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चंदे पर धीमी शुरुआत
संपादकीय /  February 05, 2017

राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता को इस बार के बजट में प्रमुख स्थान देकर सरकार ने उसे चर्चा के केंद्र में लाने का प्रयास किया है। यह सराहनीय पहल है क्योंकि कोई भी सरकार भारत में भ्रष्टचार और काला धन खत्म करने के प्रति गंभीर होने का दावा तब तक नहीं कर सकती है, जब तक वह यह सुनिश्चित न कर दे कि राजनीतिक दलों और उनके नेताओं का कामकाज पूरी तरह पारदर्शी होगा। पिछले वर्ष 8 नवंबर को विमुद्रीकरण की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद से पारदर्शिता की ये मांगें और भी मुखर हो गई थीं। उसके बाद के महीनों में सरकार ने ऐसे नियम लागू किए, जिनके तहत आम आदमी को छोटे से छोटे लेनदेन को भी सही और पारदर्शी ठहराने के लिए पहचान का प्रमाण देना पड़ा और अपनी अंगुली पर स्याही तक लगवानी पड़ी। लेकिन सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के नाम पर लोगों ने ऐसे तमाम कष्ट इस उम्मीद में सह लिए कि आम आदमी पर लागू होने वाले नियमों और राजनीतिक दलों पर लागू होने वाले नियमों में मौजूद अंतर को सरकार जल्द ही पाट देगी। बजट ने इस मामले में स्वागतयोग्य शुरुआत की है, लेकिन प्रावधानों को बारीकी से दखने पर लगता है कि इस अन्यायपूर्ण अंतर को कम करने के लिए सरकार को अभी बहुत कुछ करना होगा।

 
इस बार के बजट में चुनाव आयोग की सिफारिशों के अनुरूप पहला बदलाव यह किया गया कि अज्ञात स्रोत से राजनीतिक दलों को मिलने वाले अधिकतम नकद चंदे की सीमा 20,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये कर दी गई। फिलहाल राजनीतिक दलों को 20,000 रुपये से कम के चंदों का ब्योरा नहीं देना पड़ता और यह बात किसी से नहीं छिपी है कि काला धन जमा करने वाले इसका भरपूर दुरुपयोग करते हैं। इस सीमा को घटाकर 2,000 रुपये कर देने भर से कोई सार्थक बदलाव आने की संभावना कम ही है। दूसरी बड़ी घोषणा भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव है। इस संशोधन के बाद चुनावी बॉन्ड जारी किए जा सकेंगे, जिन्हें चंदा देने वाले चेक अथवा डिजिटल भुगतान के जरिये खरीद सकेंगे और राजनीतिक दल उन्हें भुना लेंगे। इससे राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक और तरीका तो लोगों के पास आ जाता है, लेकिन राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता इससे नहीं बढ़ती।
 
दो अन्य प्रावधान घोषित किए गए हैं। पहला प्रावधान यह है कि राजनीतिक दल चेक अथवा डिजिटल माध्यम से चंदा लेने के अधिकारी होंगे और दूसरा है, दलों को आयकर में छूट पाने के लिए निर्दिष्टï अवधि के भीतर टैक्स रिटर्न भरना होगा। ये दोनों बजट से पहले ही लागू थे। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) द्वारा किया गया विश्लेषण बताता है कि पिछले पांच वित्त वर्षों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट औसतन 182 दिन देर से निर्वाचन आयोग के पास जमा कराई और कांग्रेस ने औसतन 166 दिनों की लेटलतीफी दिखाई। इतना ही नहीं, सरकार आम आदमी के खातों की छानबीन में जितनी तत्पर दिखती है, बजट में उतनी तत्परता राजनीतिक दलों के वित्तीय स्रोतों की छानबीन का उपाय करने अथवा दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान रखने में नहीं दिखाई गई।
 
कुल मिलाकर बजट में की गई घोषणाओं से न तो आम आदमी के लिए यह पहेली बूझना आसान हुआ है कि राजनीतिक दलों को रकम कहां से मिलती है और न ही उनसे दलों के लिए अधिक जवाबदेही सुनिश्चित करना अनिवार्य हो जाता है। इससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि आम आदमी और राजनीतिक दलों को अब भी एक नजर से नहीं देखा जा रहा है, जबकि दलों को आय के स्रोतों के मामले में और आय तथा व्यय के बीच अंतर होने पर कर में छूट मिल जाती है। सरकार अगर चाहती है कि 'अधिक स्वच्छ' भारत के उसके आह्वïान को गंभीरता से सुना जाए तो उसे वास्तविक और प्रभावी बदलाव लाने होंगे।
Keyword: राजनीतिक, भ्रष्टचार और काला धन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
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