| वादे हैं सुहाने पर बिजली कैसे मिलेगी राम जाने! | | बीएस संवाददाता / लखनऊ November 06, 2009 | | | | |
उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए बुरी खबर है कि उन्हें आने अगले एक दशक में भी बिजली संकट से निजात नहीं मिलने वाली।
प्रदेश में भले ही विद्युत संकट को दूर करने के लिए कई परियोजनाएं शुरू की जा रही हो लेकिन मांग और आपूर्ति के बीच का फासला पाटना बहुत ही मुश्किल है। उत्तर प्रदेश विद्युत कॉरपोरशन लिमिटेड के सूत्रों के मुताबिक, ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के समाप्त होने पर वर्ष 2012 में इस मांग के 34 हजार मेगावॉट के करीब होने की उम्मीद है।
जबकि वर्ष 2012 में केन्द्रीय पूल से मिल रही राज्य के हिस्से की बिजली के साथ ही सभी मिलने वाले स्रोतों को जोड़ लें तो भी केवल 12 हजार 433 मेगावॉट बिजली ही प्रदेश को मिल पाएगी। ऐसे में मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर करीब 21 हजार मेगावॉट का होगा।
यही नहीं, बारहवी पंचवर्षीय योजना जो कि वर्ष 2017 में समाप्त होगी, के अंत तक मांग और आपूर्ति का यह अंतर और बढ़ जाएगा। वर्ष 2017 में प्रदेश में बिजली की अनुमानित मांग 47 हजार 563 मेगावॉट होगी। इसके सापेक्ष अनुमानित आपूर्ति 20 हजार 831 मेगावॉट होगी। यानी उस समय भी मांग और आपूर्ति के बीच 26 हजार 732 मेगावॉट का बड़ा अंतर होगा।
हालांकि पिछले दिनों प्रदेश सरकार ने राज्य में कुछ तापीय विद्युत गृहों की स्थापना के लिए निविदाएं निकाली हैं। लेकिन प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में लगने वाले इन विद्युत गृहों की कुल क्षमता 9 हजार 840 मेगावॉट ही है। इसको भी अगर प्रदेश की मौजूदा उपलब्ध बिजली में जोड दें तो भी प्रदेश के पास कुल 18 हजार 780 मेगावॉट बिजली ही उपलब्ध हो पाएगी।
वर्तमान में प्रदेश में सभी स्रोतों से मिलने वाली बिजली को मिलाकर कुल उपलब्ध बिजली कुल 8 हजार 940 मेगावॉट ही है। गौरतलब है कि इस समय प्रदेश में तापीय विद्युत गृहों से करीब ढाई से तीन हजार मेगावॉट बिजली ही मिल रही है जबकि इसकी क्षमता करीब चार हजार मेगावॉट की है।
वर्तमान में प्रदेश में बिजली की मांग दस हजार मेगावॉट से ऊपर है। मांग और आपूर्ति के बीच के फासले को कटौती और केन्द्र तथा अन्य राज्यों से बिजली आयात करके पूरा किया जा रहा है।
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