| जी-20 की बैठक से भारत सरकार के लिए कई सबक | | दिल्ली डायरी | | | ए. के. भट्टाचार्य / September 29, 2009 | | | | |
भारत सरकार पिट्सबर्ग सम्मेलन से कई सबक ले सकती है। जी-20 समूह के नेताओं की बैठक पिछले हफ्ते समाप्त हुई और भारत को इस बात का अहसास हो गया कि वैश्विक परिदृश्य में उसे और बडी भूमिका निभानी होगी।
जिस तरह से जी-20 द्वारा नीतिगत प्रारूप तैयार किया जाना है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वैश्विक आर्थिक मुद्दों की बाबत अब जी-20 प्रमुख निकाय बन चुका है। एक और सबक है जिसे भारत ने पिट्सबर्ग बैठक से अवश्य सीखा होगा।
वह यह कि जब वैश्विक संस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की बात आती है तब किस तरह से सूचना के प्रसार की बाबत भारत सरकार के पास लोगों और विचार दोनों की कमी देखी गई। लोगों की कमी तब और स्पष्ट हो गई जब जी-20 में पहुंचे चीनी प्रतिनिधिमंडल या फिर दक्षिण कोरिया के प्रतिनिधिमंडल से इसकी तुलना की गई।
वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव स्तर का एक ही अधिकारी वहां मौजूद था, जो इनपुट व सुझाव देने के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे का चक्कर लगा रहा था। पिट्सबर्ग कॉन्फ्रेंस सेंटर में तब एक साथ कई बैठकें हो रही थी और यह अधिकारी अकेले ही हर जगह इनपुट व सुझाव मुहैया करा रहा था। इसकी तुलना हम चीनियों से करते हैं कि उन्होंने क्या किया।
उन्होंने कई वरिष्ठ अधिकारियों को अलग-अलग बैठक का कार्यभार सौंपा था। एक ने जी-20 की बैठक के साथ-साथ सदस्य देशों की सरकारों के विशेष दूतों के साथ बैठक की जबकि दूसरे को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) व विश्व बैंक के साथ बैठक की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। ये दोनों संगठन भी पिट्सबर्ग में उस समय शुरुआती बैठक आयोजित किए हुए थे।
चीन ने स्पष्ट तौर पर अहसास कर लिया था कि वैश्विक बैठक में संपर्क के दौरान वे निश्चित रूप से अधिकारियों की मजबूत टीम को काम पर लगाएंगे। ऐसे में उन्होंने विशेषज्ञ अधिकारियों की टीम तैयार की और उन्हें अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी गई, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि चीनी राजनेताओं को जी-20 फोरम में पर्याप्त इनपुट मिल जाए।
भारत में वित्त मंत्रालय की इंटरनैशनल कोऑपरेटिव डिवीजन मुख्य रूप से विश्व बैंक व आईएमएफ की गतिविधियों में शामिल रही थी। विश्व बैंक व आईएमएफ के साथ काम कर रही वही टीम अब जी-20 के साथ भारत की तरफ से संपर्क अभियान में जुटी रही। साफ तौर पर वित्त मंत्रालय में अलग-अलग टीम बनाए जाने की दरकार है जो विश्व बैंक, आईएमएफ व जी-20 के साथ भारत के संबंधों का नियंत्रण व प्रबंधन कर सके।
वास्तव में, अब वित्त मंत्रालय व विदेश मंत्रालय के बीच विस्तृत स्तर पर सहयोग व समन्वय की दरकार है। 1990 में शुरू हुए आर्थिक सुधार के शुरुआती दिनों में विदेश मंत्रालय का नामकरण आर्थिक मंत्रालय करने का प्रस्ताव था। यह कोशिश वैसे देश में आर्थिक कूटनीति के महत्त्व की बाबत थी जिसका विकास तेजी से हो रहा था और इस तरह से विश्व की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा सके।
यह विचार उस समय शायद परिपक्व नहीं था। लेकिन जी-20 का सदस्य होने के नाते अब समय आ गया है कि भारत सरकार या तो वित्त मंत्रालय के इंटरनैशनल कोऑपरेशन डिवीजन का विस्तार करे या विदेश मंत्रालय में मौजूद अधिकारियों का इस्तेमाल करते हुए आर्थिक सहयोग के लिए अलग से डिवीजन बनाए।
विचारों की किल्लत उस समय स्पष्ट हो गई जिस तरह से पिट्सबर्ग में भारत सरकार ने जी-20 के अन्य नेताओं के साथ बातचीत में सूचनाओं का प्रसार किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिट्सबर्ग गए थे और उनके साथ मीडिया प्रतिनिधियों का दल भी गया था। उनके हिसाब से जी-20 के नेताओं के साथ उनकी बैठक सकारात्मक रही।
बैठक की समाप्ति पर प्रधानमंत्री के संवाददाता सम्मेलन के अलावा भारत सरकार ने इस बाबत एक भी संवाददाता सम्मेलन आयोजित नहीं किया कि पिट्सबर्ग में बहस के लिए आए आर्थिक मुद्दों से भारत ने किस तरह अपना रुख स्पष्ट किया।
हां, भारतीय सुरक्षा सलाहकार ने संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया था। दूसरा सम्मेलन प्रधानमंत्री केविशेष दूत ने जलवायु परिवर्तन पर आयोजित किया था। लेकिन क्या जी-20 सुरक्षा या जलवायु परिवर्तन केसंबंध में था? या फिर यह वैश्विक आर्थिक मुद्दों की बाबत था? प्रधानमंत्री की टीम में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, वित्त सचिव अशोक चावला जैसे लोग थे।
क्या प्रधानमंत्री की टीम ने उनका और पिट्सबर्ग में मौजूद मीडिया प्रतिनिधिमंडल का पूरा इस्तेमाल किया? सच्चाई यह है कि उनमें से कोई भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए नहीं आए। सभी महत्त्वपूर्ण सदस्य देशों ने अपने मीडिया प्रतिनिधिमंडल को बताया कि उनके नेताओं ने जी-20 की बहस में किस तरह से महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन भारत की तरफ से लोगों की कमी और विचारों का अभाव नजर आया, जिसे कि प्रसारित किया जा सके।
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