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बाजार में दम तो आईपीओ में जोखिम!
जयदीप घोष और तिनेश भसीन /  October 09, 2016

आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के निवेशक इन आंकड़ों को देखने के बाद अपनी रणनीति पर फिर से विचार करेंगे। वर्ष 2005 से जनवरी 2008 के दौरान बंबई स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक- सेंसेक्स 6,000 अंकों से बढ़कर 21,000 अंकों पर पहुंच गया था और इस दौरान बाजार में 224 आईपीओ आए थे। इन आईपीओ को आए करीब एक दशक बीत चुका है, लेकिन इनमें से 133 या करीब 60 फीसदी अपनी निर्गम कीमत से नीचे कारोबार कर रहे हैं। केवल 68 शेयरों की कीमतें दोगुनी हुई हैं और उन्होंने निवेशकों को अच्छा प्रतिफल दिया है। लेकिन 65 शेयर यानी करीब 30 फीसदी ऐसे हैं, जो 80 फीसदी या ज्यादा नीचे हैं। इनमें एबीजी शिपयार्ड, जीएमआर इन्फ्रास्ट्रक्चर, पुंज लॉयड, सुजलॉन एनर्जी, लैंको इन्फ्राटेक आदि शामिल हैं। कुछ शेयर तो ऐसे भी हैं, जिनमें कारोबार ही नहीं हो रहा है। जाहिर है कि आईपीओ निवेशक हमेशा फायदे में नहीं रहते।

 
क्वांटम एडवाइजर्स के प्रबंध निदेशक और मुख्य निवेश अधिकारी (सीआईओ) आई वी सुब्रमण्यम कहते हैं, 'जब बाजार में तेजी होती है तो निवेशक ज्यादा जोखिम लेते हैं। मर्चेन्ट बैंकर इस सकारात्मक रुझान का इस्तेमाल कंपनियों को धन जुटाने में मदद यानी आईपीओ की कीमत अधिक तय करने में करते हैं।' चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही के दौरान कंपनियों ने आईपीओ के जरिये 17,283 करोड़ रुपये जुटाए हैं। यह पिछले 9 साल में इस अवधि में जुटाई गई सबसे अधिक राशि है। आगे भी काफी बड़ी संख्या में आईपीओ आने वाले हैं। 16 कंपनियों ने 5,745 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बनाई है और पांच अन्य कंपनियां 6,810 करोड़ रुपये जुटाने के लिए नियामक की मंजूरी का इंतजार कर रही हैं। लेकिन अब आईपीओ निवेशकों को सतर्क हो जाना चाहिए। बाजार की वर्तमान स्थितियों को देखते हुए मूल्यांकन ऊंचा रहने की संभावना है, जिससे खुदरा निवेशकों के पास मुनाफा कमाने का ज्यादा मौका नहीं होगा। लेकिन इसमें कुछ जानकारियां मददगार साबित हो सकती हैं। 
 
आईपीओ में है जोखिम 
 
आस्क इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के कारोबार प्रमुख और मुख्य निवेश अधिकारी (सीआईओ) प्रतीक अग्रवाल के मुताबिक पहले से सूचीबद्ध कंपनी के मुकाबले में निवेश का फैसला लेने से ज्यादा आईपीओ लाने जा रही कंपनियों का मूल्यांकन करना मुश्किल होता है। हालांकि कंपनियों के बारे में जानकारी रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्ट्स में दी जाती है, लेकिन उनके शेयर की असली कीमत निर्धारित करना मुश्किल है। एक सूचीबद्ध कंपनी पहले ही कीमत निर्धारण की प्रक्रिया से गुजर चुकी होती है और विश्लेषक इसका अच्छा विश्लेषण कर चुके होते हैं और कंपनी के बारे में बहुत सी जानकारियां पहले ही सार्वजनिक होती हैं। कंपनी के प्रबंधन ने मुश्किल कारोबारी दौर से किस तरह कंपनी को बाहर निकाला, इसके आधार पर उसके प्रबंधन के बारे में फैसला लेना भी आसान होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि अपने शेयरों की पेशकश करने वाली कंपनियों का उन शेयरों जितना सूचीबद्ध कारोबार नहीं होता है। इससे निवेश के लिए फैसला लेना मुश्किल हो जाता है। 
 
