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मकान-जमीन तो वहीं लें, जहां रकम तेज बढ़े
तिनेश भसीन /  08 14, 2016

रकम तो हाथ में होती है, लेकिन मकान में कहां डालें, छोटे शहर में, मझोले शहर में या महानगर में, यह फैसला सबसे मुश्किल होता है। कैसे करें फैसला बता रहे हैं तिनेश भसीन

केंद्र सरकार के कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग का तोहफा मिल रहा है। इस महीने से उनका बढ़ा हुआ वेतन लागू हुआ है और जनवरी से अभी तक का बकाया भी इस बार के वेतन के साथ ही उनके हाथ आएगा। जाहिर सी बात है कि उनके पास खर्च करने के लिए एकमुश्त रकम आएगी। यह बात बाजार को भी पता है। इसीलिए तमाम कंपनियां उस रकम में सेंध लगाने के लिए बेताब हो रही हैं। रियल एस्टेट कंपनियां और बैंक भी पीछे नहीं हैं। आपको अखबारों में आएदिन सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए खास तौर पर तैयार की जा रही किफायती रियल्टी परियोजनाओं के विज्ञापन दिखते होंगे। भारतीय स्टेट बैंक समेत कई बैंक रियायती ब्याज दर पर उन्हें होम लोन भी मुहैया करा रहे हैं। ऐसे में यह बात तय है कि बड़ी तादाद में कर्मचारी अपने हाथ आई रकम को जमीन-जायदाद में लगाएंगे। लेकिन क्या दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और चेन्नई जैसे शहर इस मामले में अब भी उनके लिए मुफीद हैं या छोटे महानगरों और मझोले शहरों में निवेश के लिहाज से जमीन या मकान खरीदना ज्यादा अच्छा रहेगा?

अगर पिछले कुछ वक्त के रुझानों पर नजर डालें तो अपेक्षाकृत कम बड़े शहरों और छोटे शहरों का रुख करना ही बेहतर होगा। मकानों की कीमत के बारे में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सूचकांक के मुताबिक पिछली कुछ तिमाहियों में अपेक्षाकृत छोटे शहरों में मकानों के दाम घट गए हैं। ऐसे में अगर देश की अर्थव्यवस्था सालाना 7 फीसदी से ज्यादा रफ्तार से बढ़ी तो महानगरों के मुकाबले ये शहर ज्यादा तेज तरक्की करेंगे। इसके अलावा सरकार की स्मार्ट सिटी परियोजना भी महानगरों से इतर बड़े शहरों और कुछ छोटे शहरों को फायदा पहुंचा सकती है। माना जा रहा है कि अगर यह परियोजना कामयाब रही तो कई छोटे शहर महानगरों में तब्दील हो सकते हैं। जेएलएल इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी (परिचालन) और अंतरराष्ट्रीय निदेशक संतोष कुमार कहते हैं, 'इन शहरों में बुनियादी ढांचा सुधर रहा है, इसलिए वहां आने वाले उद्योगों की तादाद भी बढ़ रही है। इसे देखकर आसपास के लोग इन शहरों में जाकर बस रहे हैं और उनका अच्छा खासा विस्तार हो रहा है।' 
निवेश का मौका

महानगरों में रियल एस्टेट की कीमतों में ठहराव आ गया है, लेकिन अपेक्षाकृत छोटे शहरों में से कुछ में रियल एस्टेट की कीमतें पिछले कुछ अरसे में लुढ़कती दिखी हैं। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक अगर जनवरी-मार्च 2015 से तुलना करें तो इस साल जनवरी-मार्च में जयपुर, कानपुर और कोच्चि जैसे शहरों में आवासीय मूल्य का सूचकांक क्रमश: 7.40 फीसदी, 3 फीसदी और 8 फीसदी गिरा है। पिछले साल के मुकाबले मकानों की कीमतों में गिरावट भी आई है। 

