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बैंकों और एनबीएफसी के लिए कमजोर रहेगी तीसरी तिमाही
हंसिनी कार्तिक /  November 20, 2016

समस्याओं से धीरे-धीरे उबर रहे निजी और सरकारी बैंकों के लिए नोटबंदी परेशानी का सबब बन सकता है। दोनों क्षेत्रों के बैंकों के लिए हालात बेहतर हुए थे और उनकी आय की स्थिति सुधर रही थी लेकिन अचानक 500 और 1000 रुपये के नोट बाजार से वापस लिए जाने के बाद इनकी स्थिति फिर बिगड़ सकती है। प्रभुदास लीलाधर में हेड ऑफ रिसर्च आर श्रीशंकर का कहना है कि दिसंबर तिमाही बैंकों के लिए नागवार गुजरी तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वह कहते हैं, 'बैंकों और यहां तक कि एनबीएफसी का कारोबार नवंबर में बाधित रह सकता है और दिसंबर में ही जाकर हालात सामान्य हो सकते हैं।'
पहले कहा जा रहा था कि नोट बदले जाने की पहल का सबसे बड़ा लाभ बैंकों को होगा लेकिन अब ऐसा नहीं दिख रहा है। ऐंजल ब्रोकिंग में हेड ऑफ रिसर्च वैभव अग्रवाल कहते हैं कि बैंकों के पास जमा रकम बढ़ सकती है, लेकिन तीसरी तिमाही में ऋण आवंटन कमजोर रह सकता है। ऋण आवंटन कम होना बैंकों पर कई तरह के असर डाल सकता है। इसकी पहली वजह यह है कि दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों में नकद लेन-देन प्रभावित हो सकता है, जिसका असर मासिक किस्तों के भुगतान पर भी पड़ेगा। इसके अलावा अगर तीसरी तिमाही में ऋण आवंटन लक्ष्य से कम रहा तो शुद्ध ब्याज आय भी कम रह सकती है। नतीजा यह होगा कि ऊं ची कॉस्ट-टू-इनकम अनुपात से बैंक और एनबीएफसी के शुद्ध ब्याज मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
 निकट अवधि से मध्यम अवधि तक संकट ऐसे ही जारी रहा तो वित्तीय प्रणाली पर और अधिक असर पड़ सकता है। जेफरीज के विश्लेषकों का कहना है कि मध्यम अवधि में बैंक एवं एनबीएफसी को खुदरा उपभोग में आई मंदी से निपटना होगा जबकि नकदी कारोबार श्रृंखला में ठहराव से एसएमई पर दबाव बढ़ सकता है। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के विश्लेषकों का कहना है कि बैंक और एनबीएफसी खपत के साथ-साथ चलते हैं और नकदी में लेन-देन नहीं होने से वस्तु एवं सेवा की वितरण श्रृंखला में ठहराव आ सकता है।
दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि ज्यादातर बैंकों ने अपने ग्राहकों को डेबिट एवं क्रेडिट कार्ड दे रखे हैं ऐसे में महानगरों और बड़े शहरां में नोटबंदी का असर कम हो सकता है। हालांकि अब देखने वाली बात होगी कि व्यक्तिगत ऋणों में तेजी और क्रेडिट कार्ड से ऋण की कमजोर मांग की भरपाई हो पाती है या नहीं। बैंकों के खुदरा ऋणों में आवास ऋण की हिस्सेदरारी 35-40 प्रतिशत होती है। पुराने नोट बंद होने से इस खंड पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है। जेफरीज की एक रिपोर्ट में कहा गया है, 'ज्यादातर एनबीएफसी और आवास वित्त कंपनियों ने पिछले कुछ वर्षों में एसएमई और लोन अगेंस्ट प्रॉपर्टी (एलएपी) खंड को काफी ऋण आवंटित किए हैं। एलएपी और एसएमई खंडों में लेन-देन और आय सृजन का एक बड़ा हिस्सा नकदी आधारित है।' मोतीलाल आसेवाल सिक्योरिटीज के विश्लेषकों का भी ऐसा ही मानना है। उन्हें लगता है कि वाहन के लिए वित्त प्रदान करने वाले भी प्रभावित हो सकते है। इनका मानना है कि इन सभी कारकों से निकट अवधि में ऋण आवंटन धीमा पड़ सकता है, जिससे परिसंपत्ति गुणवत्ता मौजूदा स्तर से नीचे आ जाएगी।
हालांकि लगभग सभी लोगों का मानना है कि मौजूदा संकट अस्थायी है। अग्रवाल कहते हैं, 'कुछ इस तरह की धारणा है कि दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले बैंक बेहतर स्थिति में हैं और मध्यम से दीर्घ अवधि में वे मजबूत बनकर उभर सकते हैं।' इस समय एनबीएफसी से निकलकर बैंक शेयरों पर दांव खेलना अधिक फायदेमंद हो सकता है। एक विदेशी ब्रोकरेज कंपनी के एक विश्लेषक ने कहा, 'पिछले दो दिनों में एनबीएफसी शेयरों में गिरावट जरूर आई है लेकिन मैं अब भी इनमें निवेश नहीं करूंगा जब तक कि तीसरी तिमाही में उनके कारोबार की तस्वीर स्पष्टï नहीं हो जाती है।'

Keyword: demonetization, Banks, Result,
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