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बैंकों पर दबाव ने ताजा की दूरसंचार क्षेत्र की तस्वीर
शीतल अग्रवाल /  January 08, 2017

एक प्रख्यात ब्रोकरेज के बैंकिंग विश्लेषक ने बैंकिंग क्षेत्र के लिए दूरसंचार जैसे हालात करार दिया और पिछले कुछ दिनों से बैंकों द्वारा उधारी दरों में कटौती की होड़ को आश्चर्यजनक बताया है। हालांकि बाजार कोष आधारित उधारी दर की लागत (एमसीएलआर) में 30-40 आधार अंक की कटौती की उम्मीद कर रहा था, लेकिन भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) द्वारा की गई 90 आधार अंक की कटौती ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया।
कई बैंकों के एसबीआई के नक्शे कदम पर चलने से बैंकिंग उद्योग में उसी तरह से 'कीमत-युद्घ' को बढ़ावा मिल सकता है जिस तरह दूरसंचार में देखा गया और इससे बैंकों का मुनाफा प्रभावित होगा। मोतीलाल ओसवाल सिक्योरिटीज में बैंकिंग विश्लेषक अल्पेश मेहता ने कहा, 'परिसंपत्तियों पर कम प्रतिफल को देखते हुए, मार्जिन में प्रत्येक गिरावट का पीएसयू बैंकों के लिए काफी नकारात्मक असर पड़ता है। शुद्घ ब्याज मार्जिन (एनआईएम) में 5 आधार अंक की गिरावट का पीएसयू बैंकों के मुनाफे पर 5 प्रतिशत तक और निजी बैंकों के लिए 1-2 फीसदी तक प्रभाव पड़ता है।'
हालांकि इन दर कटौती से बैंकों को कर्जदारों को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है लेकिन यह जरूरी नहीं है कि इससे ऋण की मांग में भारी तेजी आए। ऐसा इसलिए है क्योंकि ब्याज दर उधारी के निर्णय को प्रभावित करने वाले कारकों में से महज एक है।
बैंकों द्वारा दर कटौती का बैंकों के शुद्घ ब्याज मार्जिन (एनआईएम) पर बड़ा असर पड़ सकता है। प्रख्यात विदेशी ब्रोकरेज फर्म सीएलएसए का कहना है कि मान लीजिए कि एमसीएलआर सिर्फ वृद्घिशील ऋणों पर लागू है जो एनआईएम में 5 आधार अंक की कमी कर सकती है जिससे बैंकों की वित्त वर्ष 2018 की आय में 4 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और इस संदर्भ में पीएसयू बैंक ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की बड़ी ब्याज कटौती मौजूदा कर्जदारों को अपने ऋणों को स्थानांतरित करने के लिए प्रेरित कर सकती है जिससे इन बैंकों का एनआईएम प्रभावित हो सकता है। सेंट्रम कैपिटल में बैंकिंग विश्लेषक आलोक शाह का मानना है, 'बड़े पीएसयू बैंक एनआईएम में 10-12 फीसदी की कमी दर्ज कर सकते हैं वहीं कमजोर पीएसयू पर इसका ज्यादा नकारात्मक प्रभाव देखा जा सकता है। बड़े निजी बैंक इन दर कटौतियों से अपने एनआईएम में 8-10 आधार अंक की गिरावट महसूस कर सकते हैं।' हालांकि बैंक उधारी नोटबंदी के बाद से बड़ी तादाद में हासिल हुईं जमाओं को ठिकाने लगाने के लिहाज से एक बेहद लाभदायक विकल्प है।
मैक्वेरी कैपिटल में बैंकिंग विश्लेषक सुरेश गणपति का कहना है, 'हम दर कटौती को वृद्घि में सुधार के लिए रामबाण नहीं मान रहे हैं और हमारा मानना है कि बैंकों के लिए अपनी वृद्घि की रफ्तार मजबूत बनाना एक बड़ी चुनौती होगी।'
नोटबंदी के बाद बैंकों ने जमाओं का अच्छा प्रवाह दर्ज किया है जिसे देखते हुए कई विश्लेषकों का मानना है कि आगे एमसीएलआर में और कटौती हो सकती है। बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के इंद्रनील सेन गुप्ता का कहना है, 'हमारा अनुमान है कि यदि आरबीआई वित्त वर्ष 2018 में 2200 अरब रुपये के ओएमओ के जरिये व्यवस्था में नकदी डालता है तो बैंक अप्रैल-सितंबर के दौरान उधारी दरों में 50-75 आधार अंक तक की कटौती करेंगे।'
बैंकिंग शेयरों में ताजा कमजोरी के बाद भी निवेशकों ने खरीदारी में दिलचस्पी लेनी शुरू नहीं की है। शायद इसकी वजह यह है कि बैंक चालू तिमाही में कई मोर्चों पर कमजोर प्रदर्शन दर्ज करेंगे। इनमें ऋण वृद्घि, शुल्क आय वृद्घि, मार्जिन और उधारी लागत शामिल हैं।

Keyword: banks, share, telecom,
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