वर्ष 2005 से 2008 के दौरान रियल एस्टेट कंपनियां पहली बार धन जुटाने के लिए आई थीं। निवेशकों का पैसा डुबाने वाली कंपनियों में इस क्षेत्र की कंपनियां सबसे अधिक हैं। उदाहरण के लिए पाश्र्वनाथ का शेयर अपनी निर्गम कीमत से 91 फीसदी कारोबार कर रहा है और देश की सबसे बड़ी रियल्टी कंपनी डीएलएफ का शेयर 70 फीसदी नीचे है। यही वजह है कि निवेशकों को उसी कारोबार में पैसा लगाना चाहिए, जिसे वे समझते हों। यही नियम बीमा कंपनियों पर भी लागू होता है, जो इस समय बाजार में आकर्षक का केंद्र बनी हुई हैं। इस क्षेत्र के बहुत से आईपीओ जल्द ही बाजार में आने के आसार हैं। 
 
लाभ नहीं सुनिश्चित 
 
आईपीओ बाजार में कई चुनौतियां हैं। अगर आप सूचीबद्धता वाले दिन या अगले कुछ दिनों में शेयर बेचकर मुनाफा कमाने की सोच रहे हैं तो इस बात की संभावना है कि आप चोट भी खा सकते हैं। ऐसा ही पिछले गुरुवार को सूचीबद्ध हुए आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ के आईपीओ में हुआ। उस दिन भारत के पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करने से सेंसेक्स करीब 500 अंक गिरा था। इससे इस बीमा कंपनी का शेयर सूचीबद्धता वाले दिन 10.17 फीसदी गिरा। जिन निवेशकों ने निवेश करने और तुरंत मुनाफा कमाने के लिए पैसा उधार लिया था, वे अब फंस गए हैं। और भी चिंताजनक पहलू यह है कि अगर यह तनाव और बढ़ा तो शेयर और ज्यादा गिर सकता है। ऐसे घटना आधारित जोखिम सबसे अच्छी कंपनी के शेयरों की कीमत को भी अल्पावधि में प्रभावित कर सकते हैं। 
 
सूचीबद्धता पर मुनाफा कमाने के लिए निवेश की रणनीति कुछ के लिए कारगर साबित हो सकती है, लेकिन निवेशकों को इसके लिए अच्छी कंपनियों का चुनाव करना चाहिए। उन्हें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह दांव हमेशा सफल नहीं रहता है। अगर कोई व्यक्ति पांच निर्गमों में निवेश करता है तो हो सकता है कि दो आईपीओ सूचीबद्धता वाले दिन मुनाफा दें। लेकिन तीन नहीं देंगे। कंपनी के वित्तीय आकंड़ों के आधार पर मूल्यांकन के अलावा आईपीओ लाने की वजह पर भी विचार किया जाना चाहिए। क्या कंपनी ऋण घटाने, कारोबार का विस्तार करने या क्षमता बढ़ाने, अधिग्रहण करने या महज वर्तमान निवेशकों की निकासी के लिए ही धन जुटा रही है? 
 
ऐसा नहीं है कि इन कारकों में से एक को अन्य से ज्यादा सकारात्मक रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन अगर कोई कंपनी अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए धन जुटा रही है तो ऐसा करने की उसकी क्षमता को भी देखा जाना चाहिए। वर्ष 2005 से 2008 तक की तेजी के दौर में एक कंपनी ऊंची कीमत का आईपीओ लाई थी, जो कई गुना सब्सक्राइब हुआ। इसने बिना किसी परियोजना के विस्तार के लिए धन जुटा लिया। नतीजा यह निकला कि सूचीबद्धता के बाद शेयर तेजी से पैंदे में चला गया। 
 
ऐसा नहीं है कि जहां प्रवर्तक अपनी हिस्सेदारी कम कर रहे हैं, उस आईपीओ में कुछ गलत है। लेकिन अगर निर्गम के बाद प्रबंधन में बदलाव होता है तो आपको सतर्क रहना चाहिए। अगर कंपनी आईपीओ से जुटाए गए धन का इस्तेमाल कर्ज घटाने में करना चाहती है तो यह निवेशकों के पक्ष में हो सकता है। अगर शेयरों के मुकाबले कर्ज का अनुपात सुधरता है तो मूल्यांकन में भी सुधार होता है। केवल इस आधार पर आईपीओ में निवेश न करें कि कोई जाना-पहचाना संस्थान एंकर निवेशक के रूप में निवेश कर रहा है। अग्रवाल कहते हैं, 'निवेशकों को उनके (एंकर निवेशकों) निवेश की अवधि और निवेश की वजह का पता नहीं होता है। यही नहीं हर कोई गलती करता है, यहां तक कि जाने-माने संस्थान भी। निवेशक को केवल उनकी राय के आधार पर निवेश नहीं करना चाहिए।'
Keyword: share, market, sensex, IPO,,
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