| आईटी पर फिर शुरू हुई सौदों की बारिश | | शिवानी शिंदे / मुंबई November 03, 2009 | | | | |
साल भर की सुस्ती के बाद देसी आईटी कंपनियां अपने पूरे फॉर्म में वापस आ गई हैं। इस बात का सबूत है, उन पर हो रही ऑर्डरों की बारिश।
हालांकि, इनमें से कई सौदे बीते सालों से कम कीमत पर हो रहे हैं, लेकिन विश्लेषकों की मानें तो कीमतों में अब स्थिरता आ रही है। मिसाल के तौर पर एचसीएल टेक्नोलॉजिज को ही ले लीजिए। साल की पहली छमाही में ही कंपनी को 10 करोड़ डॉलर से ज्यादा कीमत वाले तीन बड़े सौदे मिल चुके हैं।
विप्रो टेक्नोलॉजिज को बीजे होलसेल क्लब से पांच साल का एक डाटा सेंटर और एप्लीकेशन मैनेजमेंट का ठेका मिल चुका है। विप्रो की इन्फोक्रॉसिंग को पेट्रोलियम उत्पादों की नामी निर्माता और विक्रेता सुनोको के साथ अपनी साझेदारी को 3.4 करोड़ डॉलर में बढ़ा चुकी है।
बीते महीने टीसीएस, इन्फोसिस और विप्रो को ब्रिटेन की दिग्गज पेट्रोलियम कंपनी, बीपी के 1.5 अरब डॉलर के ऑउटसोर्सिंग सौदे में जगह मिली थी। सौदों की बारिश का एक सबूत तीसरी तिमाही के लिए जारी किए गए ग्लोबल टीपीआई इंडेक्स के आंकड़े भी हैं। यह इंडेक्स 2.5 करोड़ डॉलर या इससे ज्यादा बड़े सौदों पर नजर रखती है।
तीसरी तिमाही में ग्लोबल टीपीआई इंडेक्स में 139 सौदे दर्ज किए गए, जिनकी कुल कीमत 24.7 अरब डॉलर थी। यह 2008 की आखिरी तिमाही के बाद सबसे बड़ा आंकड़ा है। इस साल की दूसरी तिमाही के मुकाबले तीसरी तिमाही के आंकड़े 21 फीसदी का मोटा-ताजा इजाफा दिखलाते हैं। वहीं, बीते साल की तीसरी तिमाही के मुकाबले यह आंकड़े पूरे 40 फीसदी का इजाफा दिखलाते हैं।
एक रिपोर्ट का कहना है कि बड़े सौदों में एक बेहतर तस्वीर उभर कर आ सकती है। यहां बड़े सौदों का ताल्लुक एक अरब डॉलर या इससे बड़े सौदों से है। बड़े सौदे की कुल कीमत तीसरी तिमाही में बढ़कर 13.7 अरब डॉलर तक पहुंच गई। यह 2002 की आखिरी तिमाही के बाद सबसे बड़े आंकड़े हैं।
टेलीकॉम कंपनियों द्वारा टेलीकॉम कंपनियों को दिए गए सौदों को छोड़ दें तो इस तिमाही में चार मेगा सौदों पर दस्तखत किए गए। यह बीती तीन तिमाहियों के बराबर आंकड़े हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस साल में अब तक 11 मेगा डील हुए हैं, जो हालिया सालों के बराबर ही हैं। हालांकि, इनकी कुल कीमत 19 अरब डॉलर का है, जो 2005 के बाद का उच्चतम है।
टीपीआई ग्लोबल रिसोर्सेज मैनेजमेंट के साझेदार और अध्यक्ष मार्क मेयो ने बताया कि, 'हमारा रोजना का आकलन दिखलाता है कि मंदी के दौर में कई कंपनियों ने अपनी मांग पर लगाम कस दी थी। इसलिए अब हमें इजाफा देखने को मिल रहा है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अगले छह से नौ महीनों के दौर में बाजार अपना इजाफा जारी रख सकता है।'
उनकी बात से टीपीआई में साझेदार और प्रबंध निदेशक सिध्दार्थ पाई भी इत्तेफाक रखते हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, 'इजाफा अभी तो दिखाई दे रहा है, लेकिन कितनी जल्दी ये सौदों का रूप अख्तियार करते हैं ये देखने वाली बात होगी।' कई विलेश्षकों का भी कहना है कि जून से पहले हुए सौदे कम कीमत पर हुए थे।
एक विश्लेषक ने नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा कि, 'सौदों की कीमतें तो जरूर गिरी हैं। कीमतें 10-15 फीसदी के स्तर तक गिरी थीं, लेकिन यह काफी पहले हुआ था। साथ ही, जो भी खर्च करने का फैसला करता था, उसे कंपनियां मोलभाव का मौका दे रही थीं। जब कई कंपनियां इस रेस में शामिल हों, तो ऐसा होना तो स्वाभाविक ही है।'
थोलॉन्स एडवाइजरी में साझेदार सव्यसाची सतपती ने बताया कि, 'सुधार तो अब हो रहा है, बीते 10 महीने या इससे पहले के वक्त में दुनिया की टॉप 1000 कंपनियों की नजर कीमत पर थी। इसलिए ऐसा होना तो लाजिमी ही था। लेकिन अब कंपनियों का फोकस अपनी सेवाओं की लागत में का पूरा इस्तेमाल करना हो गया है।' उनका यह भी मानना है कि कीमतें मौजूदा रेंज में ही रहेंगी, लेकिन कई सेक्टर ऐसे हैं जहां कीमतों में इजाफा देखने को मिल सकता है।
|