कीमतों में कमी आने की बड़ी वजह यह है कि महानगरों में भी रियल एस्टेट की कीमतें मंद चल रही हैं। वहां की मंदी धीरे-धीरे अब मझोले और छोटे शहरों में भी पसरने लगी है। कुमार कहते हैं, 'आम तौर पर प्रवासी भारतीय (एनआरआई) ही होते हैं जो अपने परिवार के लिए या संपत्ति तैयार करने के इरादे से महानगरों से इतर शहरों में रकम लगाते हैं। उनका इरादा यह होता है कि भविष्य में अगर कभी भारत लौटना हुआ तो इन शहरों में अपने तैयार मकान होंगे। लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती आने की वजह से एनआरआई के निवेश में भी अच्छी खासी कमी आ गई है।' बहरहाल भारत में आर्थिक वृद्घि बेहतर रहने के आसार कमोबेश सभी एजेंसियां जता रही हैं, इसलिए यह उम्मीद भी लगाई जा सकती है कि इन शहरों में विस्तार आगे भी जारी रहेगा।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) को भरोसा है कि 2016-17 यानी चालू वित्त वर्ष में और 2017-18 में भारत की आर्थिक वृद्धि 7 फीसदी से अधिक रहेगी। ईवाई में पार्टनर (स्मार्ट सिटीज) श्रीनिवास कौलिगी कहते हैं, 'दुनिया भर में आप देख सकते हैं कि महानगरों से इतर कुछ बड़े शहर ऐसे होते हैं, जो महानगरों को भी पछाड़ते हुए बेहद तेजी के साथ आगे बढ़ते हैं। इसकी वजह यह होती है कि वहां आर्थिक गतिविधियां तेजी से बढ़ती जाती हैं और बुनियादी ढांचे का भी विकास होता है। उदाहरण के लिए भारत में पहले चार ही महानगर थे। अब बड़े शहरों की संख्या बढ़कर आठ हो गई है, जिनमें पुणे, बेंगलूरु, हैदराबाद और अहमदाबाद भी शामिल हो गए हैं।' 

रियल एस्टेट विशेषज्ञों को लगता है कि सरकार की स्मार्ट सिटी परियोजना से इस तरह के शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतों में तेजी आ सकती है। कौलिगी कहते हैं, 'सरकार चाहती है कि ये शहर क्षेत्र विकास में विकास करें और बेहतर परिवहन सुविधा दें, अधिक सार्वजनिक स्थल तैयार करें, सेवाएं बेहतर बनाएं और एक जगह से दूसरी जगह जाना आसान कर दें, साथ ही वे सड़कों को चलने लायक भी बनाएं।' उन्होंने कहा कि इससे रियल एस्टेट भी जुड़ा है। सरकार ऐसे इलाकों में ज्यादा फ्लोर स्पेस रेश्यो मुहैया कराती है। आमतौर पर ये इलाके 1 से 4 वर्ग किलोमीटर में फैले हैं। निवेशक इन छोटे शहरों के भीतर उन इलाकों को निवेश के लिए चुन सकते हैं, जिन्हें स्मार्ट सिटी के तहत विकास के लिए चुना गया है।

महानगर के छोर पर?

जमीन-जायदाद में रकम लगाने के इच्छुक लोगों के सामने अक्सर दुविधा आ जाती है कि वे किसी नए बस रहे शहर में निवेश करें या महानगर के बाहरी हिस्से में मकान आदि खरीदें। महानगरों का लगातार विस्तार हो रहा है, इसलिए ऐसे बहुत से इलाके कल उन्हीं में शामिल हो जाएंगे, जो महानगर से काफी दूर नजर आते हैं। विशेषज्ञ आपकी इस मुश्किल को भी आसान कर रहे हैं। उनके हिसाब से आपको अपनी भविष्य की योजना और प्रफिल की उम्मीद के मुताबिक चुनाव करना होगा। अगर आप लंबे अरसे के निवेश करना चाहते हैं तो छोटे महानगर या नए बस रहे शहर आपके लिए अच्छे हैं।

जेएलएल इंडिया के कुमार कहते हैं, 'छोटे महानगरों में आपको ज्यादा प्रतिफल मिल सकता है क्योंकि अभी वहां मकान बेहद सस्ते में मिल जाएंगे, जिनकी बाद में आप अच्छी कीमत वसूल सकते हैं। लेकिन वहां आपको कम से कम एक दशक तक रकम फंसाकर रखनी पड़ेगी। लेकिन अगर आप कम वक्त में ठीक-ठाक या कम प्रतिफल से काम चला सकते हैं तो महानगरों के बाहरी इलाकों का ही रुख करना ठीक रहेगा।'

कहां निवेश करना है, यह फैसला इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपके पास निवेश के लिए कितनी रकम है? हालांकि महानगर में मकान खरीदने के बजाय आप वहां से कुछ दूर बसे उपनगरों में मकान खरीदते हैं तो आपको कम कीमत अदा करनी होगी। लेकिन उपनगरों के मकान भी छोटे महानगरों के मुकाबले महंगे होंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे महानगरों के बीचोबीच अगर आप दो बेडरूम वाला फ्लैट खरीदने की सोच रहे हैं तो आपको 30-40 लाख रुपये खर्च करने होंगे। यह मकान बेहर हो सकता है क्योंकि बाजार, स्कूल और अस्पताल पास ही होंगे। अगर आप किसी महानगर के बाहरी इलाके में फ्लैट खरीदने की सोच रहे हैं तो आपको डेढ़ से दोगुनी रकम खर्च करनी पड़ सकती है। 
मौके पहचानिए

