बिजनेस स्टैंडर्ड - एनपीए मसले के समाधान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत
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एनपीए मसले के समाधान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत
अरूप रॉयचौधरी /  February 05, 2017

बजट में वित्तीय अनुशासन को लेकर सरकार की विश्वसनीयता बहाल हुई है। साथ ही बड़े कॉर्पोरेट और छोटे कारोबारियों को कारोबार के समान अवसर मिले हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने अरूप रॉयचौधरी के साथ बातचीत में वृद्धि दर के अनुमानों को लेकर आर्थिक  समीक्षा 2017-18 का बचाव किया और कहा कि कर चोरी करने वालों को कड़ा संदेश दिया गया है। संपादित अंश...

 
बजट पर आपका क्या विचार है?
 
बजट में विषय संबंधी तालमेल था। वित्तीय घाटे को लेकर पूरी तरह सही कदम उठाया गया है और इस सरकार के सत्ता में आने के बाद से लगातार ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं। हर साल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में घाटे में 0.2-0.3 प्रतिशत कमी आ रही है। समेकन की राह ने वित्तीय विश्वसनीयता बनाई है। आप वह करके विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सकते, जो दूसरे लोग आपसे चाहते हैं, बल्कि आपने जो कहा है वह करके विश्वसनीयता हासिल कर सकते हैं। हमने कहा था कि इन लक्ष्यों को पूरा किया जाएगा और सरकार ने ऐसा किया। नोटबंदी की वजह से कुछ खास क्षेत्रों को लाभ दिए जाने की जरूरत थी। साथ ही विश्वसनीयता बरकरार रखना भी जरूरी था। इसमें लोगों को थोड़ा कमी यह दिख सकती है कि अगले साल राजस्व आवक थोड़ी कम है। नोटबंदी के बाद व्यक्तिगत आयकर की स्थिति बेहतर होगी। अगर आप आंकड़ों पर गौर करें तो आयकर और जीडीपी का अनुपात बढ़ेगा। लेकिन अप्रत्यक्ष कर और जीडीपी का अनुपात चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि अब तेल से मिलने वाला फायदा नहींं होगा। दूसरे यह पहला साल होगा, जब बहुत जटिल कर लागू होंगे। कर संग्रह के मामले में जीएसटी बहुत तेजी लाने वाला होगा। लेकिन पहले साल केंद्र व राज्यों में बहुत बदलाव आएगा। और तीसरे, हमें राज्यों को मुआवजा देना है। मैं अगले साल अप्रत्यक्ष कर संग्रह को लेकर थोड़ा चिंतित हूं। हमें कुछ क्षेत्रों में व्यय करना होगा वित्तीय विश्वसनीयता के साथ संतुलन भी साधना होगा। बजट में ऐसा किया गया है। 
 
आर्थिक समीक्षा में 2017-18 में जीडीपी वृद्धि दर 6.75 से 7.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, इस पर आपकी क्या राय है? 
 
अगले साल के बारे में देखने के पहले हमें देखना होगा कि इस साल के आखिर में हमारा प्रदर्शन कैसा रहा। यह शुरुआती बिंदु है। अब हमने 6.75 से 7.5 प्रतिशत वृद्धि दर का अनुमान लगाया है। अब हम यह कह सकते हैं कि अगले साल नोटबंदी और उसकी वजह से नकदी के संकट के असर का सबसे खराब दौर गुजर चुका होगा। इसलिए अगले साल इससे कुछ अलग होगा। नोटबंदी के कारण दो खराब होना था वह हो चुका है और अब उसके बाद स्थिति बेहतर होगी। इस हिसाब से अनुमान लगाए गए हैं। 
 
इस बजट के बारे में कहा जा रहा है कि इससे किसी को  नफा नुकसान नहीं हुआ?
 
