| पहले दोस्त, बाद में नियामक : एमसीए | | अपने फैसलों के दौरान मंत्रालय तथ्यों पर देगा ध्यान, कंपनी रजिस्ट्रार की बढ़ाई जाएंगी शक्तियां | | | अनिंदिता डे / मुंबई November 03, 2009 | | | | |
कंपनी मामलों के मंत्रालय (एमसीए) अपनी कठोर नियामक की छवि को खत्म कर, उदार और कॉर्पोरेट-अनुकूल छवि अपनाना चाहता है।
मंत्रालय का नया मंत्र- कॉर्पोरेट विकास की राह में एक और नियामक बनने के बजाय मददगार की भूमिका निभाना है। इस मंत्र को अब अपनी गतिविधियों में भी शामिल किया जा रहा है। मिसाल के तौर पर फैसलों में मंत्रालय तथ्यों पर अब और अधिक ध्यान देगा।
एमसीए ने फैसला किया है कि क्षेत्र अधिकारी कंपनी की बैलेंस शीट की छानबीन नहीं करेंगे या अपने निजी निर्णयों या बाहरी सुझावों के आधार पर नोटिस नहीं भेजेंगे। सभी कंपनियों के पिछले आंकड़ों के आधार पर एक सॉफ्टवेयर आधारित केंद्रीय जोखिम आकलन टूल में छानबीन के संकेतों को एकत्र किया जाएगा।
कंपनी रजिस्ट्रार को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने रिकॉर्डों में इस तरह के संकेतों पर नजर बनाएं। एसीए के शीर्ष सूत्रों का कहना है कि कंपनी को नोटिस या उससे पूछताछ सिर्फ तभी शुरू की जा सकेगी जब कंपनी के खिलाफ प्रथम दृष्टया प्रमाण होंगे। यह इसलिए किया जा रहा है कि बेवजह किसी को परेशान या उसके मान को ठेस न पहुंचाई जाए।
किसी भी पूछताछ से पहले 'आग्रह पत्र' कंपनी को भेजा जाएगा। ऐसे में अगर जरूरत लगती है तो बाद में नोटिस भेजे जाएंगे, लेकिन मंत्रालय की मंशा कंपनियों को आराम पहुंचाना है, न कि कंपनियों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई करने की और मंत्रालय का प्राकृतिक न्याय के सिध्दांत में विश्वास है, जिसमें आरोपी को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का पूरा मौका दिया जाएगा।
कंपनी रजिस्ट्रार को कंपनियों की तरफ से किसी भी तरह के मौद्रिक या आर्थिक उल्लंघन के लिए शुल्क लगाने की शक्ति भी दी जाएगी। यह कुछ विदेशी मुद्रा विनिमय प्रबंधन नियम के उल्लंघन केक लिए भारतीय रिजर्व बैंक के पास शक्तियां हैं या फिर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड की शक्तियों के जैसे ही है, जिसमें बोर्ड के पास बाजार अनियमितताओं के मामले में अपनी मंजूरी या न मंजूरी का पूरा हक है।
हालांकि जहां इसे कंपनी विधेयक 2008 में दिया गया है, वहीं मंत्रालय दिशा-निर्देशिका तैयार कर रहा है, ताकि विवेकपूर्ण तरीके से इन शक्तियों का इस्तेमाल हो सके। मौजूदा प्रक्रिया के मुकाबले यह बहुत बड़ा अंतर है।
यहां तक कि तकनीकी भूल-चूक के लिए भी कंपनी रजिस्ट्रार को कंपनी के खिलाफ अभियोग को पहले दायर करना होगा, जिसके बाद कंपनी अदालत से जमानत की मांग कर सकती है। यह पूरा मामला अदालती कार्यवाही पर निर्भर है, जिसमें काफी वक्त लगता है।
इसी तरह कंपनी की तकनीकी छानबीन के लिए किसी बाहरी पेशेवर को बुलाने से पहले बैलेंस शीट की कड़ा परिश्रम करवाना होगा। हाल पहले मंत्रालय ने सूचीबध्द और गैर-सूचीबध्द कंपनियों की ऑडिट का काम बाहरी पेशेवरों को देने का फैसला किया है।
इसके अलावा, विभाग के क्षेत्र गठन को निर्देश दिए गए हैं कि वे कंपनियों की ओर से लिस्टिंग को प्रोत्साहन देने के लिए निवेशक जागरुकता, कुशल पंजीकरण संबंधी सेवाओं को मुहैया कराने और कंपनी नियम, कानूनों में पारदर्शिता मुहैया कराने के लिए सेमिनार और कार्यक्रमों का आयोजन करे।
देशभर में मंत्रालय के दफ्तरों को कंपनी की बैलेंस शीट को जमा कराने की तिथि को विज्ञापनों के जरिये बताने को भी कहा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य कंपनी बिल प्रावधानों से संबंधित अनुपालन को सुनिश्चित करना है।
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