जो शहर तेजी से बढ़े हैं, उनमें से ज्यादातर शहर शिक्षा के केंद्र थे और उन शहरों में स्थापित होने वाले उद्योगों को उसी जगह पर बड़ी तादाद में कुशल कर्मचारी मिल जाते थे। कॉलियर्स इंडिया की सह निदेशक (अनुसंधान) सुरभि अरोड़ा कहती हैं, 'आम तौर पर इन शहरों में सबसे पहले उद्योग आते हैं। उनके बाद कंपनियों के दफ्तर वहां खुलते हैं और सबसे आखिर में व्यावसायिक रियल एस्टेट की परियोजनाएं तैयार की जाती हैं।' इसके अलावा यह भी देखना चाहिए कि शहर में आबादी किस तरह बढ़ रही है। अगर आबादी तेजी से बढ़ रही है तो इसका मतलब यह है कि शहर की अहमियत भी बढ़ती जा रही है।

राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने समेत बुनियादी ढांचे का विकास करना या कारेाबार के लिहाज से क्षेत्रीय केंद्र होना किसी भी छोटे महानगर के लिए अच्छा है क्योंकि इससे उन्हें तेजी से बढऩे में मदद मिलती है। अरोड़ा कहती हैं, 'आप जिस इलाके को चुनते हैं, उसमें आपको इन सब पहलुओं पर नजर दौड़ानी चाहिए। अगर ऐसा कुछ नजर आ रहा है तभी पैसा लगाएं। घोषणाओं और वायदों के फेर में आकर निवेश करने से हमेशा परहेज करें।' 

नाइट फ्रैंक इंडिया के कार्यकारी निदेशक (परामर्श, खुदरा एवं आतिथ्य) गुलाम जिया कहते हैं, 'उन राजनीतिक कारकों पर भी विचार करें, जिनका शहर पर असर पड़ सकता है।' वह इसका उदाहरण भी देते हैं। मिसाल के तौर पर भुवनेश्वर को ही लें। उसमें महानगर बनने के लायक सभी संभावनाएं मौजूद हैं और वह पैमानों पर खरा भी उतरता है। लेकिन सियासी ठसक के मामले में यह शहर बहुत पीछे है। दूसरी ओर अहमदाबाद है। जब से वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद पर बैठे हैं तभी से कई कंपनियां और रियल एस्टेट निवेश्का वहां निवेश करने की गुंजाइश तलाश रहे हैं। जेएलएल के कुमार कहते हैं कि आप छोटे महानगरों में रहने के लिए तैयार मकान खरीदने के बजाय अगर जमीन में पैसा लगाते हैं तो आपको बेहतर प्रतिफल हासिल हो सकता है।

कुछ जोखिम भी

छोटे महानगरों या मझोले शहरों में निवेश करने के कुछ जोखिम भी होते हैं। आपकेा केवल उन्हीं शहरों में रकम फंसानी चाहिए, जहां आप अपने निवेश यानी मकान, जमीन पर नजर रख सकें या आपके रिश्तेदार वहां पर हों, जो आपकी जायदाद की देखभाल कर सकें। यह जरूरी है क्योंकि कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां जमीन यानी प्लॉट पर अवैध कब्जा कर लिया जाता है। इसी तरह कई बार किरायेदार भी मकान खाली करने से इनकार कर देते हैं और इसके लिए वह किराया नियंत्रण अधिनियम का सहारा लेते हैं। जिया कहते हैं, 'हमेशा ऐसा शहर चुनें, जो आपके घर से 3 या 4 घंटे से अधिक दूरी पर नहीं हो।'

अगर आप प्लॉट खरीदने जा रहे हैं तो कागज देखकर मालिकाना हक के बारे में पूरी तरह जांच पड़ताल कर लें। अगर आप बना-बनाया मकान खरीदने की मंशा बना रहे हैं तो परियोजना तैयार करने के वाले डेवलपर की वेबसाइट पर जाएं और पहले से तैयार की गई परियोजनाओं को अच्छी तहर देख लें और उसके बाद ही फैसला करें। छोटे महानगरों में जमीन-जायदाद में निवेश करना बिल्कुल मिड कैप शेयरों में रकम लगाने सरीखा होता है। अगर आपको ऐसा लगता है कि जमीन या मकान में निवेश पर आपको मनचाहा प्रतिफल नहीं मिल रहा है यानी कीमत आपकी उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ रही है तो उसे बेचकर झटपट बाहर निकलने की तैयारी भी आपको कर लेनी चाहिए।

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