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खुदरा निवेशकों को इक्विटी को लेकर धैर्य बनाए रखने की जरूरत
संजय कुमार सिंह /  July 31, 2016

इक्विटी में निवेश तभी फायदेमंद होता है, जब कम से कम 20 साल के लिए रकम लगाई जाए

कम जोखिम पसंद करने वालों का अन्य पसंदीदा विकल्प बैंक की सावधि जमा है
सावधि जमाएं आसान और सुरक्षित हैं, लेकिन इन पर ब्याज दरें घटी हैं
जब आपकी एफडी परिपक्व हो जाए तो आप कम दर पर फिर से निवेश कर सकते हैं
 
किसी भी फंड प्रबंधक और वित्तीय योजनाकार से पूछ लीजिए, खुदरा निवेशकों के लिए उसके पास एक ही सलाह होगी - 'इक्विटी में लंबे अरसे तक निवेश बनाए रखें।' यही सलाह बार-बार दी जाती है चाहे सेवानिवृत्ति के लिए रकम जुटानी हो या बच्चों की शिक्षा के लिए या लंबे समय बाद का कोई और लक्ष्य हो। अब सवाल उठता है कि यह लंबा अरसा कितना लंबा होना चाहिए? अगर पांच या आठ साल तक प्रतिफल खराब रहता है तो निवेश योजनाकार तुरंत कह देते हैं कि निवेशक को और लंबे अरसे तक पैसा फंसाए रखना चाहिए।
 
चलिए, अब सीधी बात करते हैं। इक्विटी में निवेश तभी फायदेमंद होता है, जब कम से कम 20 साल के लिए रकम लगाई जाए। बिजनेस स्टैंडर्ड रिसर्च ब्यूरो द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार बीएसई के संवेदी सूचकांक या सेंसेक्स में जुलाई 1996 में लगाई गई 1 लाख रुपये की रकम अब तक बढ़कर 7.33 लाख रुपये (10.48 फीसदी की सालाना चक्रवृद्घि दर के हिसाब से) हो गई होती। अगर वही रकम सोने में लगाई गई होगी तो 9.55 फीसदी चक्रवृद्घि की दर से 6.1 लाख रुपये हो गई होती। भारतीय स्टेट बैंक की 1 साल की सावधि जमा (एफडी) में उस वक्त लगाए गए 1 लाख रुपये अब 7.95 फीसदी की दर से बढ़कर 4.6 लाख रुपये बन गए होंगे। 
 
हां, अगर वही रकम आपने किसी ढंग के म्युचुअल फंड में लगाई होती तो आपको इस दरम्यान बहुत अधिक प्रतिफल मिला होता। उदाहरण के लिए एचडीएफसी इक्विटी फंड ने जनवरी 1995 से 19.56 फीसदी का प्रतिफल, रिलायंस ग्रोथ फंड ने अक्टूबर 1995 से 23.73 फीसदी और पुराने फंडों में से एक फ्रैंकलिन इंडिया ब्लूचिप ने 1993 से 21.99 फीसदी का प्रतिफल दिया है।
 
घटनाक्रम और प्रतिफल
 
इक्विटी या शेयरों में लंबे अरसे तक निवेश करे रहना खासा खीझ भरा होता है। मिसाल के तौर पर अगर आपने दुनिया भर के बाजार ढहने से ऐन पहले 2008 में (जब सेंसेक्स 20,058 अंक पर था) 1 लाख रुपये लगाए होंगे तो इस वक्त उनकी कीमत महज 1.32 लाख रुपये होगी। इसकी सालाना प्रतिफल दर केवल 3.79 फीसदी रही होगी यानी सामान्य बचत खाते में मिलने वाले ब्याज से भी कम। लेकिन जनवरी 2008 से जुलाई 2016 के बीच सोना सालाना 14.78 फीसदी और सावधि जमा योजना 8.14 फीसदी प्रतिफल दे चुकी है। इसी तरह यदि आप नरेंद्र मोदी सरकार और शेयर बाजारों पर उसके असर को लेकर उत्साहित हैं तो महज 5.66 फीसदी सालाना प्रतिफल पाकर आपको मायूसी ही हाथ लगेगी। अच्छी खबर: सोने ने 4.29 फीसदी के प्रतिफल के साथ खराब प्रदर्शन किया, लेकिन सावधि जमा ने 8.40 फीसदी का प्रतिफल दिया। स्पष्टï है कि अवधि के अनुसार प्रतिफल के आंकड़े समय-समय पर बदलेंगे। निवेशकों को अच्छे के साथ साथ खराब समय में भी अधिक प्रतिफल कमाने के लिए निवेश से जुड़े रहने और सतर्क रहने की जरूरत होगी। 
 
