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खुद लड़ें अपना उपभोक्ता मुकदमा, बचाएं भारी खर्चा
तिनेश भसीन /  July 24, 2016

अपना मुकदमा खुद लडऩे वाले उपभोक्ताओं की तादाद तेजी से घट रही है। उपभोक्ताओं के हित में काम करने वाले जहांगीर घई कहते हैं, 'करीब 15  साल पहले 95 फीसदी शिकायतें उपभोक्ता खुद अदालत के सामने रखते थे। लेकिन आज उनकी तादाद महज 2 फीसदी रह गई है।' उपभोक्ता खुद मुकदमे नहीं लड़ते हैं, इसीलिए शिकायतों की संख्या में भी खासी कमी आ गई है। वर्ष 1999 में मुंबई उपनगरीय जिला फोरम में करीब 1,500 शिकायतें दायर की गई थीं। अब यह संख्या घटकर करीब 500 रह गई है। 

 
सवाल पैदा होता है कि उपभोक्ता शिकायत दायर करने से क्यों डरते हैं? असली वजह है वक्त। शिकायत दर्ज कराने और मामला आगे बढ़ाने में बहुत समय लग जाता है और इस झंझट में पडऩे के बजाय उपभोक्ता खामोश बैठना ही पसंद करते हैं। वकीलों का कहना है कि पीठासीन अधिकारी (सेवानिवृत्त न्यायाधीश जो मामलों की सुनवाई करते हैं) नई-नई कवायद कराते रहते हैं, जो तकनीकी होती हैं और जिनका पालन करना आम आदमी के लिए मुश्किल होता है। वकील बनने से पहले अभिलाष पणिक्कर को इस समस्या का सामना पहली बार तब करना पड़ा था, जब वह एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम कर रहे थे। उन्होंने रसोई गैस एजेंसी के खिलाफ उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया और तीन बार की कोशिश के बाद वह सही से शिकायत दर्ज कर पाए। उसके बाद कागजात जमा करने में उन्हें महीनों लग गए। मगर इन दिक्कतों के बाद भी विशेषज्ञ यही मानते हैं कि अगर किसी शख्स को फोरम के सामने अपना पक्ष सही तरीके से और तथ्यों के साथ रखना आता है तो उसे अपना मुकदमा खुद ही लडऩा चाहिए। कंज्यूमर वॉयस की विधिक इकाई के प्रमुख एचके अवस्थी कहते हैं, 'अगर ज्यादा बड़ी धनराशि का मामला है और इसमें कानून का सवाल शामिल है तो किसी वकील की मदद ली जा सकती है। अन्यथा उस व्यक्ति को खुद ही अपना मुकदमा लडऩा चाहिए।'
 
खुद अपना मुकदमा लड़ें या वकील की मदद लें, इसका फैसला मामले से संबंधित धनराशि के आधार पर लेना चाहिए। अगर करोड़ों रुपये की प्रॉपर्टी का पेचीदा मामला है तो वकील कर लेना ही बढिय़ा रहेगा। लेकिन अगर किसी टीवी, फ्रिज या एयरकंडीशनर जैसे किसी उपकरण की बात है, जिसकी कीमत अधिक से अधिक 1 लाख रुपये है तो सारा काम खुद करना ही ठीक रहेगा। सबसे निचले स्तर की उपभोक्ता अदालत में भी अगर मुकदमा दो साल तक चल गया तो वकील 25,000 से 50,000 रुपये बतौर फीस ले लेंगे।
 
वकील के मामले में कुछ झंझट भी होते हैं। जनहित से जुड़े विभिन्न मामले खुद लडऩे वाले इलेक्ट्रिकल इंजीनियर गौरांग दमाणी कहते हैं कि शिकायतकर्ता को संबंधित मामले के तथ्यों के बारे में वकील से ज्यादा पता होता है। वकील एक साथ कई मुकदमे लड़ता है और हो सकता है कि आपके मुकदमे में उसे ज्यादा दिलचस्पी ही न हो। कई बार वकील अपने जूनियर को सुनवाई के लिए भेज देते हैं। हालांकि उपभोक्ता फोरम या आयोग में मुकदमा लडऩे के लिए आपकी कानूनी पृष्ठभूमि होना जरूरी नहीं है, लेकिन आपको इन बातों का पता होना चाहिए। 
 
