| आज का नेता बनाए सक्षम सरकार | | आज शासक ऐसा दिखा रहे हैं कि वे शासक नहीं शासित हैं। राजनीति में साफ छवि और सदैव जनता के साथ रहने का आभास दिलाने वाले नए उभरते नेताओं पर ऋषि राउते की एक नजर। | | | ऋषि राउते / May 22, 2009 | | | | |
पुरानी दौर के समझदार शासक जानते थे कि उन्हें क्या चाहिए।
उनके मंत्री या दीवान अपने काम और उसकी बारीकियों से बखूबी वाकिफ थे, प्रशासन को चलाना उन्हें खूब आता था और जरूरत के वक्त वे बगावत को दबाना भी जानते थे। इससे शासक या राजा स्वतंत्र रहते थे और उनका पूरा ध्यान अपने लक्ष्यों पर होता और उस के लिए वे आगे काम किया करते थे।
यह खासतौर पर नए-नए शासकों के मामले में सच होता। भारत में शुरुआती मुस्लिम शासक इसी फेहरिस्त में शामिल हैं, जिन्होंने अब तक खुद से अजनबी लेकिन खुशहाल जगहों पर साफ-सुथरे तरीके से शासन किया।
वे शासक जो नए-नए सत्ता में शामिल हुए थे खासतौर पर ऐसे जिन्हें नई-नई सत्ता हासिल हुई थी, उनके लिए एक समस्या यह भी थी कि उन्हें नए लोगों के साथ-साथ सत्ता के कुछ पुराने और अनुभवी नुमाइंदे भी चाहिए थे। दूसरे शब्दों में वे अपने साथ कुछ नए मंत्री तो लाते, लेकिन एक बार जब सत्ता पर वे काबिज हो गए तब उन्हें अनुभवी प्रशासकों की जरूरत पड़ती।
संयोग से भारत में एक बार फिर ऐसा वक्त लौट आया है, जिसमें पुराने खिलाड़ियों वाली राजनीतिक पार्टियां तेजी से नए प्रशासकों की तरफ बढ़ रही हैं। 14वीं शताब्दी के मोरक्को के धर्मशास्त्री और साहसिक इब्न बतूता ने अपनी शिक्षा, अपनी चालें, समाचार, शासकों के लिए उपयोगी अंदरूनी बातों और राजनीतिक समझ का इस्तेमाल अपने देश से भारत तक के अपने सफर में किया। यहां उन्होंने शासक मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में अपनी सेवाएं दी।
इब्न बतूता 14वीं शताब्दी की इस्लामिक सभ्यता के दौरान कई महाद्वीपों का भ्रमण कर चुकी थे। जहां संस्कृति, सरकारी, वाणिज्यिक और यहां तक कि विज्ञान में भी एक ही भाषा अरबी का इस्तेमाल होता था।
इब्न बतूता जितना अनुभवी या विभिन्न महाद्वीपों का भ्रमण कर चुका व्यक्ति किसी भी शासक के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता था, जो उन शासकों के प्रशासनिक कार्यों में उनकी मदद करता और उनके प्रदर्शन और सत्ता को फैलाने में मददगार साबित होता। वैश्वीकरण के युग में, क्या यह संभव है कि हम यानी आज के चुनावी मैदानों के सुल्तान वैश्विक अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक बलों के बीच कड़ी बना पाएं?
अपने इस सवाल का जवाब हमें 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में पुरुष और महिला नेताओं जैसे राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, पी. चिदंबरम, माधवराव सिंधिया, कमल नाथ, जसवंत सिंह, नवीन पटनायक, राजेश पायलट, शीला दीक्षित और ऐसे कई चेहरों के रूप में दिखाई देता है, जो अक्सर ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्रों से जीत कर सत्ता के मैदान में उतरे हैं और शहरी लोगों को भी अपने साथ जोड़ चुके हैं। साथ ही साथ अपने-अपने कार्यकाल में प्रभावशाली प्रशासन से सबको चकित कर चुके हैं।
आज की नई पीढ़ी
