Saturday, Oct 25, 2014
    Archive     
                                
होम > विश्लेषण   

तेजी से बढ़ता शहरीकरण और उसका बदलता स्वरूप
एन चंद्र मोहन /  October 03, 2012

इतिहास में यह पहला मौका है जब दुनिया की 50 फीसदी से अधिक आबादी शहरों और कस्बों में निवास कर रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि भारत में यह ऐतिहासिक बदलाव कब आएगा? देश की कुल आबादी में शहरी आबादी की हिस्सेदारी एक तिहाई से भी कम है। लेकिन देश में ऐसे समाजविज्ञानी मौजूद हैं जो गंभीरतापूर्वक यह मानते हैं कि देश में शहरीकरण की दर इससे कहीं अधिक है। उन्होंने यह राय सामान्य विचारों के उलट पारंपरिक और नये आंकड़ों के विश्लेषण करके बनाई है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के मुख्य कार्याधिकारी और प्रबंध निदेशक की मानें तो भारत एक ऐसा देश है जो शहरीकरण को लेकर कतई उत्सुक नहीं है।
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च से जुड़े पार्थ मुखोपाध्याय कहते हैं कि भारत के शहरीकरण की गति धीमी तो कतई नहीं है बल्कि वह बहुत व्यापक पैमाने पर हो रहा है। हाल ही में आयोजित 'सबाल्ट्रन अर्बनाइजेशन? मूवमेंट ऑफ पीपुल, ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ स्पेसेस' नामक संगोष्ठी में उन्होंने विस्तार से बताया कि यह प्रक्रिया कैसे शहरीकरण के दो रास्तों या दो स्वरूपों के बीच तनाव को दर्शा रही है। इनमें से एक है महानगर केंद्रित जमाव जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से लोग कस्बों-शहरों का रुख कर रहे हैं। दूसरा है देश के विभिन्न स्थानों पर स्थित मौजूदा रिहाइशों के स्वरूप में आ रहा बदलाव। इस व्याख्या में देश में दूसरे दर्जे के शहरीकरण की मौजूदा स्थिति को किस तरह दर्शाया जाए?
जिसे हम सबाल्ट्रन शहरीकरण कहते हैं वह दरअसल दूसरे दर्जे का रास्ता है जिसमें उन रिहाइशों में आने वाला बदलाव शामिल है जो किसी महानगर से पूरी तरह स्वतंत्र हैं और अन्य रिहाइशी इलाकों फिर चाहे वे स्थानीय हों अथवा वैश्विक, के साथ उनका संपर्क पूरी तरह स्वायत्त है। देश में कृषि क्षेत्र से परे होकर सेवा और उद्योग की ओर बढ़ते रुझान को देश में शहरीकरण की प्रक्रिया में भी साफ देखा जा सकता है। अब बड़ी कंपनियां और संस्थाएं बड़े शहरों और महानगरों को ही अपना कार्य क्षेत्र बना रही हैं। हालांकि देश में जनसंख्या के आधार पर बढ़ते कस्बों में भी शहरीकरण के दौर को देखा जा सकता है। दरअसल जो रिहाइशी इलाके जनगणना में तय तीन मानकों पर खरे उतरते हैं उनको कस्बों का दर्जा दे दिया जाता है।
इन मानकों के मुताबिक किसी गांव को तब कस्बे का दर्जा दे दिया जाता है जब उसकी आबादी 5 हजार से अधिक हो, जनसंख्या का घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 400 से ज्यादा हो और उसकी 75 फीसदी से अधिक पुरुष आबादी कृषि कार्यों से इतर दूसरे काम करती हो। ऐसी रिहाइशों के कस्बे में बदलाव को यथावत शहरीकरण कहा जाता है। ऐसे पुनर्वर्गीकरण के चलते ही वर्ष 2001-2011 के बीच ऐसे 2,532 नए कस्बे अस्तित्व में आए। इस तरह इस अवधि में शहरीकरण का विकास 30 फीसदी की दर से हुआ (देखें सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च द्वारा प्रकाशित कान्हू चरण प्रधान का प्रपत्र 2 'अनएकनॉलेज्ड अर्बनाइजेशन: द न्यू सेंसस टाउन्स ऑफ इंडिया')।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन कस्बों में से 1,625 तो वर्ष 2001 में ही उक्त तीन मानकों को पूरा कर रहे थे। जाहिर है 2011 में इनकी संख्या और बढ़ी होगी। यह शहरीकरण में हुए इजाफे का ही प्रतीक है। प्रपत्र में प्रधान का तर्क है, 'निश्चित तौर पर ऐसा प्रतीत होगा कि संभवत: इन दोनों सालों में शहरीकरण की प्रक्रिया को कम करके आंका गया हो। उन 1625 बस्तियों की तत्कालीन आबादी में वर्ष 2011 तक 1.87 करोड़ की जनसंख्या और जुड़ चुकी होगी और इस तरह वहां शहरीकरण की दर 1.8 फीसदी से बढ़कर 29.6 फीसदी हो जाएगी। ऐसे में यह माना जा सकता है इससे शहरीकरण के आंकड़ों में इजाफा ही होगा।' ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एक ओर जहां ऐसे अनेक कस्बे बड़े महानगरों के इर्दगिर्द बसे हुए हैं वहीं इनमें से तीन चौथाई से ज्यादा कस्बे बड़े शहरों की निकटता से खासी दूरी पर स्थित हैं। ऐसे रिहाइश कस्बों में स्वत: रूपांतरण की प्रक्रिया बहुत तेज गति से आकार ले रही है। एरिक डेनिस और मैरी-हेलेन जेराह के साथ लिखे गए एक संयुक्त पत्र में मुखोपाध्याय कहते हैं, 'द्वितीयक शहरीकरण के परिणामस्वरूप बड़े शहरों की छाया से दूर छोटी रिहाइशें नजर आनी चाहिए। इससे ऐसे शहरीकरण का संकेत मिलता है जो व्यापक पैमाने पर अंजाम ले रहा है और जो आथर््िाक रूप से तथा अन्य तरीकों से आत्मनिर्भर है।' यह पत्र इकनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित हुआ है।
आज के अनेक बड़े कस्बे अतीत में अपेक्षाकृत छोटे रहे हैं। वर्ष 1961 के दशक के तकरीबन 430 कस्बों में से 43 अगले 50 सालों तक 4.7 फीसदी की सालाना विकास दर के साथ विकसित हुए हैं। इनमें से अनेक को जहां महानगर कहा जा सकता है वहीं 10 ऐसे शहर भी हैं जो इस श्रेणी से बाहर हैं- महाराष्ट्र में नासिक, भिवंडी और औरंगाबाद,आंध्र प्रदेश में मीरयालागुडा, उत्तराखंड में रुद्रपुर, गुजरात में सूरत और वापी, उत्तर प्रदेश में अकबरपुर, बिहार में सहरसा और झारखंड में धनबाद ऐसे ही शहर हैं।
ये 10 शहर स्वाभाविक तौर पर अधिक गहन अध्ययन की मांग करते हैं। इस अध्ययन से यह पता लगाया जा सकता है कि क्या ये द्वितीयक अथवा अधीनस्थ शहरीकरण के दायरे में आते हैं। भिवंडी को करघा उद्योग के लिए जाना जाता है। यह मुंबई और अहमदाबाद में बड़ी कपड़ा मिलों के बंद होने के बाद फला-फूला। मीरयालागुड़ा चावल उत्पादन वाला कस्बा है। धनबाद का विकास कोयला उद्योग और माफिया पर निर्भर है जो संसाधनों का दोहन करने में लगे हुए हैं। ऐसे तमाम शहरों का विकास यह दिखाता है कि कैसे बड़े महानगरों से परे बड़े पैमाने पर ऐसे शहर आकार ले रहे हैं।
शहरीकरण का यह स्वरूप निरंतर विकसित हो रहा है। इस समय यह देश के जिन इलाकों में फलफूल रहा है उनमें हिमाचल प्रदेश के कुल्लू और शम्सी, कर्नाटक का उडुपी, तमिलनाडु के वेल्लोर में चमड़े के काम वाले इलाके और सेलम के तिरुचेनगोडे और नमक्कल आदि कस्बे शामिल हैं। इस संबध में मुखोपाध्याय समेत कई विद्वान मिलकर एक व्यापक अध्ययन को अंजाम दे रहे हैं जिसकी मदद से भारत में तेजी से हो रहे शहरीकरण तथा उसमें शामिल ऐसे कस्बों को अधिक बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।

