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'आज के हिसाब से है बजट' (सवाल-जवाब : अरुण जेटली)
बीएस संवाददाता / नई दिल्ली 02 01, 2017

सवाल-जवाब : अरुण जेटली, वित्त मंत्री

इस बार के बजट में आपने किस पर  जोर दिया?

अर्थव्यवस्था के लिहाज से हमारी तीन ताकत रहीं: आज जो स्थिति है, बजट को उसके हिसाब से ही रखा जाना था। अगर हम वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो अर्थव्यवस्था के लिहाज से हम तीन मोर्चों पर मजबूत रहे: सार्वजनिक निवेश, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विमुद्रीकरण के दौर को छोड़ दें तो उपभोक्ताओं की खर्च करने की अतिरिक्त क्षमता। अगर हम अपनी इसी ताकत का जमकर इस्तेमाल करेंगे तो नतीजे भी बेहतर ही होंगे। निजी क्षेत्र और बैंक अभी कमजोर हैं, इसीलिए मुझे खर्च बढ़ाना था। इसके दो तरीके होते। या तो योजनाओं की संख्या बढ़ाई जाए या सफलता वाले क्षेत्र चुनकर उन पर खर्च बढ़ाया जाए।

खेती पर खर्च बढ़ाने की जरूरत थी। इसीलिए मैंने सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, मकान और कृषि बीमा पर खर्च किया। इसके बाद सामाजिक क्षेत्र और बुनियादी ढांचा था। हमने 3.9 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए, जिनमें 2.5 लाख करोड़ रुपये परिवहन पर खर्च होंगे। मैंने रेलवे के लिए 55,000 करोड़ रुपये रखे हैं। इसकी वजह यह है कि राजमार्ग, बंदरगाह, दूरसंचार संपर्क, स्मार्ट सिटी, ग्रामीण सड़कों में बढिया काम हो रहा है, इसलिए मुझे उन पर अधिक खर्च करना ही था।

निजी क्षेत्र कमजोर है, इसलिए मैंने सार्वजनिक खर्च बढ़ाया। विमुद्रीकरण की तकलीफ  कम हो सके, यह सोचकर एमएसएमई और छोट करदाताओं को राहत दी

फिर मैंने सोचा कि अर्थव्यवस्था को दरकार किस बात की है? इसलिए बजट में पहली बार ईमानदारी के साथ स्वीकार किया गया कि हम ऐसे देश में हैं, जहां कर नहीं चुकाने की प्रवृत्ति है। मैंने स्पष्ट कहा कि यहां कर का बोझ ईमानदार करदाताओं पर पड़ता है, जिसे कर चोरी करने वाले के हिस्से की भी भरपाई करनी पड़ती है। इसलिए मैंने कर चोरी करने वालों पर सख्ती की और करदाताओं को राहत दी।

छोटे करदाता को राहत देने से उसके हाथ में रकम आएगी, जिससे महंगाई का कांटा कम चुभेगा। इसके अलावा तमाम नए लोग भी छूट और रियायत का फायदा उठाने के बाद 5 फीसदी कर देने के लिए तैयार हो जाएंगे। वे आराम से कर के दायरे में आ सकते हैं। उनसे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी। इससे जरिये मैं कर देने वालों की संख्या बढ़ाना चाहता हूं। मैं विमुद्रीकरण के बाद सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमियों की मदद भी करना चाहता हूं। इसीलिए मैंने 96 फीसदी कंपनियों को कर में राहत दे दी। छोटे उद्यमी रोजगार देते हैं, इसलिए मैंने उन्हें राहत दी। पिछले साल की तरह इस बार भी मैंने आवासीय क्षेत्र को राहत दी, जिससे किफायती आवास को बुनियादी ढांचे का दर्जा मिल गया। एक और बात स्पष्ट है। वित्तीय और कानूनी व्यवस्था का मखौल उड़ाने वालों को हम बख्शेंगे नहीं। प्रधानमंत्री राजनीति में चंदे की व्यवस्था सुधारने की जंग छेड़ चुके हैं। मैं भी इसी पक्ष में हूं। कानून मंत्री रहते हुए मैंने कुछ कड़े कदम उठाए थे। इस बार मैंने और भी कड़ा कदम उठाया।

राजस्व के बारे में आपके अनुमान से मैं उलझन में हूं क्योंकि चालू वित्त वर्ष में आपका राजस्व 17 फीसदी बढ़ा, लेकिन आप केवल 12 फीसदी वृद्धि दिखा रहे हैं। अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन 11.75 फीसदी वृद्धि का अनुमान है। कोई खास वजह?