आज के नेताओं में पुराने दिग्गजों के बच्चे और कुछ दूसरे लोग शामिल हैं, सत्ता के मैदान में नए खिलाड़ियों के रूप में तैयार हैं।
संस्कृति के लिहाज से विविधता लिए हुए इन नेताओं में महिला और पुरुष दोनों शामिल हैं, जैसे युवा गांधी और सिंधिया, सुप्रिया सुले, मिलिंद देवड़ा, दयानिधि मारन, सचिन पायलट, दुष्यंत सिंह और संदीप दीक्षित, इसके अलावा कुछ बड़े और अधिक अनुभवी जैसे अरुण जेटली, कपिल सिब्बल, शशि थरूर और मणि शंकर अय्यर आदि।
अपने माता-पिता की ताकत का कुछ फायदा इन्हें भी अक्सर मिल जाता है और उसके अलावा इनके पास पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों की उपाधियां तो हैं ही, साथ ही अंग्रेजी में भी ये पारंगत हैं। इतना ही नहीं इनमें से कई के पास कॉर्पोरेट जगत, उद्योगों या दूसरे पेशों का अनुभव भी है।
अगर तुलना की जाए तो पुराने नेताओं जैसे देवी लाल और ओम प्रकाश चौटाला के पास ग्रामीण मतदाताओं की बड़ी संख्या है, संयुक्त-युग 'जाति की राजनीति करने वाले'- लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, मायावती, देवे गौड़ा, जॉर्ज फर्नांडीस और दूसरे नेताओं का बतौर शासक आकर्षण कम होता दिखाई दे रहा है, बेशक वे कितने भी वाक पटु क्यों न हो और उनका सम्मान आम जनता के बीच कितने भी अधिक क्यों न हो।
वे अब भी आस-पास हैं, लेकिन इस बार उन्हें अपनी उम्मीद से कम वोट और सीटें मिली हैं। इसके लिए उन्हें बहुत हैरान होने की जरूरत नहीं है। बाजार उदारीकरण और वैश्वीकरण को इसकी वजह बताया जा रहा है। किसी और देश की ही तरह भारत में भी इन दो चलनों ने हमारी उम्मीदों में इजाफे के अलावा और कुछ नहीं किया। शायद ये उम्मीदें अब जाति के साथ आगे नहीं बढ़ सकतीं।
मायावती की 'मुख्यमंत्री' बनने की संतुष्टि के चलते उन्होंने वर्ग सीमाओं के आधार पर इसका फायदा उठाया। नहीं! अब हर भारतीय फिर चाहे वह कहीं का भी हो, तेजी और स्वतंत्र हाथ चाहता है। वह अपने लिए वह काम करना चाहता है, जिन्हें उसने कभी राज्य के भरोसे छोड़ दिया था। अब वह काम किसी भी हाल में करना चाहता है, अगर उसे सरकारी मदद मिलती है तो वह उसे दिल से स्वीकार करेगा।
सीमाओं पर शांति बढ़ने के साथ अब भारत पहले जैसा नहीं रहा। वह भी वैश्विक पटल पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है और सामयिक घटनाओं पर उसकी भी राय ली जाती है। आज हम बेहतरी, विकास के लिए अपने नीति-निर्धारकों पर निर्भर हैं कि वे हर मंच पर हमारे फायदे के लिए कुछ अच्छा करें और उससे भी जितना तेजी से हो सके उतना तेजी व बिना किसी मोह में फंसे करें।
इसलिए हमें ऐसे प्रतिनिधियों को चुनना चाहिए जो विदेशियों को प्रभावित कर सकें। हमें ऐसे नेताओं को चुनना चाहिए जो हमारे साथ खड़े देशों, पूरे विश्व के भले और दीर्घकालिक परिणामों को अपने ध्यान में रखकर भारत के लिए खास प्रावधानों पर वैश्विक मंचों पर अपना कड़ा, निश्चयात्मक और युक्तिसंगत रुख प्रदर्शित कर सकें। और सिर्फ बाहर से बैठे-बैठे सामयिक मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया देने की बजाए, हमारे नेताआ सक्षम भारतीय होने चाहिए जो खुद के बदलावों को वैश्विक स्तर पर पेश कर सकें।
अंग्रेजी में कहते हैं...
