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बैंकों को आगे भी झेलना पड़ सकता है फंसे कर्ज का दर्द
भाषा / नई दिल्‍ली 12 30, 2016

पुराने फंसे कर्ज का संकट झेल रहे बैंकों को नए साल में भी यह दर्द झेलना पड़ सकता है। नकदी संकट के चलते नए साल में और औद्योगिक इकाइयों, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मझोली इकाइयों (एमएसएमई) के समय पर कर्ज नहीं चुकाने से यह समस्या बढ़ सकती है। नवंबर में 500 और 1,000 रुपये के नोटों को चलन से वापस लेने और नई मुद्रा जारी करने का बैंकों के मुनाफे पर भी बुरा असर पड़ सकता है। वर्ष के व्यस्त काम धंधे वाले समय में बैंक पुराने नोट जमा करने और नई मुद्रा जारी करने में लगे रहे। कर्ज वसूली और नया कर्ज देने का काम करीब-करीब ठप पड़ा रहा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 8 नवंबर को की गई नोटबंदी की घोषणा के बाद से करीब-करीब दो महीने पूरा बैंकिंग क्षेत्र पुराने नोट समेटने और नए नोट जारी करने में ही लगा रहा। दूसरे सभी काम ठप रहे। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के 27 बैंकों में से 14 बैंकों ने पिछले साल कुल 34,142 करोड़ रुपये का घाटा उठाया जबकि चालू वित्त वर्ष के दौरान हालात में ज्यादा सुधार नहीं दिखाई देती है। यहां तक कि निजी क्षेत्र के बैंकों में भी फंसे कर्ज की समस्या बढऩे लगी है। उनका भी मुनाफा कम हुआ है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कर्ज में फंसी राशि यानी एनपीए में सितंबर 2016 को समाप्त तीन माह के दौरान 80,000 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। इन बैंकों का सकल एनपीए सितंबर अंत में 6,30,323 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। जून अंत में यह 5,50,346 करोड़ रुपये पर था। नोटबंदी के बाद एनपीए बढऩे की चिंता को देखते हुए रिजर्व बैंक ने एक करोड़ रुपये तक के आवास, कार, कृषि और दूसरे कर्जों की किस्त वापसी में 60 दिन का अतिरिक्त समय दिया है। हालांकि, बैंकरों को लगता है कि चौथी तिमाही तक इसमें वृद्धि का रुख रहेगा।

Keyword: फंसे कर्ज, बैंक, बैंकिंग, नकदी संकट, औद्योगिक इकाई, एमएसएमई, पुराने नोट, नोटबंदी, एनपीए,
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