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सब्सिडी के बदले नकद का धूमिल हुआ मकसद
नितिन सेठी /  February 05, 2017

तीन केंद्रशासित प्रदेशों चंडीगढ़, दादरा नगर हवेली और पुदुच्चेरी में सब्सिडी पर अनाज देने की योजना के स्थान पर नकदी हस्तांतरण के लिए शुुरू की गईं प्रायोगिक योजनाएं नाकाम रही हैं। इन योजनाओं को शुरू हुए एक साल से ज्यादा समय हो गया है। नीति आयोग और केंद्र सरकार के खाद्य विभाग द्वारा कराए गए एक नमूना अध्ययन में यह बात सामने आई है। इस अध्ययन की रिपोर्ट अगस्त 2016 को सरकार को सौंपी गई थी।

 
ये योजनाएं सितंबर 2015 में शुरू की गई थीं। अध्ययन के मुताबिक सितंबर 2015 से मई 2016 तक 50 फीसदी लोगों को या तो कुछ भी पैसा नहीं मिला या फिर उससे कम पैसा मिला जिसके वे हकदार थे। 17 फीसदी लोगों को हक से ज्यादा पैसा मिला। इन योजनाओं के तहत 40 फीसदी पैसे के बारे में यह पता नहीं लग पाया कि यह सही हाथों में पहुंचा या नहीं। इन तीन केंद्रशासित प्रदेशों के लोगों को राशन की दुकानों से पहले जितना अनाज मिलता था उतना अनाज बाजार से खरीदने के लिए उन्हें औसतन 103 से 207 रुपये ज्यादा रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़ रहे हैं। यानी प्रत्येक परिवार को जितना पैसा मिलता है उससे उनका गुजारा नहीं हो रहा है।
 
अध्ययन का मकसद इस बात का पता लगाना था कि क्या ये प्रायोगिक परियोजनाएं अपने लक्ष्य में सफल रही हैं। क्या लोगों को पूरा पैसा समय पर मिल रहा है। लेकिन ये परियोजनाएं अपने मकसद में नाकाम रही हैं। अलबत्ता इनमें मामूली सुधार जरूर आया है। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि चंडीगढ़ और पुदुच्चेरी में केवल 40 फीसदी परिवार ही सब्सिडी वाले अनाज के बदले नकदी हस्तांतरण को तरजीह देते हैं। यह अध्ययन जे पाल साउथ एशिया ने किया है। यह संस्था वित्तीय प्रबंधन एवं शोध संस्थान में स्थित है और मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्रोलॉजी में स्थित एक शोध संस्थान की सहयोगी है।
 
खासकर पुदुच्चेरी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं जहां केवल दो महीने बाद ही जनाक्रोश के कारण सरकार को अपने हाथ खींचने पड़े थे। सरकार ने 10 किलोग्राम अनाज बांटने के साथ-साथ नकदी हस्तांतरण की योजना भी जारी रखी। नकदी हस्तातंरण को लोगों ने ज्यादा भाव नहीं दिया। यह रिपोर्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल की आर्थिक समीक्षा में सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों और योजनाओं के स्थान पर सार्वभौमिक बुनियादी आय (यूबीआई) की वकालत की गई है। यूबीआई एक तरह से नकदी हस्तांतरण योजना की तरह है जिसे सरकार ने तीन केंद्रशासित प्रदेशों में प्रायोगिक तौर पर शुरू किया था। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने सरकार को सौंपी गई अध्ययन की रिपोर्ट की समीक्षा की। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट के बाद बिज़नेस स्टैंडर्ड को दिए साक्षात्कार में कहा कि यूबीआई शानदार विचार है लेकिन साथ ही कहा कि भारतीय राजनीति अभी परिपक्व नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में यूबीआई असंभव है। अध्ययन से यह बात सामने आई है कि यूबीआई या नकदी हस्तांतरण योजना के लिए अभी व्यवस्थाएं और बुनियादी ढांचा तैयार नहीं है। इन तीन केंद्रशासित प्रदेशों में सरकार प्रयोग कर सकती थी क्योंकि ये सभी शहरी इलाके हैं और वहां बेहतर बुनियादी ढांचा होने के साथ-साथ केंद्र सरकार के पास ज्यादा अधिकार थे।
 
यह अध्ययन दो चरणों में किया गया। ताजा अध्ययन अगस्त 2016 में किया गया और इसमें कई तरह की दिक्कतें पाई गईं। अलबत्ता अध्ययन में पाया गया कि पिछले चरण की तुलना में इसमें कुछ सुधार हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, 'कुल वितरण का एक अच्छा खासा हिस्सा अब भी लाभार्थियों तक नहीं पहुंच रहा है।' या तो उनका पैसा ऐसे खातों में जा रहा है जो उनकी पहुंच से दूर है या फिर इसमें कोई व्यवस्थागत खामी है। माहवार राशि के वितरण में भी कई असमानताएं हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने स्वतंत्र रूप से एक केंद्रशासित प्रदेश में इन आंकड़ों की पुष्टिï की जिसके आंकड़े सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हैं।
 
रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों ने नकदी हस्तांतरण योजना के तहत जितनी राशि वितरित की उसमें से 60 फीसदी से कम ही लाभार्थियों को मिली। सितंबर 2015 से जून 2016 तक इन तीन केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों ने दावा किया कि उन्होंने लोगों को सब्सिडी पर अनाज देने की व्यवस्था रोकने के बाद से 1,05,50,207 रुपये लाभार्थियों के खातों में हस्तांतरित किए हैं। लेकिन अध्यनन में पाया गया कि 42,42,323 रुपये लाभार्थियों तक नहीं पहुंचे। शोधकर्ता इस बात का पता लगाने में नाकाम रहे कि कैसे कुछ लाभार्थियों को हक से ज्यादा पैसा मिल रहा है। प्रायोगिक योजनाओं के लागू होने के एक साल बाद भी पूरा पैसा पाने वाले लाभार्थियों की संख्या माहवार आधार पर महीने दर महीने बदलती रही और यह शत प्रतिशत से बहुत दूर है। 
 
अध्ययन के दौरान यह भी पाया गया कि 17.6 फीसदी लाभार्थियों को शुरुआत में तो पैसा मिला लेकिन बाद में नहीं मिला। शोधकर्ताओं का कहना है कि करीब एक चौथाई लोगों ने इस योजना के खिलाफ औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज की लेकिन किसी ने भी टोल फ्री नंबर का इस्तेमाल नहीं किया जबकि एक तिहाई लोग इन नंबर से वाकिफ थे। अधिकांश शिकायतों में कहा गया था कि उन्हें जो पैसा दिया गया है वह बाजार से 5 किलोग्राम चावल लेने के लिए पर्याप्त नहीं है। साथ ही लोगों को नकद राशि हासिल करने के लिए पीडीएस की तुलना में ज्यादा समय और पैसा लगाना पड़ा। अनाज की तुलना में नकद राशि हासिल करने के लिए लोगों को हर महीने 75 से 90 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़े। कुल मिलाकर जितना अनाज वे पहले राशन की दुकानों से लेते थे उतना अनाज खरीदने के लिए हर परिवार को औेसतन 103 से 207 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़े।
Keyword: subsidy, चंडीगढ़, दादरा नगर हवेली, पुदुच्चेरी, सब्सिडी, अनाज, नकदी हस्तांतरण,,
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