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वसूली पर बैंकर करेंगे सख्ती
बीएस संवाददाता /  10 27, 2016

बिज़नेस स्टैंडर्ड बैंकिंग राउंड टेबल में देश के शीर्ष बैंकर कर्ज वसूली पर सख्ती को लेकर हुए एकमत

मुंबई में गुरुवार को आयोजित बिज़नेस स्टैंडर्ड बैंकिंग राउंड टेबल 2016 सम्मेलन में (बाएं से) सिटीबैंक के सीईओ प्रमीत जवेरी, आईसीआईसीआई बैंक की एमडी एवं सीईओ चंदा कोछड़, ऐक्सिस बैंक की सीईओ शिखा शर्मा, एचडीएफसी बैंक के एमडी आदित्य पुरी, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के सीएमडी अरुण तिवारी और आईडीएफसी बैंक के एमडी एवं सीईओ राजीव लाल।


भीमकाय कर्जों में अपनी मुश्किलों को महसूस करने में दो सालों की कड़ी मशक्कत करने के बाद बैंक अब इनका समाधान तलाशने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। हालांकि कर्जों की वसूली के मामले में वे मौजूदा तौर तरीकों को ही बेहतर बनाकर अपने मकसद में सफल होने की उम्मीद कर रहे हैं। गुरुवार को मुंबई में आयोजित बिज़नेस स्टैंडर्ड वार्षिक बैंकिंग राउंड टेबल सम्मेलन में ऐसे कई विचार सामने आए। बैंकिंग उद्योग के इस मंथन में यह बात भी सामने आई कि वसूली के मामले में किसी ठोस योजना के अभाव में बैंक अपनी कर्जदारी के दायरे को बढ़ाने में एहतियात बरत रहे हैं, जिसमें देश के शीर्ष बैंकर एकमत हैं। 

मुंबई के ताज महल पैलेस होटल में आयोजित इस सम्मेलन में बैंकरों ने कहा कि भले ही समाधान के माध्यम अभी भी एकदम दुरुस्त नहीं हैं लेकिन वे एक बात को लेकर संतुष्ट हैं कि सरकार और नियामक हालात की मुश्किल को समझने में काफी सक्रिय हैं और वे ऐसे परिवर्तन कर रहे हैं, जिनसे कर्ज वसूली हालात पर बेहतर नियंत्रण हो सकता है। इस कार्यक्रम में एचडीएफसी बैंक के प्रबंध निदेशक आदित्य पुरी, आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी चंदा कोछड़, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) अरुण तिवारी, ऐक्सिस बैंक की प्रबंध निदेशक एवं सीईओ शिखा शर्मा, सिटी इंडिया के सीईओ प्रमीत जवेरी और आईडीएफसी बैंक के प्रबंध निदेशक एवं सीईओ राजीव लाल ने शिरकत की।

इसमें बैंकरों ने कर्जदारों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे अपना पैसा वसूलने के लिए कड़े कदम उठाने से नहीं हिचकेंगे। पुरी ने कहा, 'सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और बैंकों से मिला संदेश स्पष्टï है कि हम यहां खैरात बांटने के लिए नहीं बैठे हैं। आपने मुझसे पैसा लिया, आप इसे लौटा दें। जब जहाज डूबता है तो बहुत सारे समाधान तलाशने होते हैं और यह काम बहुत तेजी से करना पड़ता है और फिर इस बात का ख्याल नहीं रखा जाता कि कौन हमारे पैसे पर ऐश कर रहा है।' हालांकि अभी भी भारी-भरकम कर्जों के लिए मांग कम नहीं हुई है लेकिन बैंक अपने खजाने का मुंह खोलने से हिचक रहे हैं। 

कुछ दिन पहले अवसंरचना वित्तीयन क्षेत्र से जुड़ी कंपनी से बैंक बने आईडीएफसी बैंक के दीपक लाल ने कहा, 'कोई बैंक बुनियादी ढांचा क्षेत्र की नई परियोजना को आने वाले कुछ समय में बड़े पैमाने पर कर्ज देने नहीं जा रहा और सरकार को भी यह समझना होगा कि जब तक विवाद समाधान का कोई ढांचा और अनुबंध से जुड़ी कमजोरियां दूर नहीं होतीं, तब तक देश में इन परियोजनाओं के लिए उपलब्ध वित्त आवंटित नहीं हो पाएगा।' सभी बैंकरों ने देश के सबसे नए नवेले बैंक के प्रमुख लाल के सुर से सुर मिलाया। 

