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बैंकिंग शेयरों पर अभी रह सकता है अधिक दबाव
शीतल अग्रवाल /  December 11, 2016

नीतिगत दरों में कटौती नहीं करने के भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के फैसले से बाजार को खासी निराशा हुई है। इसका सबसे पहला असर बैंकिंग शेयरों पर पड़ा और उसी दिन इनमें एक से तीन प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी 50 सूचकांक के मुकाबले निफ्टी बैंक सूचकांक में दोगुनी गिरावट आई। नोटबंदी की घोषणा के बाद से इस सूचकांक में करीब 6.5 प्रतिशत गिरावट आ चुकी है। 

 
हैतोंग सिक्योरिटीज में बैंकिंग विश्लेषक संतोष सिंह कहते हैं, 'बाजार मानकर चल रहा था कि आरबीआई ब्याज दरों में कटौती करेगा और इसी आस में वह टे्रजरी से अधिक फायदे की उम्मीद कर रहा था। अगर ऐसा होता तो इससे बैंकों को नोटबंदी के बाद हुए नुकसान की भरपाई करने में मदद मिलती। विश्लेषकों को इस मोर्चे पर अपनी धारणा में बदलाव करना होगा।' आरबीआई ने इन्क्रीमेंटल कैश रिजर्व रेशियो (सीआरआर) 10 दिसंबर से वापस लेने की घोषणा जरूर की है, लेकिन इससे फर्क नहीं पडऩे वाला है क्योंकि इसका आभास पहले से ही था। इन्क्रीमेंटल सीआरआर वापस लेने से बैंकिंग क्षेत्र के मार्जिन में 5 से 7 आधार अंक की ही बढ़ोतरी होगी। इस तरह बैंकों के मार्जिन पर इससे कोई खास असर नहीं रखेगा। 
 
यह बात भी ध्यान  रखनी होगी कि बैंकों को उम्मीद के मुताबिक नोटबंदी से लाभ नहीं होगा। ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि बैंक अगले दो से तीन महीनों में बड़े पैमाने पर उधारी दरों में कमी नहीं करेंगे। मोतीलाल ओसवाल सिक्योरिटीज में बैंकिंग विश्लेषक अल्पेश मेहता कहते हैं, 'निकट अवधि में ब्याज दरों में 25 आधार अंक से कम की कटौती हो सकती है। ब्याज दरों में बड़ी कटौती करने से पहले बैंक एक बार हालात की समीक्षा करेंगे। पहली बात तो यह कि ऋण की मांग लगातार कमजोर होती जा रही है और दूसरी बात यह कि नोटबंदी के बाद बैंकों पर अतिरिक्त लागत बढ़ी है।'
 
विश्लेषकों का कहना है कि इसे देखते हुए बैंकों ने जमा दरों में पहले ही कमी कर दी है वहीं दूसरी तरफ दूसरे खर्च बढऩे से बैंकों को ब्याज दरों में अधिक कटौती करने की गुंजाइश नहीं मिलेगी। वास्तव में ज्यादातर लोगों को लग रहा है कि बैंकों की शुल्क आय में कमी आएगी (एटीएम से लेन-देन पर शुल्क पहले ही खत्म किया जा चुका है)। साथ ही ब्याज आय प्रभावित होने के अलावा परिसंपत्ति गुणवत्ता पर भी असर पड़ेगा। नोटबंदी से मांग पर भी विपरीत प्रभावित पड़ सकता है, जिसका सीधा असर कारोबार पर होगा। इससे कर्ज भुगतान क्षमता पर भी आंच आएगी। जब तक आरबीआई फंसे कर्जों के आकलन के नियमों में अस्थायी तौर पर ढील नहीं देता है तब तक परिसंपत्ति गुणवत्ता के मोर्चे पर बैंकों को इस तिमाही दबाव झेलना पड़ेगा।
 
एक दूसरा महत्त्वपूर्ण विषय यह है कि नोटबंदी के बाद बैंकों के पास जितनी रकम आई है (अब तक 11.5 लाख करोड़ रुपये)उसका कितना हिस्सा उनके पास रह पाएगा। ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि निकासी सीमा में ढील देने के बाद बैंकों के पास बढ़ी हुई जमा राशियों में बहुत अधिक नहीं बचेगी। सिंह कहते हैं, 'अगर इस रकम का केवल 10-20 प्रतिशत हिस्सा ही बैंकों के पास रहता है तो पूरी बैंकिंग प्रणाली की तुलना में यह रकम मामूली मानी जाएगी। यानी नोटबंदी के बाद बैंकों के पास आई अतिरिक्त नकदी का ब्याज दरों पर न के बराबर असर होगा।' मेहता का मानना है कि नोटबंदी और डिजिटलीकरण से बैंकों के चालू एवं बचत खातों में 1 से 3 लाख करोड़ रुपये की रकम बढ़ सकती है। कुल मिलाकर निकट अवधि में बैंकों का वित्तीय प्रदर्शन और इनके शेयरों पर प्रतिफल कमजोर रह सकता है क्योंकि नोटबंदी के बुरे असर और धीमी आर्थिक बढ़ोतरी से बैंकों के प्रदर्शन पर मार पड़ेगी। 
 
रिजर्व बैंक ने बुधवार को मौद्रिक नीति समीक्षा में वित्त वर्ष 2017 के लिए  सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का अनुमान 7.6 प्रतिशत से कम कर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। केंद्रीय बैंक ने यह भी कहा कि कुछ खाद्य वस्तुओं की ऊंची कीमतें और वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई का स्तर भी बढ़ सकता है। हालांकि दीर्घ अवधि के लिए दांव खेलने वाले निवेशक शेयर बाजार में आई सार्थक गिरावट के दौरान अच्छे शेयरों में रकम लगा सकते हैं। विश्लेषकों की राय में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के अलावा निजी क्षेत्र के बैंकों पर भी दांव खेला जा सकता है। 
Keyword: share, market, sensex, banking,,
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