| सेबी का नया प्रस्ताव निवेशकों के लिए है महत्वपूर्ण | | तिनेश भसीन / November 04, 2009 | | | | |
कारोबारी और डीमैट अकाउंट खोलने के छह महीने बाद पवन सेठ यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि उनके खाते में लगभग 60 प्रतिशत राशि कम है।
जब उन्होंने इस बारे में पूछताछ की तो प्रता चला कि उनके बदले सब-ब्रोकर कारोबार कर रहा था और इस सिलसिले में हानि हुई थी। जब उन्होंने ब्रोकर के खिलाफ शिकायत की तो उन्हें बताया गया कि सब-ब्रोकर को पावर ऑफ अटॉर्नी दी गई है और वह बिना उनकी अनुमति के खाते का परिचालन कर सकता है।
यह उस 60 पृष्ठ के दस्तावेज (ग्राहक-ब्रोकर समझौता पत्र)का एक हिस्सा था जिस पर उन्होंने हस्ताक्षर किए थे। ब्रोकरेज से जुड़े एक अधिकारी ने बताया, 'यह एक आम प्रक्रिया है जिसे फ्रैंचाइजी और सब-ब्रोकर अपनाते हैं। ब्रोकरेज की अर्जित राशि पर उन्हें कमीशन प्राप्त होता है। इसलिए वे ग्राहक के खातों का परिचालन करते हैं और प्राय: नियमित तौर पर कारोबार करते हैं। कई बार इसकी जानकारी ग्राहकों को भी नहीं होती है।'
यही वजह है कि स्टॉक एक्सचेंजों और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के पास ब्रोकर और ग्राहकों से संबंधित विवादों की भरमार है। ऐसे विवाद पावर ऑफ अटॉर्नी के बेजा इस्तेमाल की वजह से उत्पन्न हुए हैं। काफी पहले बाजार नियामक ने स्टॉक एक्सचेंजों से कहा था कि वे अपनी वेबसाइट पर ग्राहक-ब्रोकर विवादों को प्रदर्शित करें।
अब वे इससे आगे बढ़ चुके हैं। मंगलवार को सेबी ने प्रस्ताव दिया कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी को कुछ चीजों तक सीमित की जानी चाहिए। इसमें ब्रोकर, जिसके साथ ग्राहक का खाता है, द्वारा किया जाने वाला शेयर और धन का अंतरण शामिल है। ब्रोकर ग्राहक के धन या शेयरों का अंतरण समूह की किसी अन्य कंपनी को नहीं कर सकता।
सेबी ने यह भी सुझाया है कि ग्राहक के ब्रोकिंग, डीमैट और बैंकिंग खाते के प्रत्येक लेन-देन के लिए ब्रोकर को एसएमएस के माध्यम से सूचित करना चाहिए। सेबी ने कहा कि ब्रोकर को पावर ऑफ अटॉनी की वास्तविक या सत्यापित प्रतिलिपि ग्राहकों को भेजना चाहिए। लेकिन अभी ये सब प्रस्ताव के चरण में हैं। अभी बाजार नियामक ने इस प्रस्ताव पर सुझाव मंगाए हैं।
इंडिया इन्फोलाइन में अनुपालन प्रमुख आर मोहन ने बताया, 'अभी तक ऐसे कोई दिशानिर्देश नहीं थे क्योंकि इस तरह के नियम व्यवसाय का एक हिस्सा होगा। पहली बार है जब सेबी ने नियमों के मानकीकरण का प्रयास किया है जिसे ब्रोकर को पॉवर ऑफ अटॉर्नी प्राप्त करते समय मानना होगा।'
बंबई स्टॉक एक्सचेंज ने हाल ही में एक विज्ञापन के जरिए बताया था ग्राहकों को सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि पावर ऑफ अटॉर्नी सीमित कार्यों के लिए दिए जा रहे हैं। लेकिन समस्या बढ़ती गई। अधिकांश लोग इस बात से अनभिज्ञ होते हैं कि वे पावर ऑफ अटॉर्नी पर हस्ताक्षर कर रहे हैंञ सेंट्रम ब्रोकिंग में अनुपालन प्रमुख प्रवीण मलिक ने कहा, 'कुछ ब्रोकरों के साथ कारोबारी और डीमैट खाता खुलवाने के मामले में ग्राहकों को 60 से अधिक जबहों पर हस्ताक्षर करने होते हैं।'
किसी नियम के अभाव में प्रत्येक ब्रोकर के पावर ऑफ अटॉर्नी की अपनी शर्तें होती है और वे उन्हीं के पक्ष में होती हैं। कुछ मामलों में तो पावर ऑफ अटॉर्नी ग्राहकों के बदले ब्रोकर को खाता खोलने या बंद करने के बाद कारोबार करने की अनुमति देता है। ब्रोकर के साथ होने वाले विवादों से बचने के लिए कोई व्यक्ति कुछ उपाय जरूर कर सकता है। सबसे पहले तो निवेशकों को यह समझना चाहिए कि पावर ऑफ अटॉर्नी कोई अनिवार्य दस्तावेज नहीं है।
मोहन ने कहा, 'ग्राहक पॉवर ऑफ अटॉर्नी समझौते के लिए बाध्य नहीं हैं।' लेकिन एक ब्रोकर तब तक आवेदन पर विचार नहीं करता जब तक ग्राहक पावर ऑफ अटॉर्नी पर हस्ताक्षर नहीं करते। इसके अतिरिक्त ग्राहक-ब्रोकर समझौते की शर्तों के मुताबिक विलंबित भुगतान की दशा में ब्रोकर खाते को फ्रीज भी कर सकता है।
आपको पावर ऑफ अटॉर्नी के नियम एवं शर्तों को पूरी तरह पढ़ना चाहिए और यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि क्या ब्रोकर भी आपके खाते का परिचालन कर सकता है। अगर आप नियम एवं शर्तों से संतुष्ट हैं तभी हस्ताक्षर करें। अगर आप ब्रोकर, सब-ब्रोकर या फ्रैचाइजी को अपने बदले खाता परिचालित करने के लिए अधिकृत करते हैं तो उस बैंक और कारोबारी खाते का उल्लेख करें जिनके माध्यम से ये मध्यस्थ परिचालन कर सकते हैं।
अंत में सबसे बड़ी बात यह है कि फॉर्म भरने के बाद उसकी एक प्रतिलिपि अपने पास रख लें। इसके अतिरिक्त अपने ब्रोकर से पावर ऑफ अटॉर्नी की असली या सत्यापित प्रतिलिपि अवश्य ले लें।
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