| अधर में कि एक अप्रैल से! | | जीएसटी की पट्टी | | | राजीव कुमार / November 02, 2009 | | | | |
कारोबारी 1 अप्रैल, 2010 से वस्तु एवं सेवा कर के लागू होने पर संदेह जाहिर कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जीएसटी का हाल भी कहीं वैट की तरह न हो जाए।
वैट लागू करने में सरकार को कई साल लग गए थे। बावजूद उसमें कोई एकरूपता नहीं रह गई और कर प्रणाली को भी सरल नहीं बनाया जा सका। उनका कहना है कि जीएसटी का रोडमैप उजागर किए बगैर और उस पर कारोबारियों की राय के बिना इसे लागू करना न तो संभव है और न ही उचित।
केंद्र सरकार भी अब यह कहने लगी है कि अप्रत्यक्ष कर प्रणाली की इस नई व्यवस्था को लागू करने में विलंब हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। इस प्रणाली को लेकर अभी राज्यों के बीच भी आपसी सहमित नहीं बन पाई है।
मध्य प्रदेश एवं गुजरात ने अभी हाल में कहा है कि जीएसटी लागू करने में जल्दबाजी करने का कोई मतलब नहीं है। गौरतलब है कि दो साल पहले के बजट में केंद्र सरकार ने ऐलान किया था कि 1 अप्रैल, 2010 से जीएसटी प्रणाली लागू हो जाएगी। पर अभी तक इससे जुड़ा कोई मसौदा तक नहीं सौंपा गया।
अब कहा जा रहा है कि जीएसटी से जुड़ी अधिकार प्राप्त समिति अगले सप्ताह केंद्र को पहला मसौदा सौंपेगी। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को जीएसटी पर पहला परिचर्चा पत्र 10 नवंबर को सौंपा जाएगा। इसके बाद इस पर जनता की राय मांगी जाएगी।
पिछले सप्ताह वित्त मंत्री ने कहा था कि वे जीएसटी से जुड़ी समय सीमा का पालन करने का पूरा प्रयास कर रहे हैं लेकिन उन्हें कोई हैरानी नहीं होगी, यदि इसे लागू करने में कुछ माह का विलंब हो जाए। कारोबारी कहते हैं कि सौंपे जाने वाले मसौदे में न तो यह बताया जाएगा कि किन-किन वस्तुओं पर जीएसटी लगेगा और न ही इसका खुलासा होगा कि आवश्यक व गैर आवश्यक वस्तुओं पर इसकी दर क्या और कितनी होगी।
ऐसे में सरकार किन चीजों पर जनता से राय लेगी, यह तो मसौदा पेश होने के बाद ही पता चल पाएगा। जानकारों के मुताबिक वैट लागू करने के दौरान ही जीएसटी की परिकल्पना कर ली गई थी। वैसे वित्तीय सुधार को लेकर बनाई गई केलकर कमेटी ने जीएसटी की सिफारिश की थी। इस समिति के अध्यक्ष डॉ. विजय केलकर एवं उनकी टीम ने एकल जीएसटी की बात की।
लेकिन अब इसे दोहरे स्तर पर लागू करने का फैसला किया गया है। व्यापारी वर्ग पहले से ही तय समय पर जीएसटी लागू होने पर संदेह व्यक्त कर रहा था। कारोबारियों का कहना है कि सरकार अगर जल्दी में यानी बिना व्यापारियों की आम राय के यह प्रणाली लागू करती है तो इसका असर सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
सरकार को कम से कम 6-9 माह का समय जीएसटी प्रणाली पर आम चर्चा के लिए रखना होगा। ऐसे में जीएसटी का 1 अप्रैल, 2010 से लागू होना फिलहाल मुमकिन नहीं दिख रहा है। व्यापारी बताते हैं कि वैट लागू करने के दौरान कई मुश्किलें आईं थीं।
वर्ष 19991-92 के दौरान वैट की चर्चा शुरू हो गई थी, लेकिन उसे लागू होने में 10 साल से अधिक का वक्त लग गया। वे कहते हैं कि इस बार भी अभी से कर मुक्त वस्तुओं की सूची को लेकर संशय की स्थिति बन गई है क्योंकि कोई जरूरी नहीं है कि जिन वस्तुओं को गुजरात में कर मुक्त रखा जाए, वे ही वस्तुएं हो सकता है कि आंध्र प्रदेश में कर मुक्त हों।
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