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लाभांश रणनीति पर पुनर्विचार
विशाल छाबडिय़ा /  July 31, 2016

कई वर्षों से निवेशकों ने मजबूत लाभांश वाले शेयरों की खरीद कर अच्छा प्रतिफल कमाया है। 10 लाख रुपये सालाना की सीमा (केंद्रीय बजट 2017 में निर्धारित) से अधिक रकम के निवेशक को मिलने वाले लाभांश की सकल मात्रा पर 10 फीसदी के कर के बाद पुनर्विचार किए जाने की जरूरत पैदा हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप कई कंपनियों ने हाल के महीनों में शेयरधारकों के लिए पुनर्खरीद योजनाओं का खास विकल्प अपनाया है। बिजनेस स्टैंडर्ड द्वारा जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि मार्च से 15 कंपनियों ने लगभग 24,000 करोड़ रुपये की शेयर पुनर्खरीद संबंधित योजनाओं की घोषणा की है और जनवरी और फरवरी में सिर्फ तीन कंपनियों ने ऐसी योजनाओं (1721 करोड़ रुपये) पर अमल किया। 

 
हालांकि कंपनियों ने इस बारे में किसी विशेष योजनाओं का जिक्र नहीं किया है कि शेयरधारकों को कैसे लाभान्वित किया जाएगा, लेकिन उनकी गतिविधियों ने संकेत जरूर दिया है। 15 कंपनियों में से 6 ने पिछले दो महीनों में 14,735 करोड़ रुपये की शेयर पुनर्खरीद की घोषणा की है। अन्य चार 4582 करोड़ रुपये की पुनर्खरीद को पिछले महीने पूरा कर चुकी हैं। यह 2014 और 2015 की तुलना में अच्छी तेजी है जब 16 और 15 कंपनियों ने 875 करोड़ रुपये और 1725 करोड़ रुपये की शेयर पुनर्खरीद योजनाओं की घोषणा की थी।
 
प्रभुदास लीलाधर में मुख्य पोर्टफोलियो प्रबंधक अजय बोडके सहमति जताते हुए कहते हैं, 'कर समस्या की वजह से यह स्पष्टï रूप से गड़बड़ी है। कई कंपनियां फिलहाल लाभांश के बजाय बायबैक रूट को पसंद कर रही हैं क्योंकि इससे कर बचाने में मदद मिलती है।' इसके अलावा बॉश, विप्रो, सन फार्मा और डॉ. रेड्डïीज जैसी बड़ी कंपनियों ने शेयरधारकों को लाभान्वित करने का निर्णय लिया है।
 
15 कंपनियों में से 4 सरकार के स्वामित्व वाली हैं। इनमें नैशनल एल्युमीनियम, एनडीएमसी, एमओआईएल और कोल इंडिया (संयुक्त रूप से पुनर्खरीद मात्रा 14,876 करोड़ रुपये है) और इस कदम से सरकार को अपने राजकोषीय लक्ष्य को पूरा करने में मदद मिलेगी। हालांकि कोई भी यह सुझाव नहीं दे रहा है कि कंपनियां लाभांश भुगतान बंद कर देंगी। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि पुनर्खरीद का रुझान अब सभी क्षेत्रों में मजबूत हो रहा है। भले ही शेयर पुनर्खरीद से शेयरधारकों के लिए त्वरित लाभ नहीं मिल सकता हो, लेकिन वे दीर्घावधि में फायदे की स्थिति में बने रहेंगे क्योंकि इससे शेयरों की संख्या (इक्विटी पूंजी) में कमी आती है  जिससे शेयर भाव को मजबूती मिलती है।
 
कोटक सिक्योरिटीज के शोध प्रमुख दिपेन शाह कहते हैं, 'कराधान में वृद्घि की वजह से इस साल यह रुझान शेयर पुनर्खरीद के पक्ष में रह सकता है, हालांकि यह कंपनी -केंद्रित अधिक होगा। कम से कम इस साल कंपनियां शेयर पुनर्खरीद के पक्ष में सक्रिय दिख सकती हैं। इससे इक्विटी पूंजी में कमी भी आएगी।' विश्लेषकों का कहना है कि व्यापक स्तर पर भारत 'वृद्घि' का बाजार है और निवेशकों को मजबूत परिदृश्य के साथ साथ शेयरधारकों के कोष पर मजबूत प्रतिफल वाली कंपनियों पर ध्यान बनाए रखना चाहिए। मजबूत बुनियादी आधार से दीर्घावधि के दौरान लाभांश वृद्घि और शेयर कीमत (पूंजी) वृद्घि के स्वरूप में मजबूती आनी चाहिए। व्यक्तिगत निवेशक भी अलग नहीं हैं। विश्लेषकों का कहना है कि रुझान म्युचुअल फंडों को भी प्रभावित करेगा। बोडके कहते हैं कि अधिक लाभांश वाले शेयरों पर केंद्रित फंडों के लिए जटिलता बढ़ गई है। 
 
केआर चोकसी के प्रबंध निदेशक देवेन चोकसी कहते हैं, 'इस साल अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि रुझान कैसा रहेगा, लेकिन शेयर पुनर्खरीद एक ऐसा विकल्प रहेगा जिस पर कंपनियां ध्यान केंद्रित करेंगी। पुनर्खरीद से जुड़ी कुछ खामियां भी हैं। चूंकि इससे जहां फ्लोटिंग शेयरों में कमी आएगी वहीं पुनर्खरीद को लेकर कंपनियों के लिए सीमा होगी। इसलिए यह पूरी तरह से एक उपयुक्त विकल्प भी नहीं है। लेकिन कुछ समय के लिए यह अनुकूल रहेगा।' दूसरी बात, सभी कंपनियां इस विकल्प को अपनाना पसंद नहीं कर सकती हैं। पुनर्खरीद को अपनाने वाली कंपनियां 6 महीने की अवधि के लिए नई पूंजी जुटाने से वंचित रहेंगी। तीसरा, जिन कंपनियों को लगातार वृद्घि के लिए व्यवसाय में पुन: निवेश करने के लिए बड़े कोष की जरूरत रहती है, वे पुनर्खरीद से परहेज कर सकती हैं। हालांकि इसे लेकर स्थिति नियम सामने आ जाने के बाद ही पूरी तरह स्पष्टï होगी। 
Keyword: share, market, sensex,,
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