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तेजी के रथ पर सरकारी शेयर?
कृष्णकांत /  July 24, 2016

सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों की अपनी समस्याएं हैं लेकिन दलाल स्ट्रीट के तेजडिय़ों और अच्छे सौदों की फिराक में रहने वाले लोगों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के शेयर अहम साबित हो सकते हैं। अगर प्राइस टू अर्निंग (पीई) यानी कंपनी की शेयर कीमत के मुकाबले प्रति शेयर कमाई का अनुपात और प्राइस टू बुक वैल्यू (पी/बीवी) यानी कंपनी के शेयर की बाजार कीमत का अनुपात देखें तो इस पैमाने पर नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में इन उपक्रमों के सूचकांक-निफ्टी पीएसई का कारोबार निफ्टी 50 सूचकांक की तुलना में आधे पर हो रहा है।

 
निफ्टी पीएसई का मौजूदा कारोबार इसके पिछले 12 महीने की कमाई के 13 गुना पर हो रहा है जो निफ्टी 50 के पिछले 23 गुना पीई गुणक से कम है। प्राइस टू बुक वैल्यू के लिहाज से भी पीएसयू के शेयर सस्ते हैं। इस समय पीएसई सूचकांक का कारोबार उसकी बुक वैल्यू के 1.76 गुणा पर हो रहा है जो निफ्टी 50 के 3.5 गुना मूल्यांकन का करीब आधा पर है। ऐतिहासिक रुप से निफ्टी पीएसई का कारोबार बेंचमार्क सूचकांक की तुलना में छूट पर होता रहा है लेकिन हाल के वर्षों में यह अंतर बढ़ा है क्योंकि आर्थिक मंदी का ज्यादा असर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के वित्त पर पड़ा है। यह विश्लेषण निफ्टी पीएसई और निफ्टी 50 के पिछले मूल्यांकन अनुपात पर आधारित है। सूचकांक के कुछ प्रमुख पीएसयू में भारत पेट्रोलियम (बीपीसीएल), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स (बीएचईएल), पावर ग्रिड, कोल इंडिया, इंजीनियर्स इंडिया, ऑयल ऐंड नैचुरल गैस कॉरपोरेशन, गेल, इंडियन ऑयल (आईओसी) और एनटीपीसी शामिल हैं। इसमें कोई बैंक शामिल नहीं है।
 
सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियां अपने शेयरधारकों को लाभांश देने में ज्यादा उदार रही हैं। मौजूदा मूल्य पर निफ्टी पीएसई में  1 लाख रुपये का निवेश करने पर हर वर्ष करीब 3,000 रुपये का लाभांश मिलेगा। निफ्टी 50 में इतना ही निवेश करने पर हर साल 1,220 रुपये का लाभांश मिलेगा। विश्लेषकों का कहना है कि इससे महंगे बाजार में भी लाभ का सौदा तलाश रहे लोगों को अच्छी खरीदारी का विकल्प मिलेगा। इक्विनॉमिक्स रिसर्च ऐंड एडवायजरी के मुख्य कार्याधिकारी जी चोक्कालिंगम कहते हैं, 'पीएसयू शेयर अब ज्यादा आकर्षक हो गए हैं क्योंकि बाजार का मूल्यांकन लगातार महंगा होता जा रहा है। इससे निवेशकों के लिए लंबी अवधि का निवेश करना मुश्किल हो गया है क्योंकि बाजार गिरने की सूरत में ऊंचे मूल्यांकन पर गिरावट का जोखिम ज्यादा होता है।'
 
मौजूदा स्तर पर निफ्टी 50 का मूल्यांकन 52 हफ्ते की ऊंचाई पर है और यह 2015 में 24 गुना पीई की अपनी कमाई से थोड़ा ही कम है। पीएसयू शेयरों के लिए आकर्षण का कारक भी अहम हो सकता है क्योंकि इनमें से ज्यादातर अपनी बुक वैल्यू (या नेटवर्थ) पर ही उपलब्ध हैं। साथ ही उनके पास अच्छा खासा नकदी भंडार भी है। चोकलिंगम का कहना है, 'पिछले साल जिंसों की कीमतों में वैश्विक गिरावट के कारण पीएसयू शेयर निगाह से उतर गए। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बैलेंसशीट से जुड़े कुछ मसले भी हैं। लेकिन ऐसे कई गैर-बैंक पीएसयू हैं जिनकी मजबूत बैलेंसशीट है और जिनके खाते में न्यूनतम या कोई कर्ज नहीं है और अच्छी-खासी नकदी है।'
 
कुछ निवेशकों ने इस संकेत को समझते हुए नकदी से भरपूर पीएसयू में दांव लगाना शुरू कर दिया है। इनमें एमओआईएल, इंजीनियर्स इंडिया और कंटेनर कॉर्प शामिल हैं। हाल की तेजी के दौरान इन शेयरों ने अपने 52 हफ्ते के निचले स्तर से 50-80 फीसदी तक की बढ़त दर्ज की है। बीपीसीएल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और आईओसी जैसी तेल मार्केटिंग कंपनियों के शेयर नई ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं। 
 
हालांकि कुछ लोग निवेशकों को यह चेतावनी भी देते हैं कि कई पीएसयू के सामने वृद्धि से जुड़ा जोखिम है। एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज में संस्थागत इक्विटी प्रमुख धनंजय सिन्हा कहते हैं, 'मिसाल के तौर पर बैंकिंग क्षेत्र में निजी क्षेत्र के खिलाड़ी सरकारी बैंकों की कीमत पर वृद्धि कर रहे हैं। इसमें बदलाव की फिलहाल कोई सूरत नजर नहीं आती है। ऐसे में निवेशक निजी क्षेत्र के बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों को तरजीह दे सकते हैं भले ही उनका मूल्यांकन महंगा हो।' साथ ही कई गैर-वित्तीय पीएसयू मसलन बीएचईएल, इंजीनियर्स इंडिया, एनएमडीसी और कंटेनर कॉर्प घरेलू औद्योगिक व्यवस्था के हालात से काफी हद तक जुड़े हुए हैं। इन हालात में जल्द बदलाव का अभी कोई  संकेत नहीं दिखता है। हालांकि अगर इसमें बदलाव हुआ तो उनकी मजबूत बैलेंसशीट और विविध उत्पादों के पोर्टफोलियो की वजह से उन्हें सबसे ज्यादा लाभ होगा।
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