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आम बजट की दिशा सही और संतुलित
आकाश प्रकाश /  February 02, 2017

 

बाजार बुरी खबर के लिए पूरी तरह तैयार थे। यही वजह है कि बजट पेश होने के बाद बाजार में तेजी देखने को मिली। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश 
 
आम बजट पर विचार करते हुए पहली बात दिमाग में यही आती है कि यह बजट बहुत महत्त्वाकांक्षी नहीं है लेकिन अच्छी बात यह है कि वित्त मंत्री ने कोई नकारात्मक कदम नहीं उठाया जिससे माहौल और खराब हो। अमीर विरोधी नीतियों के रूप में कोई झटका नहीं दिया गया, न ही किसी तरह का वर्ग आधारित कदम देखने को मिला जो कि हाल के दिनों में प्रधानमंत्री के भाषण का हिस्सा रहा है। लंबी अवधि के पूंजीगत कर की व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया गया, कोई संपदा कर नहीं और न ही वैश्विक कर लगाया गया। एक पल को तो ऐसा लगा मानो हम सन 1970 के दशक में वापसी कर चुके हैं और अमीर होना अपराध हो गया हो। अच्छी बात है कि इस बजट ने इस सोच को विराम दिया है।
 
बजट के गणित की बात करें तो वह मुझे तार्किक लगा। 11.75 फीसदी की नॉमिनल वृद्घि दर उचित लगती है। सकल कर राजस्व के 12.25 फीसदी की दर से बढऩे की बात कही गई है यह भी ठीक लगता है। यह दलील दी जा सकती है कि कर के आंकड़ों में आयकर के 25 फीसदी की दर से बढऩे का अनुमान लगाया गया है जो अधिक है। परंतु सरकार की दलील होगी कि नोटबंदी, डाटा माइनिंग और कर आधारित व्यापक लाभ नजर आ रहे हैं। उत्पाद शुल्क में केवल पांच फीसदी बढ़ोतरी की बात की गई है। यह उचित है क्योंकि तेल कीमतों में इजाफे का क्रम है और जीएसटी लागू होने वाला है। 
 
विनिवेश का लक्ष्य अवश्य ज्यादा नजर आ रहा है। इसके 72,500 करोड़ रुपये रहने की बात कही गई है। इस राशि में से 15,000 करोड़ रुपये सामरिक बिकवाली से आएंगे और 11,000 करोड़ रुपये बीमा कंपनियों की लिस्टिंग से। इन दोनों पर प्रश्न उठ सकता है। अच्छी बात है कि वित्त मंत्री ने नोटबंदी से हुए अप्रत्याशित धन लाभ कोई आवंटन नहीं किया और न ही जीएसटी के कारण कोई बढ़ीचढ़ी पेशकश की। पूंजीगत व्यय के बढ़कर 10.7 फीसदी होने की बात कही गई जो 5.8 फीसदी के राजस्व व्यय से काफी तेज है। यह बात सकारात्मक है। मुझे 3.2 फीसदी के राजकोषीय घाटा लक्ष्य से कोई समस्या नहीं है। यह राजकोषीय समावेशन की प्रक्रिया का हिस्सा है और सरकार की विश्वसनीयता पर कोई असर नहीं डालता। वित्त मंत्री इस मोर्चे पर खासे सफल रहे हैं। 1.9 फीसदी का राजस्व घाटा भी एफआरबीएम के लक्ष्य के दायरे में है। 
 
