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जिनको नहीं नकदी का संकट उनमें दांव लगाना श्रेयस्कर
शीतल अग्रवाल /  December 04, 2016

अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप की चुनावी जीत और भारत में नोटबंदी की दोहरी अनिश्चितता ने भारतीय इक्विटी बाजारों पर असर डाला है। इन घटनाक्रम को लगभग दो सप्ताह से अधिक का समय हो चुका है, लेकिन इक्विटी बाजार गिरावट के रुझान के साथ लगातार अस्थिर बने हुए हैं। हालांकि जब तक इससे संबंध समस्याओं में कमी नहीं आएगी, स्थिति स्पष्टï नहीं होगी। ऐसे में ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि कॉरपोरेट जगत का प्रदर्शन चालू और अगली तिमाही में भी दबाव से जूझ सकता है। इन उम्मीदों और आय अनुमानों में कमी के परिणामस्वरूप विश्लेषकों का मानना है कि बाजार में इन सब का नकारात्मक असर दिखना शुरू हो गया है। साथ ही यह उन कंपनियों के शेयरों को खरीदने के लिए अच्छा समय साबित हो सकता है जो अस्थायी तौर पर तो कुछ समस्या देख सकती हैं, लेकिन उनका व्यवसाय काफी हद तक मजबूत बना हुआ है। मॉर्गन स्टैनली इंडिया के प्रबंध निदेशक रिधम देसाई का मानना है कि दीर्घावधि निवेशकों को मौजूदा गिरावट का इस्तेमाल अच्छी गुणवत्ता वाले शेयरों को खरीदने के लिए करना चाहिए।
घरेलू ब्रोकरेज फर्म शेयरखान का भी यही मानना है। शेयरखान की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है, 'ताजा गिरावट से वित्त वर्ष २०१७ में आय में कमी और वित्त वर्ष २०१८ के आय अनुमानों पर आंशिक असर का संकेत मिल चुका है। हालांकि अगले कुछ महीनों में अस्थिरता बनी रह सकती है और इस अस्थिरता ने निवेशकों को अच्छी गुणवत्ता वाले शेयरों को उचित कीमतों पर खरीदने का अवसर प्रदान किया है।'
८ नवंबर के बाद (नोटबंदी और अमेरिकी चुनाव का परिणाम घोषित होने) से मजबूत आरओई अनुपात के साथ साथ दीर्घावधि आय संभावना वाली कई कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई है। पूंजी पर प्रतिफल (आरओई) यह संकेत देता है कि कोई कंपनी व्यवसाय में लगाए गए शेयरधारकों के कोष से कितना मुनाफा हासिल करती है। बीएसई-५०० शेयरों के एक विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि २० शेयरों का आरओई इस वित्त वर्ष में १८ फीसदी से अधिक रहने का अनुमान है, लेकिन उनमें भी पिछले दो सप्ताह में १५ फीसदी या इससे अधिक की गिरावट आई है। इन शेयरों में आयशर मोटर्स, पेज इंडस्ट्रीज, अशोक लीलैंड, बजाज फाइनैंस, भारत फाइनैंशियल इनक्लूजन (पूर्व में एसकेएस माइक्रोफाइनैंस), बर्जर पेंट्ïस, टाइटन, आईआईएफएल होल्डिंग्स, वी-गार्ड, मणप्पुरम फाइनैंस मुख्य रूप से शामिल हैं। ब्लूमबर्ग के अनुमानों के अनुसार इनमें से ज्यादातर कंपनियां अपनी आय में कम से कम १६ प्रतिशत तक की वृद्घि दर्ज कर सकती हैं। हालांकि भविष्य के अनुमान उन घटनाक्रम के आधार पर अलग अलग हो सकते हैं, जो भविष्य में देखे जा सकते हैं, लेकिन कंपनियों का पिछला शानदार रिकॉर्ड, बिजनेस मॉडल, कॉरपोरेट शासन प्रणालियां और प्रबंधन कुछ ऐसे कारक हैं जिन पर निवेशक विचार कर सकते हैं। इनमें से कई कंपनियां इन मानकों पर मजबूती के साथ सामने आ सकती हैं।
इनमें से ज्यादातर शेयर कंज्यूमर ड्ïयूरेबल्स (खासकर टाइल्स, सिरैमिक, सैनिटरीवेयर, पेंट्ïस जैसे बिल्डिंग मैटेरियल), ऑटोमोबाइल, एफएमसीजी और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) जैसे क्षेत्रों के हैं। ये क्षेत्र अल्पावधि में धीमी खपत मांग दर्ज करेंगे, लेकिन धीरे धीरे इनमें सुधार आएगा क्योंकि इनका दीर्घावधि विकास परिदृश्य मजबूत बना हुआ है।
बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के विश्लेषक वीकेश गांधी ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में लिखा है, 'हमारा मानना है कि एनबीएफसी और आवास वित्त कंपनियों में कोई भी भारी गिरावट खरीदारी का मौका है क्योंकि इस सेक्टर में बड़ी और मजबूत कंपनियां नुकसान की भरपाई की बेहतर क्षमता (फंसे कर्ज के लिए प्रावधान कवरेज) से
संपन्न हैं।'
टाइटन जैसी ज्वैलरी कंपनियों को नोटबंदी से दीर्घावधि में दबाव का सामना करना पड़ सकता है और मौजूदा शादियों के सीजन से भी कुछ तेजी की उम्मीद लगाए बैठी इन कंपनियों को अब तक अपेक्षित राहत नहीं मिल पा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि असंगठित क्षेत्र से संगठित क्षेत्र की तरफ केंद्रित होने की रफ्तार हालांकि मध्यावधि में तेज हो सकती है और यह सकारात्मक बदलाव है। कुल मिलाकर, अल्पावधि में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, लेकिन निवेशक मौजूदा स्तरों पर अच्छी गुणवत्ता वाले शेयरों को खरीदना शुरू कर सकते हैं।

Keyword: demonetization, Currency, shares,
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