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भारी कर्ज बोझ के कारण निवेश से हिचक रहा भारतीय उद्योग जगत
देव चटर्जी और राघवेंद्र कामत /  October 16, 2015

आदित्य बिड़ला समूह ने फैशन उत्पादों की बिक्री के लिए शुक्रवार को अपने ऑनलाइन पोर्टल एबॉफ डॉट कॉम की शुरुआत की। ऑनलाइन कारोबार में इतनी देर से उतरने और भारतीय उद्योग जगत द्वारा ई-कॉमर्स में ज्यादा निवेश नहीं किए जाने को लेकर आदित्य बिड़ला समूह के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला से बात की देव चटर्जी और राघवेंद्र कामत ने। पेश हैं, बातचीत के मुख्य अंश :

आदित्य बिड़ला समूह भारत की उन गिनी-चुनी कंपनियों में है, जो नई परियोजनाओं में निवेश या अधिग्रहण कर रही हैं। अन्य कंपनियां ऐसा क्यों नहीं कर रही हैं?

बहुत सी कंपनियों की बैलेेंस शीट पर काफी ज्यादा कर्ज है, जो नई परियोजनाओं में निवेश में रुकावट खड़ी करती है। कुछ अन्य वजहें भी हैं। लेकिन अच्छी खबर यह है कि आर्थिक सुधार जोर पकड़ रहा है और सरकार निवेश को बढ़ावा देने के कदम उठा रही है। उदाहरण के तौर पर वस्तु एवं सेवा कर को लें। इसके लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि इन प्रयासों का असर वास्तविक धरातल पर नजर आने में कम से कम एक साल लग सकता है।

वैश्विक स्तर पर जिंसों की कीमतों में गिरावट आ रही है और कई कंपनियों के शेयर भाव में भारी कमी आई है। जिंसों की कीमतों में गिरावट का आपके समूह पर क्या असर पड़ रहा है, खासकर हिंडाल्को और नोवेलिस को लेकर?

मेरा मानना है कि जिंसों की कीमतें निचले स्तर को छू चुकी हैं...हम संभवत: बुरे दौर को पीछे छोड़ चुके हैं। कई कंपनियां, जिनकी परिचालन लागत ज्यादा है, उन्हें ऐसी स्थिति में परिचालन जारी रखने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, कुछ को बंद भी करना पड़ा है। दुनिया भर में धातु शेयरों पर इसके असर को देखा जा सकता है, हिंडाल्को का शेयर 90 रुपये के निचले स्तर तक पहुंच गया था। स्मेल्टर्स की बात करें तो कम कीमत से लंबे समय तक परिचालन करना कठिन होता है। लेकिन जिंसों का बुरा वक्त अब खत्म हो चुका है।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म में निवेश करने की क्या वजह रही, जबकि भारत में पहले से ही कई स्थापित ई-रिटेलर मौजूद हैं?

हम निरंतर अवसरों की तलाश में रहते हैं और अर्थव्यवस्था के रुख को भांपते हैं और इसमें अपना श्रेष्ठï देने का प्र्रयास करते हैं। हम पिछले कुछ समय से ई-कॉमर्स पर विचार कर रहे थे। फैशन कारोबार में हमारी ऑफलाइन मौजूदगी अच्छी-खासी है और कंपनियों का हाल ही में व्यापक पुनर्गठन किया गया है और यही वजह रही कि ऑनलाइन फैशन पोर्टल हमारी स्वभाविक पसंद बनी। दूसरी वजह यह है कि फैशन बाजार तेजी से विकास कर रहा है और अगले पांच साल में भारत में फैशन परिधानों का कारोबार 15 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है, जिनमें 5 अरब डॉलर बिक्री ऑनलाइन हो सकती है। हमारे पास पहले से ही ट्रेंड डॉट इन नाम से वेबसाइट है, जिस पर मुद्रा और पैंटालून के उत्पादों की बिक्री होती है लेकिन एबॉफ डॉट कॉम पर उत्पादों की व्यापक रेंज उपलब्ध होगी।    

ई-कॉमर्स में देरी से आने और मिंत्रा एवं जबॉन्ग के भारी छूट के मॉडल को आप कैसे चुनौती देंगी?

मुझे नहीं लगता कि इस मैदान में एक ही खिलाड़ी पूरी बाजी मार ले जाएगा। इसमें दो या तीन कंपनियों के बीच कांटे का मुकाबला होगा और तब हम इस उद्योग में कुछ हलचल देखेंगे। लेकिन अगर मध्यम या दीर्घ अवधि में देखेंगे तो इसकी संभावना कम ही है कि ग्राहक एक ही साइट से चिपके रहेंगे। खरीदारी से पहले खरीदार हमेशा दो या तीन साइट देखता है। अभी तक ग्राहक हमेशा उत्पादों के दायरे और छूट को देखते रहे हैं। हम बहुत भारी छूट वाले मॉडल के साथ आगे नहीं बढ़ रहे हैं लेकिन हमारा जोर स्टाइल वाले पहलू पर अधिक होगा और हमारी कीमतें कुछ ज्यादा होंगी, जिन्हें हम 'वाजिब कीमतें' कहते हैं।

भारतीय ई-कॉमर्स कंपनियों में निवेश अरबों डॉलर का मूल्यांकन दर्शाता है। आपकी टिप्पणी?

स्पष्टï कहूं तो ये मूल्यांकन मेरी समझ से बाहर हैं या फिर ये जरूरत से ज्यादा बेमानी हैं। निश्चित रूप से ये मूल्यांकन वास्तविकता से परे हैं। मेरे ख्याल से एक स्तर पर सभी कारोबारों को कमाई करनी होती है। हम उम्मीद कर रहे हैं कि हमारी साइट चार से छह वर्षों में कमाई करना शुरू कर देगी। इस तरह के कारोबारों में कमाई के लिए लिए अमूमन पांच वर्षों का इंतजार करना पड़ता है।

ऑनलाइन पोर्टलों के चलते पैंटालूंस जैसे स्टोर के कारोबार पर क्या असर पड़ रहा है?

पैंटालूंस में बिक्री बढऩे पर है और हमें अभी तक ऑनलाइन बिक्री का बहुत असर देखने को नहीं मिला है। इससे ज्यादा यह मार्जिन का सवाल है। अगर आप भारी छूट की बात करते हैं तो उसे कितने समय तक कायम रख सकते हैं।

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