  
New Document
  
श्रमिक पंजीकरण नहीं करेंगे स्वयंसेवी संगठन
बाजार बढ़त के साथ बंद, सेंसेक्स ने मारी 390 अंकों की बड़ी पारी
कोयला, यूरेनियम व दुर्लभ धातुओं में निवेश का न्यौता
भारतीय उद्योगों को मिला अलीबाबा का साथ
खुदरा को थोक नतीजे का इंतजार
  
शिव सेना के अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी हैं बदलाव
इंटरनेट का जाल बना निजता के लिए जंजाल
कथनी और करनी
शासन में चीन की कार्यशैली अपनाएंगे नरेंद्र मोदी?
सरकारी बैंकों की कौन करेगा चौकीदारी?
ज्यादा की जरूरत
वही ढाक के पुराने पात, बात से कहां आगे बढ़ी बात?
चुनाव में जीत का पैगाम और उम्मीदों का आसमान
 
  
क्या ई-कॉमर्स को नियमन के दायरे में लाने से होगा फयदा?
हां
नहीं
ABOUT US PARTNER WITH US JOBS@BS ADVERTISE WITH US TERMS & CONDITIONS CONTACT US
Business Standard Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com

Site best viewed with IE 6.0 or higher, Firefox 2.0 & above at a minimum screen resolution of 1024 x 768 pixels on Windows XP or Windows Vista operating system.