मुझे लगता है कि यह बहुत अनुचित आकलन होगा। विश्लेषणात्मक रूप से उन कदमों को देखना होगा, जो उठाए गए हैं। नोटबंदी हुई, और हमने उसके मुताबिक कदम उठाए और हम करदाताओं का देश बनने की ओर बढ़ रहे है। इसका मतलब करदाताओं को पुरस्कृत करने व कर चोरों को दंडित करने से है। मुझे लगता है कि कददाता पुरस्कृत किए गए हैं। दरें कम करके करदाताओं को लुभाने की कवायद की गई है और पहली बार करदाताओं के लिए प्रक्रिया आसान की गई है। वहीं काले धन की नकदी के स्रोत को रोकने की कवायद की गई है। इनमें से एक रियल एस्टेट है। मुझे बहुत उम्मीद है कि रियल एस्टेट को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाया जाएगा। इसके अलावा राजनीतिक वित्तपोषण का मसला है। मैं राजनीतिक विशेषज्ञ नहीं हूं, लेकिन बजट में की गई घोषणा से इस मसले पर बहस तेज हुई है। 
 
आर्थिक समीक्षा में 'ट्विन बैलेंस शीट की समस्याओं' के आकार पर कहा गया है। आपने भी सार्वजनिक क्षेत्र पुनर्वास एजेंसी की सिफारिश की है। साफ है कि एनपीए का मसला अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या है। बजट में इस पर कुछ नहींं कहा गया?
 
मुझे लगता है कि इस समस्या का समाधान मुश्किल है। यह ऐसी चीजन नहींं है कि आप इसकी घोषणा करें और समाधान निकाल दें। इस पर हमारे कुछ विचार हैं। मुझे लगता है कि यह जरूरी है कि इस पर विचार किया जाए कि सरकारी बैंक (जो खराब संपत्ति की समस्या से जूझ रहे हैं) भी बड़ी कंपनी हैं। यह बैंक की समस्या के साथ साथ कंपनी की समस्या है। इनमें से ज्यादातर कंपनियां स्वस्थ नहीं हैं। आपको उनके उस कर्ज का बोझ वहन करना होगा, जो खराब है। लेकिन इस पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। यह कदम उठाने पड़ेंगे और निश्चित रूप से यह मध्य स्तर के बैंक मैनेजरों का मसला नहीं है। इसे राजनीतिक इच्छाशक्ति की प्रक्रिया बनानी होगी।  इस पर चर्चा करनी होगी कि खराब कर्ज जारी हैं। इसके तमाम समाधान हैं। कुल मिलाकर यथास्थिति बरकरार रखने से कुछ नहींं हुआ और यह समस्या का समाधान नहीं है। 
 
छोटी कंपनियों को कर में कटौती करके सरकार इसे बढ़ावा दे रही है कि कंपनियां छोटी बनी रहें?
 
अगर आप वास्तविक आंकड़ों को देखें तो बड़ी कंपनियों पर प्रभावी कर दरें 25 प्रतिशत हैं, जबकि छोटी कंपनियोंं पर 30 प्रतिशत है। आप स्थिति को सुधार ने के लिए क्या कर रहे हैं। बड़ी कंपनियां छूट का लाभ ले रही हैं। छोटी कंपनियों को फायदा नहीं मिल रहा है। इस तरह से आप छोटी कंपनियों को लाभ न मिलने की स्थिति से उबार रहे हैं। 
 
सार्वभौमिक मूल आय (यूबीआई) के विचार को कैसे लागू किया जा सकता है?
 
यह प्राथमिकता होनी चाहिए। मुझे लगया है कि हमारे सामने कुछ चुनौतियां आएंगी। अप्रभावशाली वितरण इनमें से एक है। सभी अर्थव्यवस्थाएं संसाधनों का बंटवारा करती हैं और हम भी करते हैं। लेकिन क्या यह इतना अप्रभावशाली है? एक बिंदु पर राजनीतिक वर्ग और लोग महसूस करते हैं कि हमारी पुनर्वितरण व्यवस्था कितनी महंगी है। कुछ होगा, तब यह धारणा बदलेगी।
Keyword: एनपीए, बजट,,
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