| कंपनियों का सही विश्लेषण प्रतिफल में ला सकता है बड़ा अंतर | | आपका निवेश | | | अर्णव पंडया / November 02, 2009 | | | | |
किसी भी निवेशक के लिए वित्तीय परिणामों को समझना बेहद जरूरी है। इससे पता चलता है कि क्या चल रहा है और आगे जाकर कंपनी की योजनाओं का शेयरों की कीमत पर क्या असर पड़ेगा।
यह बात ध्यान रखनी बेहद जरूरी है कि परिणामों को देखते समय कई बातों पर गौर किया जाना चाहिए। निवेश करने का फैसला काफी हद तक वैध बुनियादी बातों पर निर्भर होता है। कुछ ऐसी ही ध्यान देने योग्य बातें निम्नलिखित हैं-
तुलना
किसी भी वित्तीय आंकड़े का एकल आधार पर कोई अस्तित्व ही नहीं है। तो अगर आपके पास यह सूचना है कि किसी कंपनी ने सितंबर तिमाही के दौरान 345 करोड़ रुपये की बिक्री की जबकि उसका मुनाफा 45 करोड़ रुपये रहा या फिर यह कि कंपनी ने 2,367 करोड़ रुपये की बिक्री की और उसका शुद्ध लाभ 456 करोड़ रुपये रहा तो इसका कोई मतलब नहीं है।
इसकी वजह यह है कि सिर्फ आंकड़ों से पूरी बात साफ नहीं होती है। सिर्फ इस जानकारी से यह पता नहीं चल पाएगा कि कंपनी के प्रदर्शन में सुधार हुआ या यह नीचे गिरा है। इसीलिए परिणाम की सही तुलना की जानी चाहिए। अब अगला सवाल यह उठता है कि तुलना किसकी की जानी है?
आप कंपनी के आंकड़ों की तुलना एक साल पहले की समयावधि से कर सकते हैं और इसे सालाना आधार पर तुलना करना कहा जाएगा। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब दोनों साल के कारोबारी हालात में काफी अंतर हो।
उदाहरण के तौर पर मॉनसून के दौरान सीमेंट की बिक्री में काफी गिरावट दर्ज की जाती है या फिर किसी कंपनी की बिक्री एक तिमाही में काफी अधिक होती है तो ऐसे में एक साल पहले के हालात से तुलना करना वाजिब है। सीमेंट, चीनी, एफएमसीजी कंपनियों के वित्तीय परिणामों की तुलना सालाना आधार पर की जा सकती है।
दूसरा विकल्प है मौजूदा परिणामों की पिछली तिमाही के परिणामों से तुलना करना। यह उन उद्योगों के लिए सही होता है जहां उद्योग के हालात काफी तेजी से बदलते हैं और कंपनियों को बदलाव के साथ ही चलना होता है।
दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में बदलाव काफी तेजी से होते हैं। इसीलिए इन क्षेत्रों की कंपनियों के वित्तीय परिणामों की तुलना तिमाही दर तिमाही आधार पर की जाती है जिससे उद्योग में रुझान का पता लग सके। सही तरह से तुलना करने पर निवेशक के लिए सही फैसले करना आसान हो जाएगा।
बेस
सही अवधि पर तुलना करना ही काफी नहीं है क्योंकि इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जिन आंकड़ों की तुलना की जा रही है उन पर कुछ बदलावों का कोई असर नहीं होता है। कुछ ऐसे भी समय होते हैं जब कंपनी कोई अधिग्रहण करती है या फिर अपनी हिस्सेदारी बेचती है।
कई बार ऐसा होता है कि कंपनी के पास अतिरिक्त कारोबार आ जाता है या फिर कंपनी कुछ कारोबार बेच भी देती है। अगर ऐसा होता है तो दो अलग अवधियों के आंकड़ों की तुलना नहीं की जा सकती जब तक कि उन दोनों का कोई साझा आधार नहीं हो।
इससे शुद्ध लाभ में 40 फीसदी की बढ़ोतरी देखकर यह अनुमान लगाना कि कंपनी के प्रदर्शन में सुधार हुआ है मुमकिन नहीं है क्योंकि यह कंपनी द्वारा किए गए अधिग्रहण का नतीजा भी हो सकता है। एक बार कॉमन बेस बन जाए तो ही सही तस्वीर सामने आएगी और इसका इस्तेमाल सही फैसला लेने में किया जा सकता है। कारोबारी जगत में होने वाले अधिग्रहणों और विलयों की अधिक तादाद के कारण यह हालात काफी देखने को मिलते हैं।
आकस्मिक बदलाव
कंपनियों के परिणामों पर असर डालने वाली कई घटनाएं होती हैं और आपको हमेशा उस सबसे बेहतरीन या उस सबसे खराब घटना पर ध्यान देना होता है जो परिणामों को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखती है। इस सूची में दो सबसे आम बातें जो आजकल देखने को मिलती हैं वह हैं विदेशी मुद्रा विनिमय में हो रहे बदलाव और अपने निवेश को बेचना।
कई कंपनियां काफी समय तक अपने निवेश को बेचने का इंतजार करती हैं और इन निवेशों की बिक्री कर उन्हें काफी फायदा होता है। इससे उस तिमाही के दौरान कंपनी को होने वाले मुनाफे में बढ़ोतरी होने के साथ ही परियोजनाओं को बिल्कुल अलग हालात में ला देता है।
ऐसा होने से दो बातें हो सकती हैं- पहली कि शुरुआत में तो इसे शामिल किए बगैर कंपनी का प्रदर्शन अच्छा लगे और दूसरा यह कि एक साल बाद इस तरह के मुनाफे के अभाव में कंपनी का प्रदर्शन खराब लग सकता है। इसके साथ ही कई मुद्राओं में कारोबार करने के लिए कई डेरिवेटिव उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है।
लेकिन मुद्रा विनिमय में अचानक होने वाले बदलाव का भी कंपनी पर असर होता है जिसका असर उसके प्रदर्शन पर दिखता है। दरअसल इन दोनों बातों पर ध्यान देकर यह अंदाजा लगाना आसाना हो जाता है कि आने वाले महीनों में कंपनी का कारोबार कैसा रहेगा।
अकाउंटिंग नीति
कंपनी के वित्तीय परिणाम पर ध्यान देने के लिए जहां बाकी बातें जरूरी हैं वहीं यह भी देखना जरूरी है कि कंपनी किस तरह की अकाउंटिंग रणनीति अपनाती है।
कई बार ऐसा होता है कि निवेश, विदेशी विनिमय सौदे, डेरिवेटिव उपकरण जैसे मामलों के लिए नीतियों में बदलाव किया जा सकता है। लेकिन परिणाम देखते समय इस बात को ध्यान में नहीं रखा जाता है तो अकाउंट्स कंपनी की माली हालत की सही तस्वीर पेश नहीं करेंगे।
कंपनी को होने वाला मुनाफा असली और बरकरार रखने लायक होना चाहिए न कि बुक एंट्रीज तक ही सीमित रहे इसीलिए अकाउंटिंग नीति पर भी ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है। एक बार यह हो जाए तो इससे निवेशकों को कंपनी के प्रदर्शन की सही तस्वीर मिलती है।
हालांकि इस बात की भी गारंटी नहीं है कि इन सभी बातों पर ध्यान देने से निवेशक को उसके द्वारा किए गए निवेश पर मुनाफा ही होगा। लेकिन कम से कम इतना तो हो ही जाएगा आप सोच समझकर निवेश करेंगे जिससे आपको सफलता मिलने की संभावना अधिक है।
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