थियों से पूंजी लेकर शेष में बांटी जाए। यह पुराना विचार है। लोककल्याण पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में दूसरा सिद्धांत यही बताता है कि एक बार अर्थव्यवस्था वांछित वृद्धि दर हासिल कर ले तो लाभार्थियों पर कर आदि लगाकर निचले स्तर पर आय का वितरण किया जा सकता है। मूलभूत आय के विचार को यही सिद्धांत बढ़ावा देता है। कई प्रमुख लोगों ने मूलभूत या आधारभूत आय सुनिश्चित करने के विचार को लेकर अपनी राय प्रकट की है। 
 
परंतु एक बात जिस पर यहां ध्यान नहीं दिया जा रहा है वह है मूलभूत नीतिगत चयन। देश की वृद्धि से कुछ ही लोग स्थायी रूप से लाभान्वित होंगे जबकि शेष की मदद सरकारी हस्तक्षेप से होगी। वृद्धि उनको प्रत्यक्ष लाभ नहीं पहुंचाएगी। इसकी बदौलत उनके जीवन में कोई सीधा सुधार नहीं होगा बल्कि सरकार उनको इसके लिए सहायता प्रदान करेगी। इस नए विचार के विरोधियों और समर्थकों के बीच यही बहस है कि यह मनरेगा तथा अन्य कल्याण योजनाओं से बेहतर है या नहीं। इस बारे में कोई चर्चा नहीं कर रहा कि शेष लोगों को इसका हिस्सा कैसे बनाया जाए। या फिर बेहतर जन सेवाएं, स्वास्थ्य और शिक्षा कैसे सुनिश्चित हों ताकि भविष्य की पीढिय़ां इस विकास गाथा का हिस्सा बन सकें। 
 
समावेशी वृद्धि का तात्पर्य है वृद्धि में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी। परंतु मौजूदा राजकोषीय बहस महज इस बात पर केंद्रित है कि नुकसान उठाने वालों की क्षतिपूर्ति बजट की मदद से किस प्रकार की जाए? कम से कम हमारे प्रधानमंत्री ने मध्यम अवधि की समावेशी वृद्धि की आवश्यकता को पहचाना है। ऐसे में वक्त  आ गया है कि हम मध्यम अवधि की समावेशी राजकोषीय नीति पर अधिक से अधिक ध्यान केंद्रित करें।
Keyword: राजकोषीय नीति, मुद्रास्फीति, भारतीय रिजर्व बैंक, आरबीआई,,
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