ऐक्सिस बैंक की शिखा शर्मा ने कहा, 'नए परिदृश्य में मुझे केवल सख्त अनुबंध वाली परियोजनाओं के लिए ही वित्त की व्यवस्था होती नजर आ रही है।' उन्होंने आगे कहा, 'बैंकों को तो भूल ही जाइए, यहां तक कि प्रवर्तक भी इसे नए नजरिये से देख रहे हैं क्योंकि अगर बैंकों को मुश्किल झेलनी पड़ी तो नई परियोजनाओं के कारण प्रवर्तक भी खासे परेशान रहे हैं। इन मामलों में वे संभवत: कुछ इक्विटी वैल्यू के बारे में सोच रहे होंगे और इक्विटी वैल्यू में खासी कमी देखी गई है।'

सिटी बैंक के जवेरी के अनुसार, 'ऐसा कोई कर्ज नहीं दिया जाएगा, जिसमें ब्याज के जरिये कमाई और उसकी वसूली की गुंजाइश न हो लेकिन बैंक जोखिम में पड़ी बड़ी रकम का बोझ उठा रहे हैं।' हालांकि बैंकरों का मानना है कि वृद्घि का अगला पड़ाव सरकारी खर्च के द्वितीयक प्रभाव के मार्फत आना चाहिए। इस बात पर भी बैंकरों में सर्वानुमति रही कि कर्ज वसूली के मामले में बैंकों ने ऊंची छलांग लगाई है। शर्मा ने कहा, 'वित्तीय क्षेत्र के इतिहास को देखें तो पिछले डेढ़-दो वर्षों में हमने प्रबंधन में काफी बदलाव देखे हैं। तंत्र के जरिये समाधान हासिल करने में कुछ समय लग रहा है लेकिन ऐसा हो रहा है।' 

वसूली में दिखाया दम

शर्मा की बात से सहमति जताते हुए कोछड़ ने कहा, 'एक उद्योग के तौर पर हमें समाधान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। बैंकों खुद वसूली को लेकर सतर्क रहें और इसे केंद्रित रूप से करना चाहिए। प्रवर्तक भी इस बात को समझ रहे हैं कि कर्ज से पीछा छुड़ाने के लिए उन्हें संपत्तियां बेचनी होंगी।' उन्होंने कहा कि हाल के दौर में दिवालिया संहिता और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पुनर्गठन प्रावधानों के जरिये नियामक और सरकार की जुगलबंदी से समाधान निकालने की दिशा में कुछ सार्थक पहल हुई हैं। 

कोछड़ ने कहा कि वसूली तंत्र का लाभ उठाते हुए बैंकों ने अपने कारोबारी ग्राहकों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से ऐसी संपत्तियां बेचने के लिए मजबूर किया, जो उनके लिए रणनीतिक रूप से अहम नहीं थीं। कोछड़ ने कहा, 'पिछले दो वर्षों में हमने 1.5 लाख करोड़ रुपये की संपत्तियों की बिक्री देखी, जो कारोबारी इतिहास में सर्वकालिक ऊंचा आंकड़ा है।' बैंकरों ने कहा कि इन मामलोंं  से जुड़े सौदों पर दो वर्षों की लंबी मशक्कत के बाद ही यह बिक्री संभव हो पाई क्योंकि नतीजे हासिल करने के लिए धीरज रखने की दरकार थी। 

हालांकि समाधान या निपटान के लिए तौर तरीकों को और बेहतर बनाने की जरूरत है। इस संदर्भ में बैंक ऑफ इंडिया के सीएमडी अरुण तिवारी ने कहा है कि मिसाल के तौर पर दबाव वाली परिसंपत्तियों के सतत पुनर्गठन की योजना (एस 4 ए) की शुरुआत तो बढिय़ा रही लेकिन यह कारगर साबित नहीं हो पाई। उन्होंने कहा, 'कागजों पर एस 4 ए योजना बढिय़ा नजर आ रही थी लेकिन यह कारगर नहीं रही और हमारी ओर से आरबीआई को सभी सुझाव देने के बाद हमें लगता है कि इस योजना का नया स्वरूप काफी कारगर साबित होगा।' एस 4 ए योजना के तहत बैंक अपने कर्ज को इक्विटी यानी शेयरों में तब्दील कर सकते हैं और कंपनी का नियंत्रण कर प्रबंधन में बदलाव को अंजाम दे सकते हैं। 
Keyword: bank, loan, debt, NPA,,
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