फोरम में जाने से पहले 
 
यह पता लगाएं कि उपभोक्ता अदालत आपको उपभोक्ता मानेगी या नहीं। उपभोक्ता वह व्यक्ति है जिसने भुगतान कर माल या सेवा खरीदी हैं। यह भुगतान मौद्रिक या अमौद्रिक हो सकता है। उदाहरण के लिए अगर कोई डेवलपर आपकी जमीन लेता है और बदले में आपको तीन फ्लैट देने का वायदा करता है तो रुपये का लेनदेन नहीं होने पर भी आप उपभोक्ता ही कहलाएंगे। इसके अलावा वस्तु एवं सेवा का हर लाभार्थी अलग-अलग हर्जाने का दावा कर सकता है। उदाहरण के लिए अगर किसी परिवार को विमानन कंपनी की सही सेवाएं नहीं मिलती हैं तो हरेक सदस्य हर्जाने का अलग-अलग दावा कर सकता है। अगर आपके पास वस्तु या सेवा के लिए भुगताना साबित करने वाली रसीदें नहीं हैं और दूसरा पक्ष भी आपके भुगतान की बात से मुकर जाता है तो आप उपभोक्ता अदालत में मामला दायर नहीं कर सकते। किसी कंपनी को न्यायालय में घसीटने से पहले आपके पास इस बात का सबूत होना चाहिए कि आपने खामी दूर करने के लिए उससे संपर्क किया था। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि कंपनी को आपके पत्र या ई-मेल मिले, लेकिन उसने इन पर कार्रवाई नहीं की या उसका जवाब उचित नहीं था। पत्रों को पंजीकृत डाक या कूरियर सेवा के जरिये भेजें ताकि आपको इस बात की रसीद मिल सके कि पत्र वहां पहुंचा था। आपको समस्या के बारे में स्पष्ट शब्दों में ब्योरा देना चाहिए। इसके साथ ही बातचीत का शिष्टाचार बनाए रखें। 
 
यह भी जरूरी है कि आप दूसरे पक्ष को कानूनी नोटिस भेजें। पणिक्कर कहते हैं, 'कानूनी नोटिस का मकसद पार्टी को कदम उठाने के लिए चेतावनी देना है। लेकिन यह कंपनी को सचेत कर सकता है और आप पर पलटवार हो सकता है।' उदाहरण के लिए अगर आप किसी रियल्टी कंपनी को नोटिस भेजते हैं तो वह विवादास्पद फ्लैट को बेच सकती है। भले ही फोरम उसे हर्जाने के लिए कहे, लेकिन डेवलपर के लिए फ्लैट को बेचना फायदेमंद होता है। मामला कितनी रकम का है, इसके आधार पर हर उपभोक्ता अदालत का मामलों की सुनवाई का अधिकार होता है। 20 लाख रुपये तक की राशि के लिए आपको सबसे पहले जिला फोरम में शिकायत करनी होगी।  20 लाख रुपये से अधिक लेकिन 1 करोड़ रुपये से कम रकम के मामले में राज्य आयोग में शिकायत करनी होगी। एक करोड़ रुपये से अधिक राशि के मामले में सीधे राष्ट्रीय आयोग में शिकायत करनी चाहिए। शिकायत भुगतान के दो साल के अंदर दायर की जानी चाहिए। इससे ज्यादा समय गुजरने के बाद फोरम आपके आवेदन पर विचार नहीं करेगा। 
 
आवेदन की प्रक्रिया 
 
भले ही आप खुद शिकायत दायर करने जा रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए। इसका सबसे बेहतर विकल्प उपभोक्ता मामलों पर काम करने वाले एनजीओ से संपर्क करना है। वे अनुभवी होते हैं, उनकी फीस वाजिब होती है और वे पूरी प्रतिबद्धता से काम करते हैं। आवदेन के प्रारूप का पता करने के लिए लिपिक से संपर्क करें और उनसे हाल में दायर शिकायत की प्रति देने का आग्रह करें। मुकदमे के लिए सबसे पहले फोरम में आवेदन दाखिल करें। फिर यह सुनिश्चित करें कि आपका मुकदमा बोर्ड पर सूचीबद्ध और स्वीकार हो गया है। मामले को स्वीकार करने के बाद दूसरे पक्ष को सूचना दी जाती है। सूचना मिलने के बाद कंपनी अपना पक्ष रखती है। दोनों पक्षों को सबूत का प्रमाण पत्र देना होता है, जिसके बाद लिखित तर्क दिए जाते हैं। इसके बाद दोनों पक्षों को बहस के लिए बुलाया जाता है। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद अध्यक्ष फैसला सुनाता है। अगर आप फैसले से खुश नहीं हैं तो आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 30 दिनों के भीतर आपको राज्य उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग में शिकायत करनी होती है। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग से संपर्क करने के लिए भी यही नियम है। 
Keyword: supreme court, high court, order,,
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