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म्युचुअल फंडों का नया गान बच्चों के लिए ले आए प्लान
तिनेश भसीन /  October 02, 2016

एक अरसा पहले ही बीमा कंपनियों ने बच्चों से जुड़े प्लान पर दांव लगाना शुरू कर दिया था। अब म्युचुअल फंडों ने भी इस तरह की योजनाओं पर अपना ध्यान लगा दिया है। लोगों के रुझान को भुनाने की उनकी कोशिशें बढ़ती जा रही हैं। लक्ष्य पर आधारित निवेश की मार्केटिंग के बूते अधिक निवेशकों को आकर्षित किया जा सकता है। कम से कम चार चाइल्ड प्लान ऐसे हैं जो मंजूरी के लिए बाजार नियामक सेबी के पास लंबित हैं। इनमें रिलायंस चिल्ड्रन फंड, एसबीआई चिल्ड्रन बेनीफिट फंड, डीएसपी ब्लैकरॉक चिल्ड्रन गिफ्ट फंड और महिंद्रा म्युचुअल फंड की बाल विकास योजना मुख्य रूप से शामिल हैं।
ऐक्सिस म्युचुअल फंड में मुख्य बिजनेस अधिकारी करण दत्ता कहते हैं, 'ज्यादातर लोग निवेश अनिवार्यता वाली ऐसी योजनाओं की पहचान नहीं कर पाते जिनका फंड प्रबंधक वर्गीकरण करते हैं। इसलिए हम निवेशकों की जबान में बात कर रहे हैं और योजनाओं को बैलेंस्ड या हाइब्रिड फंडों के रुप में बेचने के बजाय उनके लक्ष्य के आधार पर नाम दे रहे हैं।'
फंड हाउसों के पास मुख्य रूप से दो श्रेणियों में चाइल्ड प्लान हैं- मासिक आय योजना (एमआईपी) और बैलेंस्ड फंड। एमआईपी में 15 से 25 फीसदी रकम इक्विटी में और शेष निवेश डेट में होता है। बैलेंस्ड फंड श्रेणी में चाइल्ड प्लान इक्विटी-आधारित हैं और ये योजनाएं 65 प्रतिशत निवेश शेयरों में या तो सीधे या फिर वायदा एवं विकल्प के जरिये करती हैं।
इनकी श्रेणी में कुछ योजनाओं का प्रदर्शन श्रेष्ठ रहा है। उदाहरण के लिए एचडीएफसी चिल्ड्रन्स गिफ्ट फंड ने एक साल में 8.89 फीसदी और तीन साल की अवधि में 25.47 फीसदी प्रतिफल दिया है। श्रेणी का औसत प्रतिफल (इक्विटी-आधारित हाइब्रिड फंडों) पिछले साल में 7.29 फीसदी और तीन साल की अवधि में 20.56 फीसदी रहा है।
इसी तरह, एसबीआई मैग्नम चिल्ड्रन्स बेनीफिट प्लान ने पिछले तीन साल में 22.36 फीसदी और एक साल में 18.02 फीसदी का प्रतिफल दिया है। एमआईपी श्रेणी का प्रतिफल एक साल और तीन साल की अवधि के लिए क्रम से 16.67 फीसदी और 8.90 फीसदी रहा। हालांकि किसी निवेशक की पहली प्राथमिकता डेट योजना के साथ इक्विटी डाइवर्सिफाइड फंड के इस्तेमाल की होनी चाहिए। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि ये उन लोगों के लिए अच्छे विकल्प हैं जो किसी बीमा कंपनी के चाइल्ड प्लान के विपरीत अपने बच्चों के लिए बचत करना चाहते हैं। बैलेंस्ड फंड बाजार के हालात के हिसाब से स्वयं ही पोर्टफोलियो को संतुलित करते रहते हैं।
लेकिन निवेशकों को इनमें निवेश से पहले अपने पोर्टफोलियो परिसंपत्ति आवंटन को ध्यान में रखना चाहिए। अगर आप लंबी अवधि (सात-आठ वर्ष) के लिए बचत कर रहे हैं तो इक्विटी-आधारित फंडों का चयन करें। ध्यान रखें कि इनमें इक्विटी-डेट का आवंटन 65:35 का होता है और उनको उसी हिसाब से अपना पोर्टफोलियो समायोजित करना चाहिए। अल्पावधि लक्ष्य के लिए निवेशक एमआईपी वाले चाइल्ड प्लान का इस्तेमाल कर सकते हैं।
इन फंडों में रीडम्पशन पर भी शर्त होती है। आप ऐसे प्लान का चयन कर सकते हैं जिसमें बच्चे के 18 साल का होने या निवेश के तीन साल के बाद ही निवेश को भुनाया जा सकता है। बच्चे के बालिग होने के बाद निवेश को उसके नाम पर स्थानांतरित करने की जरूरत होगी और उसके बाद ही इससे धन निकाला जा सकेगा। अन्य विकल्प भी हैं। इनमें एक्जिट लोड बढ़ जाता है। एक साल के अंदर भुनाए जाने पर 3 फीसदी, एक से दो साल के बीच भुनाए जाने पर 2 फीसदी और दूसरे और तीसरे साल के बीच की अवधि में 1 फीसदी एक्जि लोड लगता है।
एसबीआई म्युुचुअल फंड के कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य विपणन अधिकारी डी पी सिंह कहते हैं, 'लॉक-इन अवधि से निवेशकों में अनुशासन पैदा करने में मदद मिलती है।' म्युचुअल फंडों में बने रहने की औसत अवधि दो से तीन साल के बीच है। लॉक-इन की वजह से निवेशकों को लंबे समय तक इन योजनाओं से जुड़े रहने के लिए बाध्य होना पड़ता है। दत्ता कहते हैं, 'चाइल्ड प्लान में बने रहने की हमारी औसत अवधि 10 साल है क्योंकि हमें 8-9 साल की आयु में ही रकम मिल जाती है।' विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि लॉक-इन अवधि वाले प्लान का चयन नहीं करें क्योंकि इसमें फंड के खराब प्रदर्शन की स्थिति में आपको अपने निवेश बदलने की स्वतंत्रता नहीं होती है। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर, इंडिया में निदेशक (निवेश सलाहकार) धवल कपाडिया कहते हैं, 'लक्ष्य को ध्यान में रखकर निवेश किया जाता है। जैसे-जैसे जब आप लक्ष्य के नजदीक पहुंचते हैं तो आपको धीरे धीरे रकम को डेट फंड में ले जाने की जरूरत होती है जो लॉक-इन अवधि वाले विकल्प में संभव नहीं है।'

Keyword: insurance, child plan, investment,
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