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बैंक जमाओं में तेज बढ़ोतरी होने की उम्मीद
पुनीत वाधवा / नई दिल्ली November 09, 2016

सरकार ने कालेधन पर अंकुश लगाने के लिए 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को चलन से अचानक बाहर करने का फैसला लिया है। मंगलवार आधी रात से यह फैसला अमल में आने से ये बड़े नोट लेनदेन के अयोग्य हो गए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च 2016 को बाजार में चलन में मौजूद कुल नोटों के मूल्य में 86.4 फीसदी हिस्सा 500 और 1000 रुपये के नोटों का ही था। अगर मूल्य के हिसाब से देखें तो यह आंकड़ा 14 लाख करोड़ रुपये था। सिटीग्रुप का कहना है कि केवल 5 साल में ही 500 रुपये के नोट के चलन में 76 फीसदी और 1000 रुपये के नोट के चलन में 109 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी जबकि इस दौरान कुल नोटों का चलन 40 फीसदी ही बढ़ा था। सरकार के इस कदम को लेकर प्रमुख ब्रोकरेज फर्म और शोध संगठनों की राय बंटी हुई है। आइए कुछ संगठनों की राय पर डालते हैं एक नजर:
 
नोमुरा
 
लोगों को कुछ समय के लिए इस कदम से दिक्कत हो सकती है लेकिन कालेधन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। पुराने नोटों के बैंकों में जमा होने की बाध्यता के चलते बैंक जमाओं में भी खासी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। इससे मुद्रा के चलन में भी सुधार देखने को मिलेगा जो बैंकिंग क्षेत्र की तरलता के लिहाज से काफी सकारात्मक होगा। इतना ही नहीं, लोगों के पास रखे धन के बैंकिंग व्यवस्था में आने से सरकार को कर लगाने के बारे में भी सहूलियत होगी जिससे सरकारी कोष में भी बढ़ोतरी होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग पुराने नोटों को जमा करने के लिए नए खाते खुलवाएंगे जिससे वित्तीय समावेशन के लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिलेगी। रियल एस्टेट की लेनदेन में बड़े पैमाने पर होने वाले कालेधन के इस्तेमाल को भी रोकने में इससे मदद मिलेगी। वैसे इसके चलते रियल एस्टेट कारोबार पर उल्टा असर पड़ सकता है। दिल्ली और मुंर्ब जैसे शहरों में खरीदार न होने से रियल एस्टेट की हालत पहले से ही खराब चल रही है। कालेधन के चलते महंगाई दर अधिक होने की अवधारणा को देखते हुए हमारा मानना है कि नए नोट आने के बाद महंगाई पर काबू पाने में भी सरकार को थोड़ी सहूलियत मिलेगी। वैसे इतना जरूर है कि तात्कालिक तौर पर सरकार का यह कदम उपभोक्ता मांग में गिरावट लाने का कारण बन सकता है। 
 
सिटीग्रुप
 
अगर पुराने नोट रखने वाले लोगों में से एक अच्छी-खासी संख्या उसे बैंक में जमा करने का फैसला करती है तो उससे बैंकों की जमाओं में तत्काल बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। वैसे अगर बैंकों की तरफ से जमा या नोट बदलने के लिए लाई जाने वाली नकदी को लेकर ज्यादा पूछताछ की जाती है तो तात्कालिक तौर पर प्रचलन में मौजूद मुद्रा में कमी भी आ सकती है। उस स्थिति में मूल राशि में कमी आ जाएगी लेकिन लोगों के भीतर जमा की प्रवृत्ति बढऩे से आखिर में मुद्रा आपूर्ति पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। अगर सरकार के इन फैसलों से अस्थायी तौर पर मुद्रा आपूर्ति में कमी आती है तो आगे चलकर अवस्फीति या वास्तविक मांग में कमी आने की भी स्थिति बन सकती है। जहां तक अर्थïव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर इसके असर का सवाल है तो कुछ क्षेत्रों में यह मांग पैदा कर सकता है तो कुछ अन्य क्षेत्रों में इसका विपरीत असर भी देखने को मिल सकता है। यह अर्थव्यवस्था के लिए सीमित अवधि का जोखिम भी साबित हो सकता है। 
 
मेरिल लिंच ग्लोबल रिसर्च
 
हमारा अनुमान है कि पुराने नोटों का चलन बंद होने और उनके बैंकिंग सिस्टम में आने से विकास दर में 1-2 फीसदी बढ़ोतरी हो सकती है। हमें इसका तिरफा असर होने की संभावना दिख रही है। पहला, इससे ब्याज दरों में कमी आ सकती है। अगर 100 रुपये की नकदी को जमा किया जाता है तो उसमें से 45 रुपये का तो कराधान ही लग जाएगा जिसके चलते मुद्रास्फीति में कमी आ सकती है। इसका नतीजा सितंबर 2017 तक ब्याज दरों में 75 आधार अंकों की कटौती के रूप में देखने को मिल सकता है। वैसे हमारा मानना है कि 30 दिसंबर तक बैंकों में जमा होने वाली राशि को लेकर स्थिति साफ हो जाने पर ही रिजर्व बैंक मुक्त बाजार परिचालन पर ध्यान केंद्रित करेगा। दूसरा, धन पर पडऩे वाले विपरीत असर से कुछ समय के लिए बड़ी नकदी की मांग में कमी भी आ सकती है। इसी के साथ ब्याज दरों के कम होने से थोड़ी राहत भी मिलेगी। तीसरा, अगर सोने के आयात में कमी आती है तो रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा के भंडार को नए सिरे से समायोजित कर सकता है। 
 
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज
 
हमारा मानना है कि 500 और 1000 रुपये के नोटों को चलन से हटाकर उनकी जगह नए नोट लाना मध्यम अवधि में अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक कदम साबित होगा। यह कदम कालेधन के उन्मूलन के लिए की जा रही सरकारी पहल का निर्णायक अंग हो सकता है। 
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