| याद किए जाएंगे तरुण | | हफ्ते की शख्सियत : तरुण दास, पूर्व मुख्य परामर्शदाता, सीआईआई | | | ए.के. भट्टाचार्य / November 06, 2009 | | | | |
तरुण दास ने इस हफ्ते भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) को आखिरी सलाम कह ही दिया।
इतिहास हमेशा उन्हें एक ऐसे शख्स के रूप में याद रखेगा, जिसने एक संस्थान को गुमनामी की खाक से उठाकर आसमान की बुलंदियों तक पहुंचा दिया। उन्होंने यह करिश्मा एक ऐसे मुल्क में कर दिखाया, जहां ऐसे संस्थान ताकतवर और स्वार्थी लोगों के खिलौनों का रूप लेने के बाद गुमशुदा से होकर रह जाते हैं।
इस कहानी शुरुआत हुई थी करीब 35 साल पहले, जब तीसेक साल के दास ने अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले दो संस्थानों को जोड़ने में मदद की। इन दोनों संस्थानों का दफ्तर कलकत्ता (तब इस शहर को इसी नाम से जाना जाता था) में था। इनमें से एक संस्थान बड़ी इंजीनियरिंग कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता था, जिनमें कई ब्रिटिश कंपनियां भी शामिल थीं।
वहीं, दूसरी संस्था देसी छोटी और मझोली इंजीनियरिंग कंपनियों का संगठन थी। हालांकि, यह अंतर मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से डिग्री हासिल करके लौटे दास को हिला नहीं पाया। इस वजह से अप्रैल, 1974 में एक नई संस्था का जन्म हुआ, जिसका नाम था एसोसिएशन ऑफ इंडियन इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज (एआईईआई)। दास ने इस संगठन के मुखिया की जिम्मेदारी संभाली।
अध्यक्ष के तौर पर दास के सबसे पहले फैसलों में एक था, इस संस्था के मुख्यालय को दिल्ली लेकर आना। इस फैसले के पीछे उनका सपना था, इस संस्था को देश का सबसे प्रभावशाली उद्योग संगठन बनाने का। दास इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि अगर यह संस्था कलकत्ता तक सीमित रही तो उनका यह सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा।
1970 के दशक में दिल्ली तरह-तरह की राजनीतिक मुश्किलों से जूझ रही थी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के अंदर राजनीतिक विरोध को कुचलने के लिए आपतकाल का ऐलान कर दिया था। उनकी आर्थिक नीतियों की वजह से मुल्क में लाइसेंस राज और संरक्षणवाद फैल चुका था।
वैसे, 1970 का दशक आर्थिक सुधारों के लिए बिल्कुल सही वक्त था, लेकिन तब देश के दो सबसे बड़े औद्योगिक संगठनों, फिक्की और एसोचैम ने इनकी मांग करना सही नहीं समझा। अगर उन्होंने मंत्रियों और राजनेताओं के साथ लॉबिंग करके नीतियों में बदलाव लाया भी तो उसका असर उद्योग जगत के कुछ खास तबकों तक ही सीमित रहा।
नीतियों को पारदर्शी और सुधारवादी बनाने की मांग अब भी उनके एजेंडा में शामिल नहीं थी। दास ने इस जरूरत को बहुत ही जल्द महसूस कर लिया। उन्होंने समझ लिया था कि इंजीनियरिंग कंपनियों की एक छोटी संस्था होने के बावजूद एआईईआई सुधारों और पारदर्शी आर्थिक नीतियों की मांग करके अपने लिए अहम मुकाम हासिल कर सकती है।
इस सफर में उनके हमसफर अर्थव्यवस्था के साथ मुख्य रूप से जुड़े मंत्रालयों के कई नौकरशाह थे, जिन्होंने 1990 के दशक में अहम कुर्सियां संभालीं। इनके अलावा, उनके साथ राहुल बजाज, एन. कल्याणी और जमेशद गोदरेज जैसे अहम उद्योगपतियों का छोटा, लेकिन प्रभावशाली समूह भी था।
दास को राजनीतिक लॉबिंग के जरिये आर्थिक नीतियों को प्रभावित करने की बात समझने में थोड़ा वक्त जरूर लगा। उन्हें कुछ समझौते भी करने पड़े। लेकिन जल्दी ही उन्होंने अपने पेशेवर तरीके से अपने और अपनी संस्था के लिए एक अहम स्थान बना लिया।
उन्होंने आर्थिक नीतियों को प्रभावित करने के लिए नौकरशाही के साथ मिलकर काम किया, जबकि फिक्की और एसोचैम ने मंत्रियों के साथ रहना पसंद किया। फिर आया साल 1985। इसी साल देश को राजीव गांधी के रूप में अपना पहला युवा प्रधानमंत्री मिला। इसे दास ने अपने कदम बढ़ाने के लिए के मौके के रूप में देखा।
एआईईआई के अहम सदस्य राजीव गांधी के करीबियों में शामिल थे। वहीं फिक्की नए प्रधानमंत्री पर डोरे डालने में जुटा हुआ था। एक साल के भीतर ही एआईईआई ने अपना नाम बदलकर इंजीनियरिंग उद्योग परिसंघ (सीईआई) रख लिया, ताकि वह विनिर्माण सेक्टर में खुद को एक अहम भूमिका में पेश कर सके।
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