वित्त मंत्री ने कहा है कि वह एफआरबीएम समिति के उस लक्ष्य को हासिल करने का प्रयास करेंगे जिसमें 2023 तक सार्वजनिक ऋण जीडीपी अनुपात को 60 फीसदी करना है। सरकार की शुद्घ उधारी 4,25,000 करोड़ रुपये से घटकर 3,48,000 करोड़ रुपये हो गई है। बॉन्ड बाजारों की निगाह इस आंकड़े पर रहती है और यह एक सकारात्मक आंकड़ा है। जहां तक ढांचागत बदलाव की बात है तो कुछ रोचक कदम उठाए गए। तीन लाख रुपये से ऊपर के नकद लेनदेन की इजाजत न देना एक अहम फैसला है। पहली बार राजनीतिक चंदे को वैध बनाने की कोशिश हमने देखी। चंदा पाने वाले राजनीतिक दलों को अब उसका काफी जवाबदेही से हिसाब किताब रखना होगा। 2000 रुपये से अधिक के नकद चंदे की इजाजत न देना शुरुआती कदम है अधिकांश दल इससे आसानी से बच निकल सकते हैं लेकिन अच्छी बात यह है कि अब यह मुद्दा एजेंडे में आ गया है। रेल और सरकारी बीमा कंपनियों की सूचीबद्घता सकारात्मक कदम है और तेल एवं गैस क्षेत्र में एक अव्वल कंपनी निर्मित करने का निर्णय भी। हवाई अड्डïा प्राधिकरण की जमीन का वाणिज्यिक इस्तेमाल भी फंसी हुई संपत्ति के प्रयोग का उदाहरण है। आखिरकार सरकारी अपनी परिसंपत्तियों के भरपूर इस्तेमाल की दिशा में आगे बढ़ रही है। अगर जरूर पड़ी तो वह ताकत के आधार पर सुदृढ़ीकरण भी करेगी। अपनी कंपनियों के बारे में भी वह उस तरह सोच रही है जैसे एक मालिक को सोचना चाहिए। 
 
स्टार्टअप फंडिंग के नियम आसान किए गए हैं। सन 2020 तक के बॉन्ड धारण करने वाले एफपीआई को विदहोल्डिंग कर में रियायत दी गई है। अच्छी बात यह है कि इनको अप्रत्यक्ष हस्तांतरण के प्रावधान से छूट को लेकर एकदम स्पष्टï और साफ संदेश दिया गया है। बुनियादी ढांचे का दर्जा देकर सस्ते घरों के विचार को गति प्रदान की गई है। रेलवे के अंकेक्षण की व्यवस्था बदलना और सुरक्षा के लिए 1,00,000 करोड़ रुपये का फंड अहम हैं। कारोबारी सुगमता को लेकर भी कदम उठाए गए। एफआईपीबी को समाप्त करना अहम प्रतीकात्मक घटना है और इससे एफडीआई बढ़ाने में मदद मिल सकती है। 
 
घरेलू ट्रांसफर प्राइसिंग दिशानिर्देशों को कुछ सामान्य बनाया गया। वित्त मंत्री ने कर प्रशासन की जवाबदेही बढ़ाने की बात भी जोर देकर कही। आय कर के मोर्चे पर अच्छी बात यह रही कि वित्त मंत्री ने शुरुआती दायरे में इजाफा नहीं किया बल्कि कर दर को घटाकर पांच फीसदी कर दिया।  देश में करदाता वैसे भी बहुत ज्यादा नहीं हैं। एक पन्ने का साधारण कर फॉर्म लाने का वादा और पांच लाख तक की आय वाले करदाताओं की किसी तरह की जांच नहीं करने की बात समझदारी भरी है। ऐसा करके लोगों को कर रिटर्न दाखिल करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सरकार ने आय कर के मोर्चे पर मामूली राहत प्रदान की जो कि अच्छी बात है। 
 
कॉर्पोरेट कर के मोर्चे पर उन्होंने एसएमई क्षेत्र की मदद करने का प्रयास किया है। उन की दर कम करके 25 फीसदी की गई है। नोटबंदी के बाद हुई दिक्कतों को देखते हुए यह बड़ी राहत है। बड़ी कंपनियों को भी शायद यही दर मिल सके। एक बार जीएसटी का पूरा राजस्व आने पर राजकोषीय स्थिति डेढ़ से दो साल में बेहतर हो जाएगी। सबसे बड़ी कमजोरी है सरकारी बैंकों में सुधार नहीं ला पाना। बैंकों के पूंजीकरण के लिए केवल 10,000 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की गई है। जबकि जरूरत इससे कई गुना अधिक राशि की है। यह अर्थव्यवस्था की दुखती रग बनी हुई है। सरकारी बैंकों के प्रशासन, प्रबंधन आदि में कोई खास सुधार नहीं किया गया है। जबकि कभी न कभी तो यह काम करना होगा। कुल मिलाकर यह बजट एक बढिय़ा प्रयास है। यह कोई नुकसान नहीं करता और अर्थव्यवस्था को सही दिशा में आगे ले जाता है। बाजार बुरी से बुरी स्थिति के लिए तैयार थे इसलिए उनमें तेजी देखने को मिली। अब एक बार फिर आय पर ध्यान देने का वक्त है। 
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