10 वर्ष की अवधि के दौरान निवेश को लेकर निष्कर्ष यह है कि लार्ज-कैप फंडों (12.36 फीसदी) का पिछला प्रतिफल निफ्टी या सेंसेक्स जैसे प्रमुख सूचकांकों की तुलना में बेहतर रहा है। सोने (स्टैंडर्ड गोल्ड मुंबई) के लिए प्रतिफल लार्ज-कैप श्रेणी के लिए औसत की तुलना में कुछ अधिक (12.84 फीसदी) था। सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) का प्रतिफल पिछले दशक के दौरान सालाना 8.32 फीसदी की चक्रवृद्घि दर के साथ धीमा रहा है।
 
यदि आप हमारे मानक के तौर पर एसबीआई की एक वर्षीय टर्म डिपॉजिट योजना को देखते हैं तो सावधि जमा दरें पिछले दशक के दौरान 6 फीसदी और 10 फीसदी के बीच (हालांकि कुछ अन्य बैंकों ने शायद इससे थोड़ा अधिक ब्याज दिया है) रही हैं। मल्टी-कैप (15.63 फीसदी) और स्मॉल-कैप फंड (14.39 फीसदी) जैसे डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंडों की अन्य श्रेणियों का प्रतिफल 10 वर्षीय अवधि के दौरान लार्ज-कैप श्रेणी की तुलना में अधिक रहा।
 
यदि आपने लार्ज-कैप श्रेणी के लिए 40 फीसदी, मल्टी-कैप के लिए 30 फीसदी, मिड-कैप के लिए 20 फीसदी और स्मॉल-कैप फंडों के लिए 10 फीसदी निवेश किया है तो 10 वर्ष की अवधि के दौरान आपका भारांश औसत प्रतिफल 13.57 फीसदी होगा जो सोने और निर्धारित आय योजनाओं की तुलना में बेहतर है। तीन और पांच वर्षीय अवधि के दौरान, इक्विटी म्युचुअल फंडों ने बाजार सूचकांकों (सेंसेक्स और निफ्टी) और सोने, पीपीएफ तथा सावधि जमा को मात दी है।
 
एसआईपी बनाम एकमुश्त निवेश
 
10 वर्षीय निवेश अवधि को लेकर हमारे आंकड़ों से यह भी स्पष्टï रूप से पता चलता है कि एसआईपी निवेश एकमुश्त किए जाने वाले निवेश की तुलना में डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंडों पर दांव लगाने के लिए काफी बेहतर विकल्प है। सिर्फ तीन वर्षीय के दौरान एसआईपी का प्रदर्शन एकमुश्त निवेश की तुलना में कमजोर रहा। उस अवधि में बाजार में लगभग 40 फीसदी की तेजी दर्ज की गई और बाजार में इस तरह की तेजी की स्थिति में एसआईपी का प्रदर्शन कमजोर माना जाता है। निवेश के दूसरे अधिकतर साधनों की तुलना में एसआईपी निवेश ने एकमुश्त निवेश को पीछे छोड़ा है। विश्लेषक एसआईपी निवेश से बेहतर प्रतिफल के लिए अधिक उतार-चढ़ाव को जिम्मेदार मान रहे हैं। डीएसपी ब्लैकरॉक इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के उपाध्यक्ष एवं फंड प्रबंधक विनीत सांब्रे कहते हैं, '2008 के वित्तीय संकट के बाद से इक्विटी बाजारों ने उतार-चढ़ाव के कई दौर दर्ज किए हैं। इक्विटी निवेशकों को प्रभावित करने वाला यह उतार-चढ़ाव उन लोगों के लिए लंबी अवधि के दौरान वरदान साबित हुआ है जिन्होंने निवेश के लिए एसआईपी का मार्ग चुना। बाजार में गिरावट के समय भी अपने एसआईपी बंद नहीं करने वाले निवेशकों को अक्सर लंबी अवधि के दौरान आकर्षक प्रतिफल मिलता है।'
 
