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'जीडीपी पर दबाव को लेकर सोच गलत'
नीरज भट्ट और नूपुर आनंद /  11 30, 2016

एचडीएफसी बैंक के प्रबंध निदेशक आदित्य पुरी का कहना है कि सरकार द्वारा 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बंद किए जाने की पहल दीर्घावधि में अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक होगी। इस मुद्दे पर उन्होंने नीरज भट्ट और नूपुर आनंद के साथ विस्तार से बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश:

नोटबंदी पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
मास्टरकार्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में भारत नकदी की सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाला देश है। सभी देशों कुछ हद तक नकदी आधारित अर्थव्यवस्था वाले हैं, लेकिन नकदी की इतना ज्यादा इस्तेमाल किसी के भी हित में नहीं है। आपके द्वारा अधिक नकद लेनदेन किए जाने से नकदी के अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में पहुंचने की आशंका अधिक रहती है। इसके अलावा नकदी की लागत भी अधिक है। नोटबंदी को एक घटनाक्रम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे अर्थव्यवस्था को बेहद पारदर्शी बनाने की दिशा में विभिन्न घटनाक्रम की श्रृंखला के तौर पर देखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, स्वैच्छिक घोषणा योजना, डिजिटल भुगतान पर व्यापक जोर दिए जाने, बेनामी लेनदेन बिल आदि से सरकार को मदद मिली है। सरकारी सख्ती से लोगों को सही दिशा में आगे बढऩे की भी प्रेरणा मिली है। इसलिए, काले धन से जुड़ा हर व्यक्ति डरा हुआ है और मैं इसे लेकर बेहद खुश हूं। जो बचत बैंकिंग सिस्टम से बाहर थीं और जिनका इस्तेमाल उत्पादकता के तौर पर नहीं हो रहा था, वे अब निवेश या वृद्घि के लिए वापस बैंकों में आ रही हैं। विभिन्न अनुमानों में काले धन की मात्रा 1.5-3 लाख करोड़ रुपये पर आंकी गई है।

क्या इससे बैंकों को समस्या नहीं हुई है, खासकर सीआरआर बढ़ाकर 100% किए जाने से?
इससे लगभग 8 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में आए हैं। यदि रकम का इस तरह का प्रवाह सिस्टम में बना रहता है तो इससे आरबीआई द्वारा 100 फीसदी सीआरआर जैसे अन्य कदमों को मजबूती मिलेगी। जब आपके पास अतिरिक्त नकदी हो तो इससे मनी मार्केट दरें, बॉन्ड दरें प्रभावित होती हैं और विदेशी मुद्रा बाजार में अनावश्यक अस्थिरता पैदा होती है। एक बार जब बाजार में पूरी तरह बदलाव आ जाएगा, आरबीआई सीआरआर में नरमी लाएगा। राजकोषीय स्थिति में सुधार आएगा, क्योंकि बड़ी तादाद में लोग इसमें भागीदार होंगे।

क्या नोटबंदी की प्रक्रिया का सही से क्रियान्वयन हुआ है?
मुझमें यह कहने की हिम्मत नहीं है कि इसमें कोई खामी नहीं है, लेकिन स्पष्टï रूप से में इसके लिए दो तरह से विचार करने की जरूरत होगी- परिवर्तन काल और दीर्घावधि। परिवर्तन काल 50 दिन है जिसमें मुद्रा बाहर निकाली जा रही है और फिर नए नोटों के तौर पर वापस दी जा रही है। आरबीआई पूरी क्षमता के साथ नए नोट छाप रहा है। जब पुरानी मुद्रा समाप्त हो जाएगी तो स्थिति सामान्य हो जाएगी। लोग शोर अधिक मचा रहे हैं और हालात सामान्य बनाने में मदद नहीं कर रहे हैं, लेकिन खराब समय बीत चुका है।

अर्थशास्त्री यह कैसे जानते हैं कि जीडीपी में गिरावट आएगी? 
ऋण वृद्घि फिलहाल 10 फीसदी के आसपास है और यदि आप इसमें म्युचुअल फंडों और बीमा कंपनियों को भी शामिल करते हैं तो यह 12-14 फीसदी के आसपास है। क्या कोई मुझे यह बता सकता है कि वह कैसे यह सोचता है कि यह 14 फीसदी से घटकर 6 फीसदी रह जाएगी।

Keyword: demonetization, Currency, HDFC, Bank,
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