मेरे खयाल से चूक से काम अच्छा हो जाए तो ही बेहतर होता है। आपने संप्रग सरकार को भारी खर्च की बात करते देखा था। लेकिन असल में 1-1.5 लाख करोड़ रुपये ही खर्च होते थे। मैं नहीं चाहता कि बजट हल्का पड़े। हर साल संशोधित अनुमान अधिक रहे हैं। इस वित्त वर्ष के अंत में हमारे पास 80-90 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर संग्रह होगा। पिछले वर्ष और इस वर्ष मेरे संशोधित अनुमान पिछले बजट अनुमान के मुकाबले अधिक रहे हैं। पिछले साल मेरे पास उत्पाद शुल्क की वजह से अतिरिक्त राजस्व की गुंजाइश थी। लेकिन इस साल यह फायदा मेरे हाथ में नहीं रहा। इसलिए मुझे सतर्कता भरे अनुमान ही लगाने थे। लगातार दो साल से राजस्व 17 फीसदी की दर से बढ़ा है। इस साल मैं 12 फीसदी वृद्घि का अनुमान लगा रहा हूं। लेकिन अगर इसमें 14-15 फीसदी इजाफा होता है तो अच्छा रहेगा क्योंकि खर्च करने के लिए ज्यादा रकम होगी। 

राजस्व आकलन पूरी तरह से व्यक्तिगत आयकर पर केंद्रित दिखता है। यह पहले से ही 25 फीसदी की दर से बढ़ रहा है जबकि कॉर्पोरेट आयकर की वृद्धि दर केवल नौ फीसदी है। आपको ऐसा क्यों लगता है कि आयकर से मिलने वाला राजस्व बढ़ेगा? 

जो लोग नकदी में लेनदेन कर रहे थे, उन्हें अपना धन बैंकों में रखने के लिए बाध्य होना पड़ा है। आगे चलकर चेकों के जरिये भुगतान बढऩे से लोग अपनी आय की घोषणा खुलकर करेंगे। सीबीडीटी ने एक दिन पहले ही बताया है कि 18 लाख लोगों ने घोषित आय से अधिक रकम बैंकों में जमा की है। ऐसे में यह सारी रकम आयकर के दायरे में आएगी। इस वजह से मुझे लगता है कि व्यक्तिगत आयकर में बढ़ोतरी होगी।

बजट में विनिवेश का भी जिक्र किया गया है और इसके लिए काफी महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। पिछले दो वर्षों में आप अपने लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रहे थे।

हम बिना किसी शोर-शराबे के विनिवेश प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं। इस वित्त वर्ष में हम पहले ही 31,000 करोड़ रुपये का विनिवेश कर चुके हैं और इसके 45,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। अगले साल के लिए विनिवेश के अतिरिक्त मैं बीमा कंपनियों को भी सूची में रख सकता था। सेबी नियमों के तहत सरकार को इन कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी को घटाकर 74 फीसदी पर लाना है। हम विनिवेश प्रक्रिया में काफी लचीलापन लेकर आए हैं और रणनीतिक बिक्री भी कर रहे हैं। जहां पर विनिवेश संभव नहीं है वहां हम पुनर्खरीद का रास्ता अपनाएंगे।

विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) को खत्म करने के बारे में भी बजट में घोषणा की गई है। क्या इस बारे में आपके पास कोई रोडमैप है?

हम कुछ समय में उसे अंतिम रूप दे देंगे। आज के दौर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की राह काफी आसान हो गई है। करीब 90 फीसदी एफडीआई तो स्वचालित मार्ग से आ रहा है। ऐसे में एफआईपीबी केवल 10 फीसदी एफडीआई प्रस्तावों के लिए ही काम कर रहा है। अधिकांश स्पष्टीकरण तो संबंधित मंत्रालय से ही संबंधित हैं लिहाजा मंत्रालयों को ही फैसला लेने क्यों न दिया जाए? वे भी वित्त मंत्रालय की ही तरह सक्षम हैं।

क्या आप अपनी शक्तियों को कम करने की बात कर रहे हैं?

उदारीकरण की पूरी प्रक्रिया के पीछे ही यही सोच काम करती है।

रक्षा क्षेत्र के लिए खास नहीं करने को लेकर आलोचना हो रही है।

अगर रक्षा क्षेत्र अपनी अधिग्रहण प्रणाली को सशक्त कर सकता है तो उसे मनचाहा धन मिल सकता है। बजटीय प्रावधान तो सांकेतिक होते हैं, हमारे लिए रक्षा क्षेत्र सबसे बड़ी प्राथमिकता रहा है। रक्षा क्षेत्र के आवंटन और पेंशन राशि को मिलाकर देखें तो यह काफी बड़ी रकम है।

आर्थिक समीक्षा में सार्वभौम बुनियादी आय (यूबीआई) की बात कही गई थी लेकिन बजट में इसका जिक्र नहीं है। क्या सरकार इसके लिए इच्छुक नहीं है?

अरविंद सुब्रमण्यन ने यूबीआई का विचार देकर काफी अच्छा काम किया है। सरकार की तरफ से दी जा रही सब्सिडी को वापस लेकर उन लोगों को लाभ दिया जाए जिनको सबसे ज्यादा जरूरत है। लेकिन भारत में राजनीति उतनी परिपक्व नहीं है लिहाजा यूबीआई नामुमकिन लगता है।

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