एसआईपी प्रतिफल की तुलना से एक अन्य तथ्य भी सामने आया है, वह यह है कि मिड-कैप और स्मॉल-कैप फंड जैसी अधिक उतार-चढ़ाव वाली फंड श्रेणियों को एसआईपी निवेश से अधिक लाभ मिलता है। ज्यादातर निवेश अवधि के दौरान, मिड-कैप और स्मॉल-कैप फंडों का एसआईपी प्रतिफल किसी खास अवधि में पिछले प्रतिफल की तुलना में बेहतर रहा है। फंड्ïसइंडिया डॉटकॉम में शोध प्रमुख विद्या बाला का कहना है, 'उतार-चढ़ाव से जुड़े होने की वजह से इन फंडों में बड़ी गिरावट आती है जिससे एसआईपी निवेशकों को खरीदारी की लागत को कम करने में मदद मिलती है।'
 
एकमुश्त निवेश को न कहें अलविदा
 
एसआईपी के जरिये निवेश करने का मतलब यह नहीं है कि निवेशकों को एकमुश्त निवेश का रास्ता पूरी तरह छोड़ देना चाहिए। जब बाजार में बड़ी गिरावट आती है तो चालाक निवेशक उन समान फंडों में एकमुश्त भारी रकम डालकर फायदा लले सकते हैं, जिनमें वे एसआईपी के जरिये निवेश कर रहे होते हैं। साथ ही यह भी याद रखें कि जिन मिड-कैप और स्मॉल-कैप श्रेणियों ने पिछले समय में अच्छा प्रतिफिल दिया है, उनमें उतार-चढ़ाव भी अधिक आता है। बाला का कहना है, 'निवेशकों को इन फंडों में अपने पूरे इक्विटी पोर्टफोलियो का 20-30 फीसदी निवेश ही करना चाहिए।' 
 
निवेशकों को तीन से पांच साल के लिए एकमुश्त निवेश से परहेज करना चाहिए। हालांकि निवेशकों को जल्दबाजी में निवेश नहीं करना चाहिए। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया के निदेशक-प्रबंधक (शोध) कौस्तुभ बेलापुरकर का कहना है, 'यदि अल्पावधि में प्रदर्शन खराब हो तो फंड यूनिट को न भुनाएं। अक्सर फंड कुछ समय के लिए मुश्किलों में फंसते ही हैं।' लेकिन यदि कोई फंड एक साल या इससे अधिक समय तक अपने बेंचमार्क या श्रेणी औसत से पीछे बना हुआ है तो उससे बाहर निकलना ही समझदारी होगी। 
 
पोर्टफोलियो में विविधता
 
उतार-चढ़ाव से बचने के लिए ज्यादातर पोर्टफोलियो में इक्विटी और डेट फंडों का समावेश किया जाता है। पीपीएफ पर 8.1 फीसदी की दर से ब्याज मिलता है। पीपीएफ से मिलने वाले प्रतिफल पर कर नहीं लगता और आपको धारा 80सी के तहत कर छूट का लाभ भी मिलता है। राइट हॉराइजंस के मुख्य कार्याधिकारी अनिल रेगो कहते हैं, 'पीपीएफ उन निवेशकों के लिए अनुकूल है, जो लंबे समय के लिए निवेश करना चाहते हैं और जिन्हें निकट भविष्य में नकदी की जरूरत नहीं है।' हालांकि इसकी ब्याज दर हर तिमाही में संशोधित होती है जबकि राष्टï्रीय बचत पत्र में ऐसा नहीं होता क्योंकि उसमें प्रतिफल की दर निश्चित होती है। कम जोखिम पसंद करने वालों का अन्य पसंदीदा विकल्प बैंक की सावधि जमा है। हालांकि सावधि जमाएं आसान और सुरक्षित हैं, लेकिन इन पर ब्याज दरें घटी हैं। पांच साल पहले आप एक वर्षीय जमा पर 9.55 से 10.50 फीसदी ब्याज हासिल कर सकते थे, लेकिन आज यह दर घटकर 7.25 से 8 फीसदी के आसपास रह गई हैं। इन पर निर्भर रहने वाले निवेशक इनमें पुन: निवेश का जोखिम उठा सकते हैं। जब आपकी एफडी परिपक्व हो जाए तो आप कम दर पर फिर से निवेश कर सकते हैं। रेगो कहते हैं, 'एफडी अधिक कर दायरे में आने वाले लोगों के लिए कर के लिहाज से अनुकूल नहीं है।' 
Keyword: share, market, sensex, equity,,
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