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गिल्ट फंड से कम करें लगाव, न दें ज्यादा भाव
प्रिया नायर /  09 18, 2016

पिछले कुछ दिनों में 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूतियों पर प्रतिफल में गिरावट आई है। मगर इनकी कीमत में इजाफा हुआ है। यह गिल्ट फंडों के प्रतिफल में मददगार रहा है। गिल्ट फंड सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं। वैश्विक बाजारों में, अमेरिका, जापान, जर्मनी आदि की सरकारी प्रतिभूतियों पर प्रतिफल शून्य के करीब या नकारात्मक है। पर्याप्त पूंजी आपूर्ति की वजह से बड़ी तादाद में विदेशी निवेशकों की पूंजी भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश हो रही है।

हाल में हीलियस कैपिटल के फंड प्रबंधक समीर अरोड़ा ने कहा, 'यह बेहद अस्त-व्यस्त दुनिया है। निवेशक अब पूंजी वृद्घि (चूंकि दरें नकारात्मक हैं) के लिए बॉन्ड और प्रतिफल (लाभांश) के लिए शेयर खरीदते हैं।' ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारतीय निवेशकों को भी गिल्ट फंडों में निवेश कर पूंजी वृद्घि पर जोर देना चाहिए? ऐक्सिस म्युचुअल फंड में फिक्स्ड इनकम के प्रमुख आर शिवकुमार कहते है कि यदि ब्याज दरों को लेकर आपका कोई खास नजरिया है तो एक रणनीतिक दांव के रूप में गिल्ट फंडों में निवेश कर सकते हैं। वह कहते हैं, 'जी-सेक फंडों में अधिक उतार-चढ़ाव होता है और इनमें निवेश के लिए ठीक समय का चयन बेहद अहम है। लेकिन खुदरा निवेशकों के लिए डायनेमिक बॉन्ड फंड या इनकम फंड की सलाह दी जाती है क्योंकि ये अवधि लाभ की पेशकश करते हैं। इसके अलावा प्रमुख मुद्रास्फीति दर 5 फीसदी पर ऊंची बनी हुई है। ऐसे में आरबीआई दरों में कई कटौतियों से परहेज करेगा। इसलिए यदि आप ब्याज दरों के चक्र पर दांव लगाने की संभावना तलाश रहे हैं तो फिर जी-सेक में गुंजाइश सीमित है।'

जब जी-सेक यानी सरकारी प्रतिभूतियों का प्रतिफल 7.7-7.6 फीसदी के स्तरों पर था तो वे आकर्षक थीं, क्योंकि तब इनमें और अधिक गिरावट और कीमतों में मजबूती की संभावना थी। लेकिन अब ज्यादातर बढ़त आ चुकी है। आईसीआईसीआई डायरेक्ट में म्युचुअल फंड्ïस रिसर्च के प्रमुख सचिन जैन का कहना है कि इस स्तर से अब तेजी सीमित होगी। वह कहते हैं, 'मुद्रास्फीति में तेजी संभावित थी और आरबीआई से भी यही उम्मीद थी कि वह आगामी नीतिगत समीक्षा में दरें बरकरार रहेगा। 10 वर्षीय बेंचमार्क पर प्रतिफल 7 फीसदी से नीचे जा चुका है। यही वजह है कि निवेशकों को इनकम और डायनेमिक बॉन्ड फंडों पर विचार करने की सलाह दी जाती है जिनमें फंड प्रबंधक अवधि पर दांव लगा सकते हैं।' गिल्ट फंडों में उतार-चढ़ाव अधिक होता है। वे ब्याज दरों का झटका सहन कर जाते हैं। जहां डेट में निवेश निवेशकों को उनके पोर्टफोलियो में मददगार माना जाता है वहीं गिल्ट फंड इस मकसद में कामयाब नहीं हो सकते हैं।

इसके अलावा, जैसे ही अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा, ब्याज दरें नीचे आएंगी तो बॉन्ड प्रतिफल पर भी असर दिखेगा। शिव कुमार कहते हैं कि फिलहाल निवेशक उन फंडों पर भी विचार कर सकते हैं जो संक्षिप्त अवधि की मुद्रा बाजार योजनाओं में पैसा लगाते हैं क्योंकि इन्हें आरबीआई के तरलता संबंधी उपायों में नरमी का लाभ मिलेगा। वह कहते हैं, 'नकदी किल्लत की वजह से संक्षिप्त अवधि के बॉन्ड अधिक प्रभावित हुए थे और बाजारों में नकदी आने से अब ये अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके अलावा यदि दरों में कटौती होती है तो अल्पावधि के बॉन्डों को भी जी-सेक की तरह मजबूती मिलेगी।'
Keyword: गिल्ट फंड, सरकारी प्रतिभूति, प्रतिफल, विदेशी निवेशक, निवेश, पूंजी वृद्घि, म्युचुअल फंड,
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