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कर प्रशासन की जवाबदेही
संपादकीय /  February 06, 2017

वर्ष 2017-18 के आम बजट समेत हाल के दिनों में सरकार की नीतियों में कर दायरा बढ़ाने का लक्ष्य साफ नजर आता है, जो स्वागतयोग्य है। अपेक्षाकृत कम करयोग्य आय वाले लोगों के लिए कर दर कम करने के प्रयास को इसी दृष्टिï से देखा जाना चाहिए। बहरहाल, अन्य चिंताओं की बात करें तो कराधान को लेकर चिंताएं कम नहीं हुई हैं। खासतौर पर सरकार को यह समझना होगा कि कर प्रशासन की निष्ठुरता और उसकी कमतर जवाबदेही के साथ कर दायरे में विस्तार नहीं लाया जा सकता है। बल्कि हकीकत में इसका उलटा ही होता है। वित्त विधेयक के कुछ प्रावधानों ने असंतोष को जन्म दिया है। विधेयक में कहा गया है कि पिछली तिथि से कर लगाने के मामले में कर अधिकारियों को पंचाट या अन्य प्राधिकार के समक्ष भी यह बताना आवश्यक नहीं होगा कि आखिर क्यों उनको ऐसा लगा कि कर देने वाला व्यक्ति अपनी परिसंपत्तियां छिपा रहा है। 

 
यह प्रावधान परेशान करने वाला है क्योंकि यह जवाबदेही की शर्त का उल्लंघन करता है। अगर आकलन करने वाले अधिकारी ने यह घोषित किया है कि उसके पास यह मानने की पर्याप्त वजह है या उसे यह अंदेशा है कि संबंधित व्यक्ति परिसंपत्तियां छिपा रहा है तो वह इसकी खोजबीन का आदेश जारी कर सकता है। अगर यह विधेयक कानून बन गया तो इस निर्णय की समीक्षा भी नहीं की जा सकेगी। इसका देश में कर प्रशासन की प्रकृति पर अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण प्रभाव होगा। इतना ही नहीं यह बात सरकार की इस बात के एकदम उलट है कि वह इस क्षेत्र में अधिकाधिक सक्रियता से कर प्रशासन को करदाताओं के अनुकूल बनाना चाहती है। आयकर रिटर्न और बैंक खातों का विश्लेषण यह बताता है कि ऐसा करने के लिए मानव हस्तक्षेप को कम से कमतर करना होगा। किसी न किसी बिंदु पर अधिकारी को निर्णय लेना होगा और सरकार को उस अधिकारी को जवाबदेह बनाना चाहिए। जाहिर सी बात है वित्त विधेयक के ये प्रावधान सरकार के इस दावे को ही खारिज करते हैं कि वह मनमानेपन को कम करने की प्रक्रिया में है। अगर विवेक आधारित निर्णय कम किए जा रहे हैं तो आखिर क्यों कर अधिकारियों को जांच से बचाया जा रहा है। निश्चित रूप से जांच की कोई भी प्रक्रिया पारदर्शी मानकों पर आधारित होनी चाहिए? ऐसे सुधारों से कर व्यवस्था में लोगों का विश्वास बहाल होगा। 
 
सामान्य तौर पर देखा जाए तो सरकार का लक्ष्य यह होना चाहिए कि अधिक से अधिक लोग कर व्यवस्था में शामिल हों और इस प्रकार वे औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनें। नवंबर में हुई उच्च मूल्य वर्ग की नोटबंदी के बाद बड़े पैमाने पर खातों में जमा हुई धनराशि और इस संबंध में आए ढेर सारे आंकड़ों के बाद जांच की प्रक्रिया शुरू करने के लोभ से बच पाना आसान नहीं है। परंतु ऐसे उपायों का इस्तेमाल सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए। इन्हें पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। अगर कर आधार का विस्तार करना है तो कर प्रशासन के  वास्तविक संस्थागत सुधारों को प्राथमिकता पर अंजाम देना होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बजट में इस दिशा में बहुत अधिक कदम देखने को नहीं मिले। यह बात ध्यान देने लायक है कि फिलहाल विभिन्न प्रािधकारों के पास प्रत्यक्ष कर के करीब 390,000 मामले लंबित हैं। अगर इन मामलों को पारदर्शी ढंग से और जल्दी हल किया जाता है तो नए मामलों में मनमाना व्यवहार देखने को नहीं मिलेगा। इस बात को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कर वंचना एक गंभीर समस्या है। सरकार का इस पर प्रहार सही है। परंतु जब तक कर वंचना कम करने के लिए सही नीति नहीं अपनाई जाएगी और इस क्रम में कर प्रशासन पर जनता का भरोसा नहीं बढ़ाया जाएगा। तब तक इसका विफल होना निश्चित है।
Keyword: आम बजट, सरकार, करयोग्य आय, कराधान,
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