शायद यही एक वजह भी है कि चुनावों से पहले मुलायम सिंह के वक्तव्य कि वे अंग्रेजी और कंप्यूटरों के खिलाफ हैं तो उनका खासा उपहास हुआ था।
हर माता-पिता फिर चाहे वे शहरी या ग्रामीण पृष्ठभूमि से ही क्यों न हों, वे अपने बच्चे को अंग्रेजी सीखने और कंप्यूटर का इस्तेमाल कैसे होता है यह जानने के लिए स्कूल भेजना चाहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब माता-पिता ने स्वेच्छा से अपने बच्चों को निशुल्क राज्य सरकार के स्कूलों की बजाए मोटी फीसों वाले निजी स्कूलों में डाला है, सिर्फ इसलिए कि वे अंग्रेजी सीख सकें।
अंग्रेजी आज विकास के लिए काफी अहम है न सिर्फ निचले वर्गों के लिए, बल्कि नेताओं को भी इससे बेहतर काम करने में सहायता मिलेगी। अभिषेक मनु सिंघवी, जयराम रमेश, बलबीर पुंज, यशवंत सिन्हा और अरुण जेटली आदि सरीखे पार्टी नेता दूसरों पर अच्छा प्रभाव डालने में कामयाब रहते हैं।
देश में अंग्रेजी का इस्तेमाल मुट्ठीभर लोग ही रोजमर्रा की जिंदगी में कर पाते हैं, लेकिन इसकी चाह हर किसी के दिल में है। और मतदाता सुधार की उम्मीद के चलते नेताओं को चुनते हैं वह इसलिए क्योंकि वे इन नेताओं में अपने सपनों की छवि देखते हैं। अब चूंकि मतदाता की चाह उसके आकांक्षा में बदलाव आ गया है, इसलिए नेताओं का प्रोफाइल भी बदलने लगा है।
अब वह अपने मतदाताओं के दम पर राज्य में अपना बीच-बचाव नहीं करता, अब वह लोगों के बंधन खोलने का काम करना है, ताकि वे अपनी बुनियादी सुविधाओं को खुद से पूरा करें। समाजशास्त्री आशीष नंदी के हाल में टीवी पर दिए एक बयान के अनुसार कई देश, जिनमें भारत के करीबी दोस्त भी शामिल हैं, उन्होंने कई साल पहले ही यह सबक सीख लिया था।
उनका कहना है दुनियाभर की राजनीति में लोकतंत्र आज आदर्शवाद नहीं है, यह सेवाएं मुहैया कराना है। चीन, सिंगापुर, ताइवान और कोरिया सरीखे देश ने अपने अधिकारों वाली राजनीतिक प्रणाली को बदल दिया है। उन्होंने अपने शासक वर्ग में सक्रिय विकासशील तकनीकी विशेषज्ञता का फायदा उठाना शुरू कर दिया है। लोकतंत्र के विपरीत शासकों को शासन करने की जरूरत नहीं है।
आजादी के बाद, भारत के निर्वाचित नेताओं ने, जिनमें शिक्षित, अंग्रेजी बोलने वाले, पेशेवर आदमियों का समूह शामिल है, हमारे संविधान को लिखने और उसे पूरा करने में मदद की है। संस्थापक पीढ़ी के गुजरने के बाद और पंडित नेहरू के जब तक मुनासिब हो सके खुद को रोके रखने के बाद, बाद के नेताओं ने राजनीतिक तंत्र का अनपेक्षित तरीके से इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
यह ऐतिहासिक पैटर्न है, जिसमें शुरुआत में गंभीर आदर्शवाद और बाद में उपयोगितावाद, जब तक निराशावाद गुस्से और दोबारा आदर्शवाद में न तब्दील हो जाए। यह इस बात के संकेत हैं कि अब समय सिर्फ तंत्र का शोषण करने वाले निर्वाचित नेताओं से आगे बढ़कर ऐसे नेताओं की तरफ है जो तंत्र से भी अधिक काम करने का वायदा कर सकें।
न सिर्फ चुनाव परिणामों, जिनसे हमें सबसे युवा नेता और अब तक की सबसे सार्वभौमिक संसद मिली है, साथ ही भारतीयों की चाह की तेजी से बदतली प्रकृति ने भी यह दिखा दिया है कि हमें राजी होने के लिए इंतजार करने की जरूरत नहीं है।
अब जब भारत में एक किसान की पहुंच मीडिया तक बढ़ गई है और जब वह जानता है कि हमारी अर्थव्यवस्था पर किस तरह का बुरा या अच्छा प्रभाव पड़ रहा है तो ऐसे में पुराने नारों पर अब किसी का ध्यान नहीं जाता। आज वह जानता है कि नेता उसकी किस तरह से मदद कर सकते हैं।
और यह नेता कोई पुराना योध्दा और मिट्टी से जुड़ा इंसान नहीं है, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति है जो दिखने में सीधा-सादा और आज का चमकता सितारा है। यह सितारा आपका अपना कोई जाना पहचाना या फिर कोई विदेशी भी हो सकता है।
बदलाव की बयार
अगर अमेरिका में बराक ओबामा को पुनरूध्दार की मांग का फायदा मिल सकता है तो हालिया लोक सभा के सदस्यों को क्यों नहीं। आज वैश्वीकरण आम मुद्दा है और सच तो यह है कि अब राष्ट्र सरकार को नागरिकों के हित में अपनी सीमाओं के परे काम करना है, वह भी दूसरों के साथ मिलकर।
अब इनके नेताओं में मतदाताओं के अलावा भी दूसरे राज्यों के नेता भी समान होने चाहिए और ऐसा ही उनके निर्वाचकों के साथ भी होना चाहिए। अब जब हमारे बीच में मनमोहन सिंह के रूप में एक टेक्नोक्रैट मौजूद है और जब समय की मांग वैश्विक पटल पर खुद को साबित करने वाले शासकों की है, जिन्हें चुना भी गया है तो उन्हें इब्न बतूता सरीखे मंझे हुए पुरुष और महिलाओं की जरूरत है, जिनके लिए सब कुछ बेहद सहज हो।
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